February 15, 2026
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अल्मोड़ा के वो सिनेमाघर – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA CINEMA

दशकों तक अल्मोड़ा में दो सिनेमाहॉलों का बोलबाला रहा है। पहला रीगल और दूसरा जागनाथ। जागनाथ की चर्चा अगली पोस्ट में करूंगा। आज चर्चा रीगल की। जागनाथ सिनेमाहॉल एलीट कहा जा सकता था लेकिन अल्मोड़ा का रीगल सिनेमाहॉल सबका था..मुख्य सड़क से बिल्कुल सटा हुआ। ऊपर वाली मंजिल में बालकनी और नीचे वाली मंजिल में रिजर्व और फर्स्ट क्लास। बालकनी की एंट्री के पास एक डिब्बाकार कमरा होता था जो होता था टिकटघर। टिकटघर जाली से घिरा होता था लेकिन जाली इतनी गंदी होती थी कि अंदर बैठे टिकट कलेक्टर बाबू का कभी चेहरा नहीं दिखा। टिकटघर के बिल्कुल मध्य प्रदेश में होता था एक टिक्कीभर का सुराख जिससे टिकट अंदर से बाहर आते थे।  टिकट भी बेहद खास। अलग क्लास के लिए अलग रंग का टिकट और सबसे खास बात इतना पतला कि अगर पसीना ज्यादा आ जाए  तो टिकट हाथ में ऐसे बिला जाएगा जैसे बर्फ। उस जमाने में बालकनी का टिकट 20 रूपया, रिजर्व का 10 रूपया और फर्स्ट क्लास का 5 रूपया होता था।

