Himalayan Talks Blog आजकल सतपाल महाराज के ‘बैंड, बाजा, बारात’ की इनसाइड स्टोरी — मनु पंवार।
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सतपाल महाराज के ‘बैंड, बाजा, बारात’ की इनसाइड स्टोरी — मनु पंवार।

उत्तराखण्ड की राजनीति में और कुछ हो न हो, मनोरंजन की कोई कमी नहीं है। फुल एंटरटेनमेंट है। इतनी सारी तकलीफों में घिरी पब्लिक को कुछ एनजॉयमेंट मिल जाता है, वो भी फ्री में। अब इससे ज्यादा अच्छे दिन और क्या चाहिए।

अभी हुआ क्या है कि धामी सरकार के हैवीवेट कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, जिनके पास मंत्रिमंडल विस्तार से पहले तक एक-दो नहीं, बल्कि 10 विभाग थे—पीडब्ल्यूडी, पंचायती राज, ग्रामीण विकास, संस्कृति, अक्षय निधि, पर्यटन, वाटरशेड मैनेजमेंट, भारत-नेपाल नदी प्रोजेक्ट, सिंचाई और लघु सिंचाई जैसे विभाग। इतने भारी भरकम विभागों के मुखिया सतपाल महाराज गैरसैण या भराड़ीसैण में बने विधानसभा भवन के बाहर खड़े होकर दुनियाभर के टीवी कैमरों के सामने क्या बोल बैठे—बोले कि ये जो विधानसभा भवन है, ये तो सफेद हाथी साबित हो रहा है। ऐसा करते हैं, इसको कॉरपोरेट कंपनियों को मीटिंग-सिटिंग के लिए दे देते हैं और यहां डेस्टिनेशन वेडिंग भी शुरू कर देते हैं।

मैं तो हैरान हूं कि आखिर सतपाल महाराज की हिम्मत कैसे हुई ये बात कहने की? गैरसैण के विधानसभा भवन को लेकर उनके दिमाग में ऐसा आइडिया आया ही क्यों? और वो क्यों इस भवन को अपने पर्यटन विभाग के हवाले करने और कॉरपोरेट कंपनियों को देने के लिए आमादा हैं? आखिर वो इतने उतावले क्यों हैं कि इस सिलसिले में विधानसभा स्पीकर ऋतु खंडूडी भूषण मैडम को भी कन्विंस करने पहुंच गए? आखिर उत्तराखंड में ये चल क्या रहा है?

किसी भी राज्य का विधानसभा भवन संसदीय लोकतंत्र का एक बड़ा प्रतीक है। वो एक संवैधानिक संस्था है, राज्य के स्वाभिमान का प्रतीक है। वो कोई धर्मशाला थोड़े ही है कि किसी को भी किराये पर दे दो या वहां कमर्शियल एक्टिविटीज शुरू करवा दो या ब्याह-शादियों जैसे प्राइवेट इवेंट्स के लिए टैंट लगाने दो, डीजे बजवाने की अनुमति दे दो।

आखिर सरकार का इरादा क्या है? कहीं गैरसैण को डायल्यूट करवाने का खेल तो नहीं चल रहा है? कहीं दिल्ली से आकाओं का कोई हुक्म तो नहीं हुआ, जिसकी तामील कराने के लिए सतपाल महाराज भराड़ीसैण के विधानसभा भवन को हड़पने की फिराक में हैं? विधानसभा के सदन में तो उनसे जवाब देते नहीं बना।

अब धामी सरकार के इतने भारी-भरकम मंत्री अगर उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैण के इस खूबसूरत विधानसभा भवन को कॉरपोरेट कंपनियों को देने या यहां बैंड-बाजा-बारात का माहौल बनाने यानी इसे वेडिंग डेस्टिनेशन बनाने का इरादा जता रहे हैं, तो इसका मतलब है कि ये अकेले सतपाल महाराज का बयान तो हो नहीं सकता। हो सकता है कि सरकार की भी ऐसी ही मंशा हो।

गैरसैण के विधानसभा भवन को, जोकि बनाया ही सिर्फ इसलिए गया है कि यहां से प्रदेश की विधानसभा चलेगी, उसे धन्नासेठों को या बड़ी कंपनियों को किराये पर चढ़ाने और इसे बड़े लोगों की शादी-ब्याह के लिए वेडिंग डेस्टिनेशन बनाने का ये बेहद ही वाहियात आइडिया है और उत्तराखण्ड राज्य की मूल भावना को चिढ़ाने वाला है।

