May 7, 2026
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राकेश खण्डूड़ी : एक भलेमानुस का जाना

हरिद्वार के खड़खड़ी घाट पर अपने अभिन्न मित्र राकेश खण्डूड़ी को हमेशा के लिए विदा करके लौट आया हूं. लेकिन कल दिल्ली से पहले हरिद्वार और फिर उसके घर डोईवाला (देहरादून) पहुंचने तक और फिर रात को डोईवाला से दिल्ली लौटने में जितना भी समय लगा, उस पूरे वक़्त राकेश के साथ बिताया समय किसी चलचित्र की तरह ज़ेहन में घूमता रहा.

 

राकेश देहरादून में ‘अमर उजाला’ अख़बार का स्टेट ब्यूरो चीफ था. कोविड के बाद उसे हार्ट संबंधी दिक्कत उभर आई थी. मुझसे कह रहा था कि सीने में जकड़न जैसा महसूस कर रहा हूं. पहले हिमालयन हॉस्पिटल जॉलीग्रांट और फिर एम्स ऋषिकेश की जांचों से पता चला कि उसके हार्ट में कुछ ब्लॉकेज है. वैसे हमारे यहां इंसानी जान की कोई कद्र या कीमत होती तो इस दिशा में कोई गंभीर काम हो रहा होता कि आखिर कोविड के बाद हार्ट की समस्या इतनी क्यों बढ़ रही है.

 

राकेश के पास दो रास्ते थे या तो स्टेंट डलवाता या फिर बाईपास सर्जरी. उसने बाईपास का विकल्प चुना. मैंने उसे कहा था कि दिल्ली एम्स में कुछ जुगाड़ ढूंढते हैं. सर्जरी यहां करवाना. मैं भी हूं ही यहां. लेकिन उसने कुछ व्यावहारिक दिक्कतों का हवाला देते हुए एम्स ऋषिकेश को ही चुना.

बहरहाल, बुधवार 27 अगस्त 2025 को एम्स ऋषिकेश में राकेश की बाइपास सर्जरी हुई थी. जैसा घरवालों ने बताया, उसके बाद वो होश में आ गया था. पत्नी स्मिता से उसने बात की थी। उन्हें घर जाने को कहा था। लेकिन बुध और गुरुवार की आधी रात को जाने क्या हुआ कि अचानक उसकी सांसें थम गईं और उसने हमेशा के लिए आंखें बंद कर लीं. अभी 55 साल का ही था.

 

राकेश 26 साल का नाता तोड़कर चला गया. 1999 से वह मेरा जोड़ीदार था. हालांकि राकेश मुझसे उम्र में कुछ बड़ा था, लेकिन उसके साथ ऐसा कभी महसूस ही नहीं हुआ. अपने से छोटा होने के बावजूद उसने मुझे बहुत वेटेज और बहुत सम्मान दिया. वह दोस्त ही नहीं, भाई की तरह था. उसका मुझ पर बहुत भरोसा था. मेरा भी उस पर भरोसा था.

 

1999 में जब ‘अमर उजाला’ अख़बार पहली बार यूपी से बाहर लॉ़न्च हो रहा था तो हिमाचल संस्करण के लिए अतुलजी (अमर उजाला के बॉस दिवंगत अतुल माहेश्वरी) ने वहां के लिए एक टीम बनाई, उसमें शिमला में स्टेट ब्यूरो के लिए राजेन टोडरिया, दर्शन सिंह रावत, राजू बंगवाल, राकेश खण्डूड़ी और मुझे भेजा गया. मैं उन दिनों पौड़ी से ‘अमर उजाला’ के लिए काम कर रहा था. राकेश डोईवाला (देहरादून ज़िला) से रिपोर्ट कर रहा था.

 

लेकिन राकेश से पहली बार शिमला में ही मिलना हुआ. फिर बहुत जल्द ही हम जोड़ीदार बन गए. टोडरिया जी की लीडरशिप में ऐसी धुआंधार रिपोर्टिंग की कि हम दोनों वहां एक धाकड़ जोड़ी के रूप में मशहूर हो गए. किसी ने तो नाम भी रखा था- वॉल्श-एंब्रोज, वसीम-वक़ार. प्रतिद्वन्दी अख़बारों ने हमारी जोड़ी तोड़ने के लिए कुछ आकर्षक ऑफर भी दिए, लेकिन हम लोग उन दिनों टोडरिया जी की लीडरशिप में जुनून की हद तक पत्रकारिता कर रहे थे. सो, अमर उजाला में डटे रहे. जवानी के उन दिनों में लंबे समय तक तो बगैर ‘वीकली ऑफ’ के भी काम किया.

