May 6, 2026
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400 साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा केदारनाथ मनु पंवार

केदारनाथ में साल 2013 में क्या हुआ, ये आप सब जानते ही हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि केदारनाथ मंदिर कभी करीब चार सौ साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा? शायद बहुत से लोगों को पता न हो…लेकिन साइंटिफिक स्टडी में इस बात की पुष्टि होती है…इस वीडियो में केदारनाथ से जुड़े इसी अनसुने रहस्य के बारे में जानेंगे और आपको वो वैज्ञानिक सबूत भी दिखाएंगे जो इस बात की इशारा करते हैं कि केदारनाथ मंदिर कभी बड़े हिमयुग की चपेट में आया था…लेकिन तब भी मंदिर का बाल भी बांका नहीं हुआ था…

तो केदारनाथ के रहस्य को समझने से पहले मैं आपका बता दूं कि
देहरादून में अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त  इंस्टीट्यूट है Wadia Institute of Himalayan Geology,जोकि भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय का एक स्वायत्तशासी शोध संस्थान है। जोकि 1968 में स्थापित किया गया था। इसी संस्थान के एक रिटायर्ड साइंटिस्ट हैं प्रोफसर रवींद्र कुमार चौजड़…जिन्होंने कि ग्लेशियर पर स्टडी की है.. उन्होंने केदारनाथ के ऊपरी हिस्से में स्थित चोराबाड़ी ग्लेशियर के मोराइन, मतलब वो मलबा जो ग्लेशियर अपने पीछे छोड़ जाता है, उसकी चट्टानों पर उगने वाले लाइकेन की स्टडी की…

 

प्रोफेसर चौजड़ की स्टडी के निष्कर्षों की जो हाईलाइट्स हैं, उसके मुताबिक –

1-केदारनाथ मंदिर यहां पर ग्लेशियर की मौजूदगी से पहले का बना है

2-केदारनाथ के इर्दगिर्द ग्लेशियर छोटे हिमयुग के दौरान पैदा हुआ

3-केदारनाथ मंदिर के इर्दगिर्द संभवत: 15वीं सदी के मध्य में विकसित हुआ और वो ग्लेशियर 1748 तक रहा

यानी इसका मतलब ये हुआ कि केदारनाथ मंदिर करीब 400 साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा

 

केदारनाथ के करीब चार सदी तक बर्फ में दबे रहने की जो बात  प्रोफसर रवींद्र कुमार चौजड ने अपनी स्टडी में की है. उनका वो रिसर्च पेपर साल 2009 में Current Science  जर्नल में पब्लिश हुआ है...

 

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी की तरफ से केदारनाथ मंदिर की चट्टानों पर लिग्नोमैटिक डेटिंग का परीक्षण किया। ये टेस्ट “पत्थरों के जीवन” की पहचान करने के लिए किया जाता है। परीक्षण से पता चला कि केदारनाथ मंदिर 15वीं सदी से लेकर 18वीं सदी के मध्य यानी सन् 1748 तक पूरी तरह से बर्फ में दबा हुआ था। हालांकि, इसके बावजूद मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ। इसकी वजह ये रही कि मंदिर की दीवारें मोटी और मजबूत चट्टानों से बनी हैं.. उसके खंभे भी बेहद मजबूत चट्टानों से हैं….

 

स्टडी के मुताबिक, केदारनाथ मंदिर के करीब चार सौ साल तक बर्फ में दबे रहने की पुष्टि मंदिर की अंदर की दीवारें भी करती हैं…मंदिर के अंदर दीवारों पर ये जो पीली रेखाएं या पीली पट्टियां दिख रही हैं, ये केदारनाथ मंदिर के किसी जमाने में ग्लेशियर में दबे होने की पुष्टि करती हैं. प्रो. चौजड़ ने अपनी स्टडी में केदारनाथ मंदिर की अंदर की दीवारों पर ग्लेशियर की वजह से चमक और धारियां पाई हैं…उनका कहना है कि इन पट्टियों से ग्लेशियर के बहाव की दिशा का भी पता चलता है… मतलब ये कहा जा सकता है कि जब केदारनाथ मंदिर बर्फ में दबा रहा, तब वो भारी-भरकम ग्लेशियर मंदिर की दीवारों पर अपनी रगड़ छोड़ गया…अपनी निशानियां छोड़ गया…

 