मुझे तो हैरानी है कि धामी सरकार के इतने भारी-भरकम मंत्री विधानसभा भवन को सफेद हाथी कह गए। अगर ये विधानसभा भवन आपको सफेद हाथी लगता है, तो ये किसकी कारस्तानी है? इसकी जिम्मेदारी किसकी है? सरकार की है। 9 साल से उत्तराखण्ड में सतपाल महाराज की पार्टी की ही सरकार है।

इस बीच, हमारे मित्र इंद्रेश मैखुरी एक डेटा निकाल लाए कि गैरसैण में इन 12 साल में विधानसभा के कुल 10 सत्र ही हुए हैं। इन 12 साल में सरकार केवल 39 दिन ही गैरसैण में आई है। तो भइया, आप लोग खुद गैरसैण जाने का नाम नहीं ले रहे हो, आपके विधायक कभी ठंड का और कभी ऑक्सीजन कम होने का बहाना बनाकर गैरसैण से कन्नी काटने की फिराक में रहते हैं, तो आप ही कह रहे हो कि गैरसैण का ये विधानसभा भवन सफेद हाथी बनकर रह गया है।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये सब कुछ किसी पटकथा का हिस्सा हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप गैरसैण की बहस को ही गायब कर देना चाहते हो?

लेकिन अगर ऐसी कोई साजिशें हो रही हैं तो ध्यान रखिएगा कि गैरसैण का मतलब सिर्फ ये विधानसभा भवन नहीं है। गैरसैण उत्तराखण्ड की जनभावना का नाम है, यहां की फीलिंग्स का नाम है, यहां की पहचान का नाम है।

उत्तराखण्ड देश का पहला और शायद इकलौता ऐसा राज्य होगा, जिसके गठन से कई साल पहले ही इसकी राजधानी तय हो गई थी। ये वो समय था जब ये भी पता नहीं था कि उत्तराखण्ड राज्य कभी बन भी पाएगा या नहीं। गैरसैण में राजधानी उसी दौर का सपना है कि भविष्य में जब कभी भी अलग राज्य बनेगा तो राजधानी गैरसैण ही बनेगी।

ये उस जनभावना का ही दबाव था कि साल 1991 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार को गैरसैण में अपर शिक्षा निदेशक पर्वतीय का ऑफिस खोलना पड़ा था। भारी धूमधाम से वो ऑफिस खोला गया, हालांकि वो सांकेतिक ही था, लेकिन वो भविष्य की राजधानी के तौर पर गैरसैण को सरकारी मान्यता मिलने जैसा फैसला था।

1992 में 25 दिसंबर को उत्तराखण्ड क्रान्ति दल ने पेशावर विद्रोह के नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम पर गैरसैण का नाम चन्द्र नगर रखकर यहां भावी उत्तराखण्ड राज्य की राजधानी की नींव डाल दी थी।

1994 में यूपी की मुलायम सिंह यादव सरकार ने अलग उत्तराखण्ड राज्य बनाने के लिए जो रमाशंकर कौशिक समिति बनाई थी, उसमें गैरसैण को लेकर जो जनमत सर्वेक्षण कराया गया, उसमें दो तिहाई मत गैरसैण के पक्ष में थे। तब तो उत्तराखण्ड राज्य के लिए विराट जनांदोलन भी नहीं हुआ था, वो गुबार तो 1994 के अगस्त महीने में फूटा था, लेकिन उससे पहले ही गैरसैण में राजधानी तय हो गई थी।

उत्तराखण्ड राज्य बना था 8-9 नवंबर सन 2000 की आधी रात को, तो राज्य के गठन के करीब एक दशक पहले ही गैरसैण को राजधानी मान लिया गया था।

ये मैं इसलिए याद दिला रहा हूं ताकि हमारी सरकार को, उसके मंत्रियों को, उसके नेताओं को, विधायकों को इसका अहसास हो कि गैरसैण सिर्फ एक भवन का नाम नहीं है, गैरसैण एक भावना है।

सतपाल महाराज यहां बैंड, बाजा, बारात बजवाने की बात करके उस जनभावना का अपमान कर रहे हैं। सतपाल महाराज को स्पष्ट करना ही होगा कि वो उत्तराखण्ड सरकार में कॉरपोरेट कंपनियों के नुमाइंदे हैं या यहां की जनप्रतिनिधि हैं।

ध्यान रहे, पब्लिक आपको बहुत करीब से देख रही है। 2027 का चुनाव ज्यादा दूर नहीं है, तब सबका हिसाब होना है।

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