(दिवंगत राजेन टोडरिया हमारे समय के धाकड़ पत्रकार / लेखक रहे हैं. वह हमारे बॉस भी रहे और मेंटॉर भी. राजेनजी की पत्रकारिता उत्तराखण्ड से शुरू होकर हिमाचल तक गई. वह हिमाचल में ‘दैनिक भास्कर‘ के संपादक थे. उससे पहले ‘अमर उजाला‘ अख़बार में हिमाचल प्रभारी थे. उनकी लेखनी बेहद धारदार और कमाल की थी. फरवरी 2013 में उनका देहांत हुआ. उन्होंने यह लेख श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर 9 अगस्त 2012 को लिखा था. उसे हू–ब–हू यहां साझा कर रहा हूं.)

श्रीकृष्ण राजनीति,रणनीति,प्रेम और वियोग के अद्भुत पुरुष हैं। कुरुक्षेत्र के जिस समर में वह अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करते हैं वह अपने आप में एक संपूर्ण दर्शन है। युद्ध में दो ही पक्ष होते हैं। मित्रपक्ष या शत्रुपक्ष। इसमें बंधु-बांधवों का कोई तीसरा पक्ष नहीं होता। जो युद्ध में आपके साथ है,वही आपका बंधु है, बांधव है, मित्र है। जो आपके विरुद्ध है वह आपका सिर्फ शत्रु है। लेकिन शत्रु के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार। शत्रु की श्रेष्ठता को स्वीकार करने का साहस और विनम्रता कैसी होनी चाहिए,यह कृष्ण बताते हैं। वह प्रेम के भी ईश्वर हैं। उनके यहां मांसल प्रेम वर्जित नहीं है। वे ऐसे राजा हैं जो तीन मुठ्ठी चावल का कर्ज उतारने के लिए अपने मित्र को तीन लोकों का राज्य देने को तैयार हो जाते हैं। यह उनका राजधर्म है।
राजा को अपने मित्रों,शुभेच्छुओं का कर्जदार नहीं होना चाहिए,यह कृष्ण का राजधर्म है। सर्वधर्मान परितज्यः मामेकम् शरणम् ब्रजः यानी सब धर्मों का परित्याग कर मेरी शरण में आओ। अनुयायी की निष्ठा को किस हद तक होना चाहिए, यह कृष्ण बताते हैं तो वह अपना धर्म भी बताते हैं। योगं, क्षेमं वहाम्यम ! तुम्हारे योग और क्षेम को मैं वहन करुंगा। यानी तुम्हारे हर कृत्य के प्रति मैं जिम्मेदार हूं। आज के नेता, जो विपत्ति के समय अपने समर्थकों से पल्ला झाड़ लेते हैं उन्हें श्रीकृष्ण का यह वाक्य रास्ता दिखा सकता है।
नई युद्धनीति के जनक श्रीकृष्ण
दो कदम आगे एक कदम पीछे की नायाब गुरिल्ला रणनीति के जनक माओत्से तुंग से बहुत पहले श्रीकृष्ण ने युद्ध का मैदान छोड़कर इस रणनीति को दिया। दुनिया ने रणछोड़ कह कर उनका मजाक उड़ाया। लेकिन श्रीकृष्ण ने बताया कि जो पीछे हटना नहीं जानता, वह युद्ध नहीं जीत सकता। पीछे हटना और फिर अपने अनुकूल समय में शत्रु पर झपटना,यही श्रीकृष्ण का युद्धशास्त्र है।
श्रीकृष्ण द्वापर काल में हुए। यह वह समय था जब त्रेता युग के जीवन मूल्य बदल रहे थे,युगधर्म बदल रहा था। जाहिर है कि सिर्फ समय ही नहीं बदल रहा था बल्कि समाज भी बदल रहा था। इसलिए द्वापर को त्रेता और कलयुग का संधिकाल भी कहा जा सकता है। श्रीकृष्ण इसी काल के अवतार हैं। इससे हम यह समझ सकते हैं कि द्वापर का ईश्वरीय अवतार बिल्कुल वही नहीं था जैसा वह त्रेता में था। त्रेतायुग में राज्य के लिए भाई-भाई नहीं लड़े लेकिन द्वापर में ऐसा नहीं था। द्वापर में राज्य के लिए बंधु-बांधवों में संघर्ष शुरु हो चुका था। राजर्षि तब देशभक्त होने के बजाय राजभक्त होने लगे थे। परिवार के मुखिया और वयोवृद्ध जन भी अपनी स्वतंत्र और बेबाक राय रखने से बचने लगे थे। अर्द्धसत्य राजनीति में अपवाद की तरह ही सही पर स्थान बनाने लगा था।
फोटो सौजन्य : श्रीकृष्ण संग्रहालय, कुरुक्षेत्र, हरियाणा
राम के दौर से कितने अलग थे कृष्ण?
