April 14, 2026
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बी.मोहन नेगी: उनके हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं

चित्रकार बी.मोहन नेगी ‘मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो, मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं।‘ जगजीत सिंह की गायी राजेश रेड्डी की ग़ज़ल की ये पंक्तियां अक्सर कानों में गूंजती है. बी.मोहन नेगी का जब कभी भी ज़िक्र आता है, तो मुझे ये पंक्तियां बरबस ही याद आ जाती

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हरिद्वार या हरद्वार : सही नाम क्या है?

क्या आपने कभी सोचा कई जगह आपको हरिद्वार का नाम अंग्रेजी में हरद्वार क्यों लिखा मिलता है? जब इसका नाम हरिद्वार है-तो अंग्रेजी में भी  H-A-R-I-D-W-A-R होना चाहिए, लेकिन बहुत सी जगहों में इसका अंग्रेजी नाम हमें हरद्वार-यानी  H-A-R-D-W-A-R लिखा मिलता है…ऐसा क्यों होता है? इस वीडियो में इस रहस्य को टटोलने की कोशिश करते हैं,और

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…जब एचएन बहुगुणा ने इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ ‘देवता’ नचाया

( भारतीय राजनीति में हेमवती नन्दन बहुगुणा की गिनती एक धाकड़ और विद्रोही किस्म के नेताओं में होती है. वो किस कदर निडर लीडर थे, इसका एक बहुत ही दिलचस्प किस्सा है. जब उन्होंने इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ देश की राजधानी में गढ़वाली में एक व्यंग्य गीत गाया और ढोल बजाया था. उस किस्से को विस्तार से मैंने

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मेरे अध्यापक, जिन्होंने विविधता के सौंदर्य की समझ विकसित की

इंद्र मोहन मुदगिल. यही नाम था हमारे स्कूल के प्रिंसिपल का, जिन्होंने हमें पर्यावरण संरक्षण की व्यावहारिक सीख दी. जिन्होंने पेड़ों की अहमियत बताई. फूलों के होने का मतलब समझाया. जिन्होंने आंगन में दूब के उगने का अर्थ बतलाया. जिन्होंने बगीचे को संवारने का शऊर दिया और फलदार वृक्षों की महत्ता समझाई. वो मुदगिल साहब ही

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वो आदमी नहीं, मुकम्मल बयान है…

(जो लोग उत्तराखण्ड के पहाड़ों के समाज, जीवन और वहां के लोक की संस्कृति को समझते–जानते हैं, उनके लिए नरेन्द्र सिंह नेगी कोई अपरिचित नाम नहीं है. नेगी पहाड़ के सबसे चर्चित, सबसे लोकप्रिय, सबसे प्रतिष्ठित गीतकार/ गायक/ कवि हैं. उत्तराखण्ड में घर–घर जाने जाते हैं और अपने गीतों के साथ प्रवासी उत्तराखण्डियों के घर–घर

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राजेन टोडरिया : एक जीनियस पत्रकार की याद

वो 5 फरवरी की ही तारीख थी. साल 2013. सुबह-सुबह की बात है. दिल्ली में घर पर सोया हुआ था. देहरादून से पत्रकार मित्र राकेश खण्डूड़ी  का फोन आया. अधजगी हालत में फोन उठाया. उधर से कांपती आवाज़ में सुनाई दिया- टोडरिया जी नहीं रहे. यह बताते-बताते राकेश फफक-फफक कर रो पड़ा. बयां नहीं कर

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राकेश खण्डूड़ी : एक भलेमानुस का जाना

हरिद्वार के खड़खड़ी घाट पर अपने अभिन्न मित्र राकेश खण्डूड़ी को हमेशा के लिए विदा करके लौट आया हूं. लेकिन कल दिल्ली से पहले हरिद्वार और फिर उसके घर डोईवाला (देहरादून) पहुंचने तक और फिर रात को डोईवाला से दिल्ली लौटने में जितना भी समय लगा, उस पूरे वक़्त राकेश के साथ बिताया समय किसी

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कृपया दरवाजों से हटकर खड़े हों !

शम्मी नारंग के साथ मुलाकात की एक तस्वीर कुछ आवाज़ें, कुछ छवियां ज़ेहन में हमेशा ताज़ा रहती हैं. बरसों तक, दशकों तक, उम्र भर गूंजती रहती हैं. शम्मी नारंग भी ऐसी ही शख्सियत हैं. बहुत ज्यादा वक़्त नहीं बीता है लेकिन मानो एक युग गुज़र गया है. दूरदर्शन के युग में, जबकि टेलीविज़न न्यूज़ में

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चले आए शिवजी की बारात में !

हमारी नगरी पौड़ी (उत्तराखंड) के क्यूंकालेश्वर में शिव की मूरत बचपन का किस्सा है. पहाड़ में कई बार स्कूल जाते वक्त कोई किताब, कॉपी या पेन-पेंसिल घर में छूट जाती थी या होमवर्क करके नहीं जाते थे, तो क्लास में मास्साब अक्सर ताना मारा करते थे. कहते-‘क्या शिवजी की बारात में आए हो?’  हमारे मास्टरजी का

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इस ‘पण्डत’ को हिमाचल नहीं भुला पाएगा

हिमाचल प्रदेश में सुखराम अपने समर्थकों/प्रशंसकों के बीच ‘पण्डत सुखराम’ के नाम से जाने जाते थे. समर्थकों के लिए वो देश में संचार क्रांति के मसीहा रहे हैं. हालांकि बहुत से लोगों को उनका नाम इसलिए याद होगा क्योंकि वो नरसिम्हा राव सरकार में हुए संचार घोटाले के आरोपी थे. जो उनके नाम से कतई

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