May 15, 2026
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टिहरी के राजा ने बिना सड़क के पहाड़ पर चढ़ा दी थी गाड़ी! — मनु पंवार

पहले मुर्गी आई या अंडा—इसी तर्ज पर अगर पूछा जाए कि पहले सड़क आई या कार, तो सहज उत्तर होगा कि पहले सड़क बनेगी, तभी गाड़ी चलेगी। जहां सड़क न हो, वहां गाड़ी कैसे चल सकती है? लेकिन उत्तराखण्ड के एक नगर में इसका उलटा हुआ—वहाँ सड़क बाद में बनी और गाड़ी पहले पहुँच गई। यह कोई सुनी-सुनाई बात नहीं, बल्कि एकदम सत्य घटना है।

यह किस्सा आज से लगभग सौ साल पुराना है, जब देश आज़ाद नहीं हुआ था। हिमालयी क्षेत्र में टिहरी नाम की एक रियासत हुआ करती थी, जहाँ गढ़वाल के पंवार वंश के राजा शासन करते थे। महाराजा कीर्ति शाह के निधन के बाद अप्रैल 1913 में उनके पुत्र महाराजा नरेंद्र शाह टिहरी रियासत की गद्दी पर बैठे। उनके शासनकाल में टिहरी में सड़क संपर्क को लेकर महत्वपूर्ण कार्य हुए।

हालांकि टिहरी में गाड़ियाँ वास्तव में 1940 में चलनी शुरू हुईं, जब ऋषिकेश से टिहरी तक सड़क निर्माण पूरा हुआ। तब तक महाराजा नरेंद्र शाह उम्र के ढलान पर पहुँच चुके थे। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि टिहरी नगर में सड़क पहुँचने से कई साल पहले ही मोटर गाड़ी पहुँच चुकी थी। और यह संभव हुआ स्वयं राजा की इच्छा और जुगाड़ से।

यह मोटर गाड़ी आम जनता के लिए नहीं थी, बल्कि राजा, राजपरिवार और उनके अंग्रेज़ मेहमानों के उपयोग के लिए थी। उस समय टिहरी में सड़क तो दूर, पहाड़ी पगडंडियों से ही आवागमन होता था। लोग पैदल चलते थे, जबकि राजा-महाराजा घोड़े या पालकी का उपयोग करते थे। लेकिन मोटर गाड़ी रखने का शौक महाराजा नरेंद्र शाह को भी हो गया।

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक महिपाल सिंह नेगी ने अपनी पुस्तक ‘टिहरी की जलसमाधि’ में इसका उल्लेख किया है। वे लिखते हैं कि जब ऋषिकेश-टिहरी मोटर मार्ग नहीं बना था, तब मोटर गाड़ी के पुर्जों को खच्चरों पर लादकर ऋषिकेश से टिहरी लाया गया और वहीं उन्हें जोड़कर गाड़ी तैयार की गई। इस तरह टिहरी वह नगर बना, जहाँ सड़क से पहले गाड़ी पहुँची।

राजपरिवार मोती बाग और टिहरी बाज़ार के बीच इसी गाड़ी से आवागमन करता था। गाड़ी के चलने लायक रास्ता अलग से बनाया गया था। जब यह गाड़ी टिहरी बाज़ार से गुजरती, तो लोग आश्चर्य और कौतूहल से उसे देखा करते थे, क्योंकि उनके लिए वह एक बिल्कुल नई चीज थी। दूर-दूर तक राजा की मोटर गाड़ी की चर्चा होने लगी थी।

ऋषिकेश से टिहरी तक मोटर मार्ग न होना महाराजा नरेंद्र शाह को बहुत खलता था। इसी कारण उन्होंने 1920 में अपने नाम पर ऋषिकेश से लगभग सोलह किलोमीटर ऊपर पहाड़ी पर नरेंद्र नगर बसाना शुरू किया। महिपाल सिंह नेगी के अनुसार, लगभग दस वर्षों में तीस लाख रुपये खर्च कर नरेंद्र नगर बसाया गया, जिससे टिहरी के विकास में कुछ ठहराव भी आया।

1926 में नरेंद्र नगर तक सड़क बन गई और 1940 में टिहरी तक मोटर मार्ग तैयार हो गया। हालांकि पाँच वर्षों तक गाड़ियाँ भागीरथी नदी के पार पुराने बस अड्डे तक ही आती थीं, क्योंकि 1924 की बाढ़ में टिहरी का पुराना पुल बह गया था। बाद में उसी स्थान पर लकड़ी का पुल बनाया गया।

इसी लकड़ी के पुल से 1945 में राजकुमार बालेन्दु शाह ने पहली बार स्वयं गाड़ी चलाकर टिहरी बाज़ार और राजमहल तक पहुँचाई।

इसी दौर में ऋषिकेश से आगे सड़क निर्माण का एक और कठिन कार्य हुआ, जो तोता घाटी से जुड़ा है। यह स्थान ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग पर पड़ता है, जहाँ कठोर चट्टानों को काटकर सड़क बनाना लगभग असंभव माना जाता था। उस समय आधुनिक उपकरण भी उपलब्ध नहीं थे।

टिहरी रियासत की ओर से जब सड़क बनाने का निर्णय हुआ, तो अधिकांश ठेकेदारों ने हाथ खड़े कर दिए। तब प्रतापनगर के ठेकेदार तोता सिंह रांगड़ ने यह चुनौती स्वीकार की। उन्होंने सब्बल और छेनी जैसे साधारण औजारों की मदद से उस चट्टानी पहाड़ को काटकर मार्ग तैयार किया।

इस कार्य में इतना खर्च हुआ कि उन्हें अपने घर के जेवर तक बेचने पड़े और मजदूरों का भुगतान करना भी कठिन हो गया। आर्थिक रूप से यह उनके लिए भारी घाटे का सौदा था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और काम पूरा कर दिखाया।

उनकी इस जीवटता से प्रभावित होकर महाराजा नरेंद्र शाह ने उस स्थान का नाम ‘तोताघाटी’ रखने का आदेश दिया और तोता सिंह रांगड़ को अपनी नई राजधानी नरेंद्र नगर में बसने के लिए स्थान प्रदान किया।

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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