May 7, 2026
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लोग-बाग

राजेन टोडरिया : एक जीनियस पत्रकार की याद

वो 5 फरवरी की ही तारीख थी. साल 2013. सुबह-सुबह की बात है. दिल्ली में घर पर सोया हुआ था. देहरादून से पत्रकार मित्र राकेश खण्डूड़ी  का फोन आया. अधजगी हालत में फोन उठाया. उधर से कांपती आवाज़ में सुनाई दिया- टोडरिया जी नहीं रहे. यह बताते-बताते राकेश फफक-फफक कर रो पड़ा. बयां नहीं कर सकता उस वक्त क्या हालत हो गई थी. मानो किसी ने सिर पर भारी-भरकम हथौड़े मार दिए हों. सीने पर टनों वजन रख दिया हो। गहरे सदमे में आ गया. सूचना सुनकर पैरों तले ज़मीन खिसक गई. बेचैनी होने लगी. लगा जान अब गई कि तब गई. किचन में दौड़कर दो गिलास पानी गटके. बाथरूम गया. मेरे लिए यह सूचना किसी वज्रपात से कम न थी.

कैसे यकीन कर सकता था? राजेन टोडरिया जी हमारे मेंटर रहे हैं. उनसे पत्रकारिता का ककहरा सीखा, पत्रकारिता की तमीज़ सीखी. उनकी सोहबत में चीज़ो को समझने की अक्ल आई. उनकी संगत ने एक नई नज़र दी. उनकी लेखनी का तो ज़माना मुरीद था. उत्तराखंड से लेकर दिल्ली और हिमाचल तक उनके मुरीदों की संख्या अनगिनत है. वो शायद इकलौते पत्रकार होंगे जिनकी रिपोर्टें अब तक पाठकों को उनके शीर्षक समेत याद हैं. वो वाक़ई जीनियस थे. टोडरिया जी की रिपोर्ट्स के शीर्षक बेहद मारक हुआ करते थे. उनके जैसा लड़ाका, पढ़ाकू, बेबाक, जुनूनी और साहसी पत्रकार और आंदोलनकारी मैंने आज तक नहीं देखा.

‘अमर उजाला’ अख़बार में काम करने के दौरान शिमला में हम करीब चार-पांच साल साथ रहे. वो हमारे बॉस थे लेकिन हम उन्हें कहते थे ‘भाई साहब’.एक ही घर में रहे. तीसरे माले पे ऑफिस था और ग्राउंड फ्लोर पर हम रहते थे.

हमारा बहुत कीमती समय शुरू होता था रात 11 बजे के बाद. तब हम सभी खबरें फाइल करने के बाद फारिग होते थे. डिनर के बाद रात-रात भर तक समय-सामयिक मुद्दों से लेकर राजनीति, समाज, फिल्म, क्रिकेट, पत्रकारिता जैसे तमाम विषयों पर बहसें, तर्क-वितर्क, कविताओं का आदान-प्रदान, समीक्षा, करेक्शन, हंसी ठट्ठा, चुहलबाजी, यह सब लगभग नियमित था. उनको रौ में सुनना कुछ अलग ही था।

लगता है जैसे कल की ही बात हो. कैसे भूल सकता हूं शिमला के डेजी बैंक एस्टेट इलाके में वो ग्राउंड फ्लोर का फ्लैट. उन दिनों के किस्से-कहानियां, यादें, हंसी-ठट्ठा सब वहीं हैं. बीच में शिमला जाना हुआ तो लगा जैसे टोडरिया जी यहीं कहीं मिल जाएंगे, माल पे, रिज पे, कॉफी हाउस में.

नब्बे के दशक में ‘अमर उजाला’ में जब मैं अपने गृह नगर पौड़ी में अंशकालिक संवाददाता था, तो टोडरिया जी टिहरी जैसे छोटे से पहाड़ी नगर से पूरे प्रदेश (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में छाए हुए रहते थे. उनकी रिपोर्टों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती थी. पाबौ का आदमखोर बाघ, हिमालय, गंगा, बर्फ, गौमुख के ग्लेशियर की चिंता…जंगलों की फिक्र… न जाने उनकी कितनी रिपोर्टें ‘अमर उजाला’ के सभी संस्करणों में पहले पेज की बॉटम स्टोरी हुआ करती थीं. मेरे जैसे न जाने कितने पत्रकारों ने उनकी रिपोर्टें पढ़-पढ़कर ही सीखने की कोशिश की. न जाने कितने एकलव्यों के लिए वो गुरु द्रोण की तरह थे. क्या कमाल की शैली थी. लेखनी में क्या धार थी. क्या लय थी. एकदम चमत्कृत कर देने वाला लेखन. शब्दों के जादूगर थे टोडरिया जी. पत्रकारिता में मिसाल बनने वालों चुनींदा लोगों में से एक नाम. लेकिन खुद के प्रति उतने ही लापरवाह. जिसकी वजह से वो हमसे बहुत दूर चले गए.

मुझे नहीं पता कि आज राजेन टोडरिया जी होते तो आज के हालातों पर क्या लिखते? लेकिन इतना ज़रूर यकीन है कि वो चुप नहीं बैठे होते. खलबली मचाए होते. अपनी धारदार लेखनी से, अपनी चोट करती रिपोर्टों से, अपने तीखे और करिश्माई अंदाज़ से.

अपने लेखन के लिए उन्हें कभी किसी बड़े माध्यम की जरूरत महसूस नहीं हुई. जब हिमाचल से अमर उजाला और दैनिक भास्कर छोड़कर देहरादून लौटे तो अपने माध्यम खुद बनाए. पत्रिका, अख़बार, ब्लॉग, सोशल मीडिया. जहां हाथ डाला, वहीं खलबली मचाए रहे. उत्तराखंड की राजनीति और वहां की सरकारों में भी. उनका जैसा कोई न था. लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जिस वक्त पहाड़ को टोडरिया जी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब वो चले गए. कभी न लौटने के लिए.

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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