May 15, 2026
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किस्सागोई

नैनीताल में कभी घोड़े-खच्चरों को मिलता था ‘वीकली ऑफ’- मनु पंवार

आपको ध्यान होगा कि देश की दूसरी बडी आईटी कंपनी इन्फोसिस के को-फाउंडर एन. नारायण मूर्ति ने कुछ समय पहले एक बयान देकर अपनी भारी फजीहत करा डाली थी। उन्होंने ज्ञान दिया था कि आज के युवाओं को सफल होने के लिए हर हफ्ते लगभग 70 घंटे काम करना चाहिए। इसका मतलब कि अगर किसी कंपनी में फाइव डेज वीक है…तो वहां काम करने वाले युवाओं को 14 घंटे रोजाना काम करना चाहिए। अगर सिक्स डेज वीक है तो करीब 13 घंटे रोजाना काम करना चाहिए..नारायणमूर्ति चाहते हैं कि आदमी मशीन हो जाए..

लेकिन इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनी L&T के सीएमडी एस. एन. सुब्रह्मण्यम तो इस मामले में इंफोसिस वाले नारायणमूर्ति से भी कई कदम आगे निकल गए थे…इसी साल की शुरुआत में यानी जनवरी 2025 में उन्होंने अपनी कंपनी के कर्मचारियों से कहा कि ‘मुझे इस बात का अफसोस है कि मैं आपको रव‍िवार के द‍िन यानी छुट्टी के दिन ऑफिस नहीं बुला पा रहा हूं. सच कहूं तो अगर आप रविवार के द‍िन भी काम करेंगे तो आप ज्‍यादा खुश रहेंगे. आप घर पर बैठकर क्‍या करेंगे? कब तक आप अपनी पत्‍नी का चेहरा देखेंगे, कब तक आपकी पत्‍नी आपका चेहरा देखेगी. Come-on, ऑफिस आओ और काम करो.’

मतलब इंसान की वर्क-लाइफ बैलेंस और मानस‍िक सेहत की ऐसी-तैसी करा दो…लेकिन आपको जानकर ताज्जुब होगा कि नैनीताल में कभी घोड़े-खच्चरों तक को वीकली ऑफ मिला करता था। जी हां, सही सुना आपने। घोड़े-खच्चरों को भी वीकली ऑफ का प्रावधान था और ये नियम स्ट्रिक्टली फॉलो होता था। हालांकि ये आज की बात नहीं है, ये अंग्रेजों के जमाने की बात है..

नैनीताल को अंग्रेजों ने ही बड़े कायदे से बसाया और संवारा था…किसी दौर में नैनीताल यूनाइटेड प्रोविंसेज यानी आज के उत्तर प्रदेश की समर कैपिटल यानी ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था…तो अंग्रेजों ने यहां के लिए काफी सख्त रूल्स एंड रेगुलेशंस बनाए और लागू भी किए…

उस जमाने में नैनीताल में सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि जानवरों के लिए भी कुछ नियम-कायदे तय किए गए थे…इसका जिक्र प्रयाग पांडे की लिखी किताब-नैनीताल- एक धरोहर में भी मिलता है…उसमें लिखा गया है-’1937 में मेजर एडवर्ड जेम्स कार्बेट ने म्यूनिसिपैलिटी की बैठक में घोड़े, खच्चर और गधों को संचालित करने के लिए चार जानवरों पर एक व्यक्ति रखने का प्रस्ताव रखा। यही नहीं, इन जानवरों को जुलाई और अगस्त महीने को छोड़कर प्रत्येक शुक्रवार को अवकाश देने का प्रस्ताव पेश किया गया।’

ये जिन मेजर एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट का जिक्र आया है, वो नैनीताल म्यूनिसिपैलिटी के मेंबर हुआ करते थे… तो नैनीताल में अंग्रेजों के जमाने में घोड़े, खच्चर, गधे को भी वीकली ऑफ मिलता था और आज देश के बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स के फाउंडर या सीईओ अपने कर्मचारियों से अपेक्षा कर रहे हैं कि उनके लिए कामकाजी हालात गधों से भी बदतर रहें…वो संडे को भी काम करने दफ्तर आ जाएं। कमाल ही है।

वैसे उन दिनों नैनीताल में घोड़े-खच्चरों की उपयोगिता बहुत थी..वो यातायात का प्रमुख साधन तो थे ही, सामान ढोने के लिए भी वे लोगों या कहें तो अंग्रेजों की जरूरत हुआ करते थे..नैनीताल में तो साल 1893 में तांगे चलने लगे थे..लिहाजा घोड़ों की उपयोगिता हमेशा बनी रही…ये मल्लीताल की एक पुरानी तस्वीर में भी आपको घुड़सवार दिख रहा होगा…

नैनीताल सड़क मार्ग से जुड़ा 1915 में जब काठगोदाम-नैनीताल सड़क बनाई गई….लेकिन उससे पहले तक यहां तक पहुंचने के लिए तांगे ही प्रमुख साधन थे, लिहाजा उस दौर में घोड़े खच्चर नैनीताल के जीवन का बहुत ही जरूरी हिस्सा थे।

