शिमला के मशहूर रिज़ पर एक और मूर्ति लग गई है. इस बार दिवंगत वीरभद्र सिंह की प्रतिमा यहां लगाई गई. कल सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं की मौजूदगी में इस प्रतिमा का अनावरण किया गया.
रिज़ शिमला की धड़कन है. अब ये दिवंगत हस्तियों की प्रतिमाओं वाला स्थल हो गया है. बहुत पहले से यहां बापू की प्रतिमा स्थापित है. फिर हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा देने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाई गई. फिर हिमाचल के संस्थापक डॉ. यशवंत सिंह परमार की. लेफ्टिनेंट जनरल दौलत राम की मूर्ति भी यहीं लगी है. बाद में बीजेपी को लगा कि रिज़ पर हमारा भी कोई ‘प्रतिनिधित्व’ होना चाहिए तो उन्होंने बड़ा ज़ोर लगवाके आखिरकार अपने युग पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी को भी यहां स्थापित कर दिया.
इस बीच, चार साल पहले 2021 में कोविड से वीरभद्र सिंह का निधन हो गया. उसके बाद से रिज़ पर उनकी प्रतिमा लगाने के लिए उनके समर्थक ज़ोर लगाए हुए थे. अब चार साल बाद कल ये काम भी हो गया. अब हाथ हिलाकर अभिवादन करती ‘राजा साब’ (हिमाचल में लोग उन्हें सम्मान से ऐसे ही पुकारते रहे हैं) की प्रतिमा भी रिज़ पर खड़ी हो गई है.
वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के 6 बार के मुख्यमंत्री. 5 बार के लोकसभा सांसद रहे. इन्दिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह के कार्यकाल में केन्द्रीय मंत्री रहे. 4 बार हिमाचल कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. वीरभद्र दो बार कोरोना की चपेट में आए थे, लेकिन तीसरी बार जिन्दगी की लड़ाई हार गए. वरना उससे पहले तक उन्होंने कैसी-कैसी मुश्किल लड़ाइयां जीती थीं.
एक किस्सा याद आ रहा है. शायद 2003 के शुरुआत की बात होगी. हिमाचल में हुए चुनाव के बाद बीजेपी की प्रेम कुमार धूमल सरकार जाती रही. कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई.अब कांग्रेस में लड़ाई ये छिड़ गई कि सीएम कौन बने. तब कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष विद्या स्टोक्स का दस जनपथ में बड़ा दबदबा था. उन्होंने अपने कुछ समर्थकों के साथ दिल्ली दौड़ लगाई. लगा कि सीएम बनकर ही लौटेंगी. उनमें इंदिरा गांधी की झलक दिखती रही है. लोग मज़ाक में कहते थे कि स्टोक्स मैडम में तो सोनिया गांधी को अपनी सास की छवि दिखती होगी. सो, विद्या जी की ताजपोशी तय है.
लेकिन विजेता वीरभद्र को दिल्ली दरबार में हाजिरी देना गवारा न था. उन्होंने कह दिया कि मैं दिल्ली नहीं जाऊंगा. जिसको बात करनी है, शिमला आकर बात करे. वीरभद्र के समर्थक विधायकों का शिमला के होली लॉज (वीरभद्र का निजी आवास) में जमावड़ा लग गया. तमाम मीडिया भी वहां था. मेले का सा माहौल था.
विधायक कई दिन तक वहीं रहे, वहीं खाया-पीया. वीरभद्र ने भी होली लॉज से बाहर कदम नहीं रखा. कांग्रेस हाईकमान को झुकना पड़ा. झख मारकर दिल्ली से कुछ नेता शिमला भेजने पड़े. वीरभद्र विधायक दल के नेता चुने गए और मुख्यमंत्री बने. विद्या स्टोक्स सोनिया गांधी की बेहद करीबी होने के बावजूद सीएम की रेस हार गईं. मौका उनके हाथ को आया, मुंह न लगा.