 

राकेश और मैं एक ही कमरे में और दो चारपाइयों को जोड़कर बनाए ‘डबल बेड’ पर रहे. सुख-दुख, हर्ष, उल्लास, किस्से-कहानियां, सहमतियां- असहमतियां, स्टोरी आइडिया – सब कुछ साझा करते. एक समय हम दोनों को अपना रुटीन दुरुस्त करने का ‘आत्मज्ञान’ प्राप्त हुआ, तो दोनों मॉर्निंग वॉक पर भी निकल पड़ते. शिमला के डेजी बैंक एस्टेट से रिज़, आईजीएमसी, संजौली से जाखू होते हुए कुछ समय तक हमारा सुबह की सैर का अच्छा रुटीन भी बन गया था लेकिन यह शौक ज़्यादा दिन तक बरकरार नहीं रह पाया.

 

इसकी वजह ये थी कि शिमला में मैं, राकेश और हमारे ब्यूरो चीफ राजेन टोडरिया जी एक ही फ्लैट में रहते थे और हमारा बहुत कीमती समय शुरू होता था रात 11 बजे के बाद. तब हम सभी खबरें फाइल करने के बाद फारिग होते थे. डिनर के बाद रात-रात भर तक समय-सामयिक मुद्दों से लेकर राजनीति, समाज, फिल्म, क्रिकेट, पत्रकारिता जैसे तमाम विषयों पर बहसें, तर्क-वितर्क, कविताओं का आदान-प्रदान, समीक्षा, करेक्शन, हंसी ठट्ठा, चुहलबाजी, यह सब लगभग नियमित था. उस दौरान टोडरिया जी को रौ में सुनना कुछ अलग ही आनंद देता था. तो ऐसा करते-करते काफी रात हो जाती थी और हमें सुबह जगने में काफी दिक्कत होने लगती. सो, मेरी और राकेश की मॉर्निंग वॉक उस रात्रि के ‘सत्संग’ की भेंट चढ़ गई, हालांकि उन सत्सगों ने हमारी समझ के द्वार भी खोले.

 

ख़ैर, फिर कुछ साल बाद मैं शिमला छोड़कर टेलीविज़न न्यूज़ में काम करने दिल्ली पहुंच गया. मेरे फैसले से राकेश बहुत विचलित था. फिर भी उसने मुझे बहुत भारी मन से विदा किया. टोडरियाजी मेरे मेंटोर थे. वह इस कदर इमोशनल थे कि वहां से निकलते हुए मुझसे मिले ही नहीं. राकेश, टोडरियाजी के साथ शिमला में ही डटा रहा. टोडरियाजी ने ‘अमर उजाला’ छोड़कर बाद में ‘भास्कर’ जॉइन किया तो वह भी गया. फिर कुछ ऐसे हालात पैदा हुए कि भास्कर भी छोड़ना पड़ा. इसके बाद राकेश के पत्रकारीय जीवन में संघर्ष का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि उसे पटरी पर आने में लंबा वक्त लग गया. उस कठिन समय में उसने शिमला में एक मैगजीन में भी काम किया.

बाद में टोडरियाजी हिमाचल छोड़कर देहरादून आ गए. राकेश भी देहरादून में एक बड़े अख़बार के किसी बड़े आदमी के भरोसे में आकर शिमला से देहरादून पहुंच गया लेकिन उसे यहां नौकरी नहीं मिली. धोखे मिले. विश्वासघात मिला. इसकी एक वजह यह भी थी कि राकेश स्वभावत: चंट नहीं था. सीधा-सरल-सच्चा पहाड़ी आदमी था. भलामानुस था . उसे देखकर मुझे वीरेन डंगवाल की वह कविता अक्सर याद आती-

‘इतने भले नहीं बन जाना साथी

जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी’

 

देहरादून में उसे नए सिरे से संघर्ष करना पड़ा. लेकिन वह दौर काफी लंबा खिंच गया. उसने टोडरिया जी की मैगजीन ‘जनपक्ष आजकल’ में भी काम किया, जिसमें कभी-कभार दिल्ली से मैं भी कंट्रीब्यूट किया करता था. फिर कुछ और छिटपुट काम किए. ‘जनवाणी’ अख़बार में काम किया. बाद में मेरे सहपाठी योगेश भट्ट के साथ ‘दैनिक उत्तराखण्ड’ में बेहतरीन काम किया. वो जब भी मुझे आदेश देता, मैं भी कुछ न कुछ लिखकर भेज देता.