नैनीताल में अंग्रेजों ने जानवरों के लिए कई और भी दिलचस्प नियम तय किए हुए थे…जैसे कि यहां उस दौर में ऊंट पर टोल टैक्स लिया जाता था…मतलब अगर कोई बाहर से ऊंटों को किसी काम के लिए ला रहा है या ऊंटों में सामान ढोकर लाया जा रहा है, तो ऊंटों की नैनीताल में एंट्री कराने के लिए बाकायदा टोल टैक्स देना पड़ता था…और टोल टैक्स तब के हिसाब से बहुत महंगा था…पूरे बारह आना…यानी 75 पैसे…

बाद में यानी 1936 में नैनीताल में ऊंट पर टोल टैक्स 12 आना यानी 75 पैसे से घटाकर आठ आना यानी पचास पैसा कर दिया गया। मतलब कि ऊंट वालों को पच्चीस पैसे की राहत दी गई…

1936 में ब्रिटिश राज में ही नैनीताल म्यूनिसिपैलिटी की मीटिंग में एक और दिलचस्प फैसला हुआ था…और फैसला क्या था, बकरियों पर टैक्स लगाने का…जी हां, बकरियों पर टैक्स…लेकिन क्यों?

इसका जिक्र भी प्रयाग पांडे की लिखी किताब-नैनीताल- एक धरोहर में मिलता है. उसमें लिखा है-’नगर पालिका के तत्कालीन सदस्य मेजर एडवर्ड जेम्स कार्बेट ने 1936 में नगर पालिका की बैठक में बकरियों पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। एडवर्ड जेम्स कार्बेट का कहना था कि बकरियों से नगर पालिका तथा निजी वनों को क्षति पहुंच रही है। जिसे देखते हुए नगर पालिका द्वारा प्रति बकरी प्रति माह आठ आना कर लगाने का निर्णय लिया गया।’

तो 1936 में नैनीताल में बकरियों पर टैक्स लगाना शुरू कर दिया गया…सालभर तक इसके असर का आकलन किया गया तो जिनके पास बकरियां थीं, उनकी ओर से कुछ चिंतायें-कुछ शिकायतें म्यूनिसिपैलिटी के सामने रखी गईं…

तब 1937 में मेजर एडवर्ड जेम्स कार्बेट के प्रस्ताव रखे जाने के बाद ही ये तय किया गया कि- ‘1937 में नैनीताल नगर पालिका ने बकरी के साथ तीन महीने से कम उम्र के छौने (यानी बकरी के बच्चे) को कर मुक्त करने का निर्णय लिया। मां के साथ तीन महीने की उम्र तक के बकरी के बच्चे कर मुक्त हो गए।’

आज ये बात सुनकर आपको हंसी भी आएगी और हैरानी भी होगी…लेकिन अंग्रेजों के दौर में नैनीताल में बकरी पालने के लिए लाइसेंस लेना जरूरी था।

उस दौर में अंग्रेजों ने नैनीताल को साफ-सुथरा रखने और यहां के पेड़-पौधों को बचाने के लिए सारे जतन किए।

वैसे नैनीताल में ज्यादातर अंग्रेजों का ही वास था तो उन्होंने नैनीताल में रहने वालों को स्वस्थ और सेहतमंद बनाए रखने के लिए एक नियम ये भी बनाया था कि नैनीताल में कोई भी फल और सब्जी बिना धुले नहीं आ सकती थी।

1940 में नैनीताल आने वाले फल और सब्जियों को पोटेशियम परमेंगनेट के घोल में धोकर ही नगर में आने देने का नियम बना।

इसकी निगरानी के लिए नैनीताल के जो भी एंट्री पॉइन्ट्स थे, उनमें म्यूनिसिपैलिटी के हेल्थ इंस्पेक्टरों की निगरानी में चौकियां बनाई गईं..इन चौकियों में पोटेशियम परमेंगनेट युक्त पानी के बड़े बड़े टब होते थे।

नैनीताल में लाए जाने से पहले फलों और सब्जियों को इन टबों में धोया जाता था। इसके बाद ही बिक्री के लिए इन्हें अंदर नगर में आने दिया जाता था।

तो इस तरह अंग्रेजों ने नैनीताल की एक आदर्श हिल स्टेशन के रूप में हैसियत बनाए रखी..उसे मेंटेन किए रखा,,,इसके पीछे भले ही उनका प्रकृति प्रेम भी रहा हो लेकिन उनका लालच और उनकी जरूरत भी थी..

उन्होंने झील के नगरी नैनीताल में अपने लिए एक यूरोप खोज लिया था..तो जैसा प्रयाग पांडे भी लिखते हैं कि अंग्रेजों ने नैनीताल को कंट्री रिट्रीट यानी उच्च वर्ग के लिए शांत और एकांत नगर के रूप में बसाया और विकसित किया….

आज नैनीताल के जो हाल हो गए हैं, वो सबके सामने हैं,,,अतीत से सबक लेना तो हमने छोड़़ ही दिया है।

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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