लेकिन अब प्रश्न ये उठता है कि क्या केदारनाथ में उससे पहले ग्लेशियर नहीं था…क्या उससे पहले कोई हिमयुग नहीं आया होगा? साइंटिस्ट प्रो चौजड़ की स्टडी से पता चलता है कि जब केदारनाथ मंदिर बनाया गया तब यहां पर ग्लेशियर की मौजूदगी नहीं मिलती….. उन्होंने इसका अनुमान लगाया है केदारनाथ मंदिर की बैकसाइड की बाउंड्री वॉल पर तमिल में लिखी गई कविताओं से…ये छठवीं-सातवीं सदी के तमिल कवि तिरुज्ञान सम्बन्धर और आठवीं सदी के तमिल कवि सुंदरमूर्ति की रचनायें हैं जिन्होंने केदारनाथ की महिमा पर तमिल में कवितायें लिखीं.. दोनों की कविताओं में केदारनाथ की खूबसूरती का जिक्र तो है…लेकिन बर्फ और ग्लेशियर का कोई उल्लेख नहीं है…इन दोनों तमिल कवियों की मूर्तियां बाउंड्री वॉल पर उकेरी गई हैं और उनके बारे में लिखा गया है.

 

इससे तीन संभावनायें पैदा होती हैं,  नंबर एक- इससे ये पता चलता है कि जब केदारनाथ मंदिर बना था, तब इसके आसपास के इलाके में कोई ग्लेशियर मौजूद नहीं था….

नंबर दो- अगर ग्लेशियर रहा भी होगा तो हो सकता है कि केदारनाथ मंदिर जहां आज मौजूद है, उससे काफी दूर रहा होगा

और नंबर तीन- केदारनाथ में ग्लेशियर रहा होगा और ग्लेशियर को काटकर ही मंदिर बना होगा

हालांकि प्रो रवींद्र चौजड़ की स्टडी इस बात की ओर इशारा करती है कि केदारनाथ मंदिर जब बना, तब यहां पर कोई ग्लेशियर नहीं था…हिंदू मान्यताओं में केदारनाथ मंदिर को पांडवकालीन मंदिर माना जाता है…लेकिन एग्जैक्ट डेट का जिक्र कहीं नहीं मिलता। कहा जाता है कि केदारनाथ मंदिर का जो मौजूदा स्वरूप है वो आठवीं सदी में इस हिमालयी इलाके में पहुंचे आदिगुरु शंकराचार्य की वजह से है…

 

प्रो चौजड़ का वो रिसर्च पेपर साल 2009 में Current Science में प्रकाशित हुआ है.. केदारनाथ में वैज्ञानिकों को हिमयुग के सबूत 15वीं से 18वीं सदी के बीच के मिले हैं…यानी केदारनाथ में 15वीं सदी से 18वीं सदी के बीच हिमयुग, जिसे अंग्रेजी में आईस एज कहते हैं, वो आया था….इसी दौरान करीब चार सदी तक केदारनाथ मंदिर बर्फ के बीच दबा रहा. लेकिन हैरानी की बात ये है कि तब भी मंदिर का कुछ नहीं बिगड़ा. साइंटिस्ट प्रो चौजड़ के अनुसार, केदारनाथ इलाके में सन् 1748 में हिमयुग अपने पीक पर था और उसके बाद वो पीछे हटना लगा..केदारनाथ में ग्लेशियर के पीछे खिसकने की तीन मेजर स्टेज आईं…पहली सन् 1766 में, दूसरी सन 1827 में और तीसरी सन् 1878 में

 

वैसे केदारनाथ के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी एक ग्लेशियर की वजह से ही आई…ये साल 2013 की बात है जब  केदारनाथ के ऊपरी हिस्से में स्थित चोराबाड़ी ग्लेशियर में बनी झील के टूटने से आपदा आई, उसमें भी मंदिर का कुछ नहीं बिगडा। ग्लेशियर से जब भीषण सैलाब आया तो उस सैलाब के साथ आई एक विशालकाय चट्टान  मंदिर के पिछले हिस्से में फंस गई और सैलाब का तेज बहाव दो हिस्सों में बंट गया I मंदिर के दोनों किनारों का तेज पानी अपने साथ सब कुछ ले गया लेकिन तब भी केदारनाथ मंदिर का बाल भी बांका नहीं हुआ…भले ही मलबा और गाद मंदिर में घुस गई थी…  अब भले ही वो चट्टान आस्था का केंद्र बन गई हो लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि  मंदिर के निर्माण में जिस पत्थर और संरचना का इस्तेमाल किया गया है और जिस दिशा में केदारनाथ मंदिर बना है, उसी की वजह से यह मंदिर उस भीषण आपदा में भी बच गया। तो 400 साल तक बर्फ में दबे रहने और 2013 में भीषण आपदा झेलने के बावजूद केदारनाथ मंदिर भी आज तनकर खड़ा है, तो इसे लोग भले ही ईश्वरीय चमत्कार मान लें, लेकिन सदियों पुराने इस मंदिर की बनावट की दाद तो देनी ही पड़ेगी।

 

 

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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