बालकनी की हालत फिर भी ठीक होती थी लेकिन रिजर्व और फर्स्ट क्लास की हालत वैसे ही होती थी जैसे ट्रेन के जनरल डिब्बे की लेकिन कम किराया होने की वजह से इनकी लोकप्रियता में कभी कोई कमी नहीं आई। दरअसल, फर्स्ट क्लास और रिजर्व क्लास में ज्यादा अंतर नहीं था, नीचे वाले हिस्से में एक ही हॉल था, आगे वाले हिस्से को फर्स्ट क्लास कह दिया गया, जबकि रत्तीभर ऊपर उठे पीछे वाले हिस्से को रिजर्व कह दिया गया। रिजर्व और फर्स्ट क्लास में घुसने के लिए दो दरवाजे थे। आगे वाला दरवाजे के ठीक बाहर पेशाबघर हुआ करता था।((जानबूझकर पेशाबघर लिख रहा हूं क्योंकि उसमें वॉशरूम जैसा कुछ भी नहीं था)) अगर आपकी सीट इस दरवाजे के आसपास पड़ी हो तो फिर आपको सुवासित शौचालय की महक के साथ फिल्म का आनंद उठाना होता था। हालांकि फिल्म देखने की चुनौती सिर्फ इतनी भर ही नहीं थी। खटमल और पिस्सुओं का अटैक भी समय समय पर होता ही रहता था, ऊपर से गंदा पर्दा और खराब साउंड की जद्दोजहद दर्शक को समय के कालचक्र के बाद ‘जेंटल मूवी गोवर’ बना ही देती। टूटी हुई कुर्सियां भी एक अलग मर्ज था। अगर आप रेगुलर फिल्म देखने जाते थे तो आप चूं चूं की आवाज़ की लय से फिल्म का साम्य बैठाने में पारंगत हो ही जाते थे। उन दिनों समाज का सलीका कुछ और होता था, लेकिन सिनेमाहॉल का सलीका कुछ और। अंधेरे सिनेमाहॉल के अंदर सिगरेट, बीड़ी, दम, गांजा की नवय्यत रौबदार मानी जाती थी, हालांकि सिगरेट, बीड़ी और दम मिश्रित धुएं का इकोसिस्टम कभी भी अल्मोड़ा के सिनेप्रेमियों को डिगा नहीं पाया है। दरवाजों के पास खड़े टिकट चेकर्स किसी वास्कोडिगामा, कोलंबस से कम नहीं होते थे।टॉर्च की रौशनी से दुनिया के किसी भी कोने का पता बता सकते थे। टिकट चेकरौं की ये कौम, मुंह में टॉर्च दबाए टिकट चेक करती थी और टिकट फाड़कर दूसरा सिरा आपको पकड़ाकर टॉर्च की लाइट चमकाकर ही आपको बता देते थे कि आपकी सीट पहले सीधे, फिर दाई ओर किनारे से तीसरी है। रीगल उस सड़क पर था जहां कॉलेज मौजूद है तो जाहिर हैं, 12 से 3 के शो में यहां लड़के लड़कियों की भरमार रहती थी। इन लड़के लड़कियों में ”पास” के लिए खास पागलपन होता था। कॉलेज के छात्रनेता अपनी धमक दिखाने के लिए अपने हस्ताक्षर किए हुए पास जारी करते थे। जो रीगल में यदा कदा चल ही जाते थे। जो छात्रनेता जितना दंबग हो, उसका “पास” उतना पुख्ता माना जाता था। रीगल के कारकून भी ये जानते थे कि किस छात्र नेता का पास चलाना है और किसका पास,,,, फेल करना है। दब्बू और लिबरल नेता के पास को टिकट चेकर हवा में उड़ा देते और लड़के लड़कियों की बेइज्जती करते सो अलग। इसलिए कॉलेज के छात्र भी उसी छात्रनेता से पास लेना पसंद करते जिसका ‘’पव्वा’’ सबसे ज्यादा चले। एक छोटा किस्सा यहां जोड़ देता हूं, मेरा मित्र Rajeev Joshi  हस्ताक्षर कॉपी करने में अव्वल था। उसने एक बार एक छात्र नेता से रीगल का पास मांगा, नेता ने अपने साइन करके पास बना दिया। राजीव जोशी के दिमाग में उस छात्र नेता का साइन छप गया। दूसरे दिन से राजीव ने अपनी पैरलल सरकार बना ली, वो उस छात्रनेता के साइन करने लगा और धड़ाधड़ सिनेमा के पास जारी करने लगा। कई सभ्य, सुसंस्कृत, धीर-गंभीर लड़कों का तांता मैंने राजीव के दरबार में लगते हुए देखा है। ।हालांकि तड़ीबाज लड़के इन पास-वास के जंजाल से मुक्त थे, वो कॉलेज पास के इन बैरियर्स से बहुत ऊपर उठे हुए थे। उनकी जब मर्जी होती वो रीगल सिनेमा के अंदर घुस जाते और मनोरंजन करके बाहर आ जाते। मजाल कि कोई उनसे टिकट के लिए पूछ ले। ऐसे लड़के अपने साथ पूरी फौज लेकर चलते। खुद भी मजे करते और अपने सेवकों की भी मौज करवाते। वो जमाना बड़ा लिहाज वाला जमाना था, प्रेमी जोड़े को अगर फिल्म देखनी हो तो कम से कम आधा दर्जन दोस्तों को जुटाना होता था। ज्यादा लोग होंगे तो बाहरी दुनिया को ज्यादा कन्फ्यूज किया जा सकेगा। टिकट का खर्चा, ब्रैड पकौड़ों, अंडा पकोड़ौं, लस्सी का बिल प्रेमी लड़के के सिर ही फटता । रीगल में ज्यादार बी और सी ग्रेड फिल्में लगती थी इसलिए आम जनमानस की लोकप्रियता की कसौटी में हमेशा खरा उतरता था। पास में ही राजकीय इंटर कॉलेज यानी GIC है। GIC के छात्रों का कभी मन न लगा तो वो रीगल में प्रवेश कर जाते। GIC में जब एक बार कड़क प्रधानाचार्य आए तो उन्होंने अपने जैसे कड़क मास्साबों का उड़न दस्ता बनाया जो रीगल में यदा कदा छापा मारने लगा और राह से भटके छात्रों को दंडित करने लगा। एक बार उड़न दस्ते ने जब छापा मारा तो GIC के ही एक मास्साब सी ग्रेड फिल्म का मजा लेते हुए पाए गए। सिनेमाहॉल महज एक इमारत नहीं हो सकती, सिनेमाहॉल सामूहिक यादों के भग्नावशेष होते हैं। रीगल भी ऐसा ही था। जमाने की तेज रफ्तार और आपसी कलह की वजह से ये दशकों से बंद पड़ा है और इसकी उजाड़ बिल्डिंग इसके समयसाक्षियों को वहां से गुजरते देखती होगी तो रीते हुए वक्त की लकीरें दरों दीवारों पर और गाढ़ी हो जाती होंगी। हालांकि अल्मोड़ा कुछ वर्षों तक सिनेमाविहीन भी रहा है लेकिन अब कई मल्टीप्लेक्स खुल चुके हैं— ख्वाब था शायद ख्वाब ही होगा–

लेखक के बारे में

(संजय बिष्ट अल्मोड़ा के मूल निवासी हैं. फिलहाल दिल्ली में एक न्यूज़ चैनल में काम कर रहे हैं.)

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