त्रेतायुग में मानव समाज प्रतिस्पर्धा शुरु हो चुकी थी।,राज्य के लिए मानव समाज में संघर्ष होने लगे थे, राजा निरंकुश और आततायी होने लगे थे। ऐसे समय में राम ने त्रेता के राजधर्म को परिभाषित किया जिसे रामराज के रुप में जाना गया। त्रेताकाल के राजधर्म में सतयुग के मूल्यों की छाया थी। लेकिन द्वापर तक आते-आते राजधर्म में सतयुग का प्रभाव काफी क्षीण हो गया था। आधुनिक राज्य और समाजों के इस प्रसूतिकाल में राज्य एक जटिल इकाई बनने लगा था। त्रेता में राज्य की जिस निरंकुशता को खत्म कर राम ने रामराज की अवधारणा को स्थापित किया था वह फिर खत्म होने लगी।
श्रीकृष्ण का जन्म और एक भाई द्वारा अपनी बहन को कारागार में रखने और उसके पुत्र का वध करने की कोशिश करने की घटनाओं से पता चल जाता है कि निरंकुश राज्य और राजा दोनों ने ही त्रेताकाल के जीवन मूल्यों को नकार कर आधुनिक राक्षसी राज्य की ओर बढ़ना शुरु कर दिया था। इसी राक्षसी राज्य की सत्ता के खिलाफ श्रीकृष्ण खड़े हुए और नायक बन गए। लेकिन श्रीकृष्ण ने जिस राजनीति की शुरुआत की वह अपने युग की राजनीति थी। श्रीकृष्ण की राजनीति कलयुग की राजनीति के करीब इसलिए भी लगती है क्योंकि उनके समय का समाज त्रेताकाल के समाज की अपेक्षा कलयुग के ज्यादा करीब था।
फोटो सौजन्य : श्रीकृष्ण संग्रहालय, कुरुक्षेत्र, हरियाणा
मर्यादापुरुषोत्तम राम और यथार्थवादी कृष्ण
श्रीकृष्ण आधुनिक राजनीति के पितामह भी हैं। उनके गीता के उपदेशों में आधुनिक राजनीति और राजधर्म के लिए कई संदेश हैं। महाभारत पूरी तरह से राजनीति और रणनीति का महाकाव्य है। यद्यपि श्रीकृष्ण भी एक निरंकुश सत्ता के खिलाफ विद्रोह के प्रतीक हैं लेकिन वह मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहलाए क्योंकि लोगों को राम ज्यादा आदर्शवादी लगते हैं और श्रीकृष्ण यथार्थवादी। इन दोनों अवतारों का यह अंतर हमें यह भी समझाता है कि ईश्वर के अवतार भी अपने समय से निरपेक्ष नहीं हैं।
ईश्वर भले ही काल निरपेक्ष हो पर उसके अवतार काल निरपेक्ष नहीं है। वे अपने समय और समाज के सापेक्ष हैं। हर नायक की यह खूबी होती है कि वह अपने समय और सामाजिक जरुरतों का उत्पाद होता है। इसीलिए ईश्वर के अवतार हमें अतिमानवीय नहीं लगते बल्कि अपने समय के नायक या विद्रोही लगते हैं। राजनीति,रणनीति,प्रेम और विरह के उस अवतार को जन्माष्टमी पर प्रणाम!