हिमाचल प्रदेश में सरकार ही नहीं, टोपियां भी सत्ताच्युत हुई हैं. वीरभद्र सिंह की सरकार जाने के साथ ही उनके ट्रेडमार्क हरी टोपी को भी राजनीतिक वनवास मिल गया. टोपियां हिमाचल प्रदेश के लोकजीवन का ही नहीं, राजनीतिक संस्कृति का भी अहम हिस्सा है. ये बात जुदा है कि यहां टोपियों का रंग सरकारों के हिसाब से बदलता रहता है.
फिलहाल हिमाचल की राजनीति दो रंग की टोपियों में बंटी है. हरी पट्टी वाली टोपी मतलब कांग्रेस (वीरभद्र सिंह) के समर्थक और लाल या मरून रंग की टोपी मतलब बीजेपी (प्रेम कुमार धूमल) के समर्थक. शिमला में माल रोड से लेकर रिज़ मैदान और माल रोड के ही इंडियन कॉफी हाउस से लेकर सत्ता के गलियारे राज्य सचिवालय तक टोपी का रंग आपको लोगों की राजनीतिक पहचान आसानी से बता देगा. सरकार बदलते ही टोपियां बदलकर पार्टियों/नेताओं के समर्थक और यहां तक सरकारी अधिकारी भी अपनी निष्ठाओं की सार्वजनिक नुमाइश करने का मौक़ा नहीं चूकते. टोपी के ज़रिये वफादारी साबित करने ही होड़ मच जाती है. यह अपने आप में एक भिन्न तरह का राजनीतिक कल्चर है. जिसमें प्रतीकों का अनूठा शक्ति प्रदर्शन होता है. ऐसा शायद ही कहीं और देखने को मिलता हो.
वैसे टोपी के रंग से आप हिमाचल के अलग-अलग इलाकों के वाशिंदों की पहचान आसानी से कर सकते हैं. टोपी का रंग और उसका डिजाइन इलाकों का पता बताता है. हिमाचल से बाहर की दुनिया तो इन टोपियों को सिर्फ़ हिमाचली टोपी के नाम से जानती है, लेकिन उस हिमाचल के भीतर भी कई हिमाचल हैं. उस हिमाचली टोपी के अंदर भी कई हिमाचली टोपियां हैं. जैसे किन्नौरी टोपी, कुल्लुवी टोपी, बुशहरी टोपी, चंबयाली टोपी इत्यादि. नाम से ही पता चल रहा होगा कि ये टोपियां अपने-अपने इलाक़ों की पहचान बता रही हैं. लेकिन हिमाचली लोक जीवन के इस विशिष्ट और ख़ूबसूरत रंग को राजनीति ने कब अपने रंग में ढाल लिया, पता ही नहीं चला.
वीरभद्र सिंह के सिर पर आपने अक्सर हरी पट्टी वाली गोल हिमाचली टोपी देखी होगी. यह टोपियों का किन्नौर स्टाइल है. किन्नौरी टोपी. हालांकि वीरभद्र सिंह भूतपूर्व रामपुर-बुशहर रियासत के राजवंश से आते हैं. इसलिए इस टोपी को लोग ‘बुशहरी टोपी’ भी कहते हैं. हरे रंग वाली इस ‘बुशहरी टोपी’ की हिमाचल की राजनीति में वीरभद्र की टोपी के तौर पर मान्यता है. सन् 1983 में जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब से यह टोपी पहन रहे हैं और उनकी देखा-देखी हिमाचल में हरी टोपी चल पड़ी. ऐसी चली कि टोपी कि एक राजनीतिक-प्रशासनिक संस्कृति ही पैदा हो गई. उससे पहले तक हिमाचल में गोटेदार और ज़रीदार टोपियों का ज़्यादा चलन था. वीरभद्र सिंह चूंकि लंबे समय से मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इसलिए उनकी हरे रंग वाली बुशहरी टोपी हिमाचल की राजनीति में अपने-आप स्थापित हो गई.
जब 1998 में बीजेपी की कई साल बाद हिमाचल की सत्ता में वापसी हुई तो सबसे बड़ा सवाल ये था कि हरी टोपी की इस प्रतीकात्मकता का मुकाबला कैसे किया जाए? सत्ता बदल चुकी थी लेकिन सिस्टम की टोपी हरी ही रह गई. सत्ता परिवर्तन का फील ढंग से नहीं हो पा रहा था. लिहाज़ा बीजेपी ने भी अपनी राजनीति के प्रतीक के तौर पर टोपी का ही सहारा लिया और उसे रंग दिया लाल. जी हां, हिमाचल में भगवा ब्रिगेड को लाल रंग जंचा. धूमल साहब की पुरानी फोटो देखेंगे तो उनके सिर पर लाल टोपी दमक रही है. हालांकि बाद में लाल रंग मरून में बदल गया. लेकिन बीजेपी वालों के दौर में एक समय लाल टोपी खूब चलन में रही है. अब हिमाचल में सत्ता बदल गई, तो फिर से इन टोपियों की वापसी हो गई है.
लाल या मरून रंग की पट्टी वाली टोपी को हिमाचल की राजनीति में प्रतीक बनाने का श्रेय प्रेम कुमार धूमल को है. वह 1998 में पहली बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. वह तभी से यह टोपी पहन रहे हैं. इस तरह धूमल साहब ने तब सिर्फ वीरभद्र सिंह को ही सत्ताच्युत नहीं किया, हरे रंग की टोपी को भी राजनीतिक वनवास पर भेज दिया. इस तरह लाल या मरून रंग की टोपी विशुद्ध रूप से राजनीतिक टोपी कहा जा सकता है.
लेकिन हिमाचली टोपियों की कुल्लुवी शैली वाली टोपियां सबसे ज्यादा चमकदार, सबसे ज्यादा आकर्षक और सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं. इनमें लुभावना डिजाइन भी होता है. आम तौर पर हिमाचली टोपी के नाम पर कुल्लुवी टोपी ही ज्यादा लोकप्रिय है. वैसे हिमाचल की राजनीति में एक छोटा सा दौर चंबयाली टोपी का भी आया. चंबयाली टोपी का मतलब चंबा की टोपी. इस खूबसूरत टोपी को शांता कुमार उन दिनों पहना करते थे, जब वो हिमाचल के सीएम बने थे. लेकिन इस टोपी का चलन भी शांता कुमार की सरकार के कार्यकाल जितना ही न्यूनतम रहा. शांता सरकार की तरह ही चंबयाली टोपी भी हिमाचल की राजनीति में अब इतिहास हो चुकी है.