कई साल के बाद 2016 में राकेश मेनस्ट्रीम में आ गया. उसकी ‘अमर उजाला’ में वापसी हुई. देहरादून में स्टेट ब्यूरो चीफ बना. 2017 में उसे बड़ा रिपोर्टिंग असाइनमेंट मिला. उत्तराखण्ड का विधानसभा चुनाव कवर करने अलग-अलग इलाकों में जाना था. जैसे मैंने पहले भी बताया, वह मुझ पर बहुत भरोसा करता था. वह चुनावी कवरेज के लिए फील्ड में पहुंचा तो उस दौरान मुझे रोज़ फोन करता. हम स्टोरीज पर डिस्कस करते. मैं उससे स्टोरी के शीर्षक के साथ आइडिया शेयर करता. उस दौरान उसने मेरी सुझाई कई स्टोरीज़ कीं. उसे दाद मिलती, मुझे खुशी मिलती. एक दिन फोन पर कहने लगा- यार, तुम्हारे हिस्से की तारीफ़ें मुझे मिल रही हैं. बाद में भी जब कभी भी किसी स्टोरी पर फंस जाता तो मुझे फोन करता था कि कोई धांसू सा हेडिंग (शीर्षक) दो. और जब हेडर उसे जच जाता तो बालोचित उत्साह में कहता, यार मज़ा आ गया. उसकी खुशी से मुझे भी खुशी मिलती.

असल में टोडरियाजी की संगत में यह हमारी ट्रेनिंग थी. हम स्टोरी लिखने से पहले हेडर (शीर्षक) देने में ख़ासा मंथन करते. उसके बाद स्टोरी में फ्लो आ जाता है. कहानी भटकती नहीं है.

 

वैसे राकेश और मेरा संबंध कभी औपचारिक नहीं रहा. वह मुझ पर अधिकार मानता था, मैं भी उस पर हक़ मानता था. मुझे कभी देहरादून में ज़रूरी काम पड़ जाता, तो उसे बता देता. वह लगकर उसे करवाकर ही दम लेता.

लेकिन उसने अपने लिए कुछ नहीं किया. ‘अमर उजाला’ जैसे बड़े अखबार का स्टेट ब्यूरो चीफ होने के बावजूद वह बाइक से अपने घर डोईवाला (देहरादून और ऋषिकेश के बीच एक कस्बा) आता जाता. वो भी कामकाज निपटाकर मध्य रात्रि तक घर पहुंचता. उसे हाल में जब डॉक्टरों ने बाइक से आना-जाना अवॉइड करने को कहा तो वह बस से जाने लगा. सोचिए, यह उस देहरादून की बात है जहां कि लाखों के सरकारी विज्ञापन के लिए किसी अज्ञात से अख़बार की मुश्किल से 10 प्रतियां छापने वाला भी SUV गाड़ी से और मोटे अक्षरों में ‘संपादक’ की नेम प्लेट लगाकर पूरी ठसक के साथ चलता है.

लेकिन देहरादून में, जहां कि पत्रकारनुमा एक तबका गैर-पत्रकारीय तरीक़ों से आर्थिक तौर पर बहुत समृद्ध हुआ है (भले ही पत्रकारिता गर्त में पहुंच गई), वहां पर राकेश खण्डूड़ी का होना ही एक आश्वस्ति था. जैसे घनघोर अंधेरे के बीच कोई दिया सा जलता हुआ. वह काजल की कोठरी में भी बेदाग रहा, क्योकि राकेश ईमान का पक्का था. वह स्वाभिमानी आदमी था. बड़े सपने नहीं देखता था.उसकी ऊंची महत्वाकांक्षायें नहीं थी. वह कम में ही संतुष्ट होने वाला व्यक्ति था. सम्मान से जीने और सम्मान की रोटी खाने में यकीन रखता था.

देहरादून के एक संस्थान में उसने अपने बेटे का BCA में एडमिशन कराने के लिए खासी दौड़-धूप की लेकिन किसी की मदद नहीं ली. मुझसे बोला- एक सत्तासीन आश्चर्य कर रहा था कि यहां तो ज्यादातर मीडियावाले अपने बच्चों की फीस तक सरकारी खाते से करवाने की जुगत में रहते हैं और एक तुम हो कि बेटे के लिए एडमिशन तक के लिए हमसे नहीं कहा. यहीं पर हमें राकेश खण्डूड़ी के होने के मायने पता चलते हैं.

इस दौर में इतनी ईमानदारी और इतना भला आदमी कहां मिलता है भला ! हालांकि, ऐसा नहीं था कि लालच उसके सामने नहीं परोसे गए थे, लेकिन वो फिसला नहीं. ईमान से डिगा नहीं. देहरादून में पत्रकारिता कितने कीचड़ में धंसी हुई है, उससे और बेहतर तरीके से समझने में मुझे राकेश से ही मदद मिली.

12 साल पहले टोडरियाजी के अचानक चले जाने से देहरादून में मैंने एक अभिभावक खोया था, अब राकेश के जाने से तो एक पुल ही टूट गया है.

 

जाओ राकेश ! इस दुनिया को तुम जैसे भलेमानुस की ज़रूरत नहीं रही.

(1999 या 2000 के आसपास ‘अमर उजाला’ के शिमला ऑफिस की फोटो)

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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