वीरभद्र दिल्ली को ठेंगे पर रखते थे, चाहे मामला कोई भी हो. इसकी वजह भी थी. वह बड़े जनाधार वाले और बहुत लोकप्रिय नेता रहे हैं. चुनाव के दिनों में तो कांग्रेस के उम्मीदवार इस बात को लेकर ज़ोर लगाए रहते थे कि एक बार उनके यहां राजा साहब की रैली हो जाए तो नैय्या पार हो जाए. उनको लेकर एक नारा बहुत चलता था- ‘राजा नहीं फ़क़ीर है/हिमाचल की तक़दीर है.’ वीरभद्र सिंह फिज़ा बदल देने वाले नेता थे. वीरभद्र के जाने के बाद तो ऐसा लगने लगा था कि एक चेहरे के तौर पर हिमाचल में कांग्रेस अनाथ हो गई है.
वीरभद्र सिंह किसी ज़माने की बुशहर रियासत के राजा पद्म सिंह के बेटे थे लेकिन उनमें वैसी राजसी ठसक नहीं थी, बल्कि वो एक टिपिकल पहाड़ी राजा की तरह थे. वो मास लीडर बने. हिमाचल के संस्थापक डॉ. यशवंत सिंह परमार के बाद वीरभद्र सिंह को ही इतना सम्मान, इतनी लोकप्रियता हासिल हुई. वो पहाड़ी हितों के बड़े संरक्षक, बड़े पैरोकार थे. उन्होंने हिमाचल के हक़ पर आंच नहीं आने दी।
वैसे वह एक टिपिकल पहाड़ी मिजाज़ के नेता रहे हैं. जल्दी नाराज़ हो जाने वाले, फिर जल्दी मान जाने वाले.
एक और किस्सा याद आ रहा है. हिमाचल में ‘अमर अजाला’ अख़बार के साथ पत्रकारिता के दिनों में हम लोग देर से सोने वाले और देरी से जगने वाली प्रजातियों में रहे हैं. शिमला के डेजी बैंक एस्टेट एरिया में ऊपर की मंजिल में हमारा ऑफिस था और भूतल पर रिहाइश. शुरू में हम चार लोग एक साथ रहते थे, हमारे बॉस (दिवंगत) राजेन टोडरिया, दर्शन सिंह रावत, (दिवंगत) राकेश खण्डूड़ी और मैं. बाद में रावतजी कहीं और रहने लगे तो हम बाकी तीन लोग कुछ बरस साथ रहे.
उन देर से जगने वाले दिनों में अक्सर एक फोन कॉल हमें बहुत सुबह जगा देती थी. वह कॉल होली लॉज (वीरभद्र के निजी आवास) से आती थी और फोन पर प्राय: होते थे खुद वीरभद्र सिंह या उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह जो कहती थीं कि -हैलो ! टोडरिया जी हैं? राजा साहब बात करेंगे. फिर हम आंखों को मीचते, अधजगी हालत में भाई साहब टोडरिया जी को जगाते थे.
तब वीरभद्र सिंह हिमाचल में नेता प्रतिपक्ष थे और सरकार बीजेपी की थी और सीएम थे धूमल साहब. वीरभद्र फोन अक्सर तब ही करते थे जब उन्हें हमारी किसी खबर/ रिपोर्ट से कोई शिकायत होती, फिर चाहे वो हिमाचल के किसी भी ज़िले से छपी हो. या तब करते थे जब उनको लगता कि उनका पक्ष सही तरीके से नहीं आ पाया है. लेकिन उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि ख़बर ग़लत है या ऐसे कैसे लिख दिया.
बहरहाल, वीरभद्र सिंह देश के उन गिने-चुने नेताओं में से रहे हैं जोकि जीते-जी अपने राज्य, अपने समाज, वहां के लोकजीवन में किस्से-कहानियों का हिस्सा हो गए थे. उनकी शख्सियत ही कुछ जुदा थी. वो पब्लिक से नेता की तरह नहीं, बल्कि एक अभिभावक की तरह बात करते थे. कभी-कभी तो बहुत छोटी-छोटी बातों की ओर भी ध्यान दिलाया करते थे. मुझे एक और दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है.
साल 2003 की बात है. शिमला स्थित राज्य अतिथि गृह ‘पीटर हॉफ’ के लॉन में हिमाचल रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन का कोई कार्यक्रम था. बतौर सीएम वीरभद्र का संबोधन हुआ. ड्राइवर-कंडक्टरों से बोले- “ये जो आप लोग बस चलाते हुए बीड़ी फूंकते हो न, ये बंद कर दो।” पूरे पण्डाल में ठहाके गूंज उठे। वीरभद्र बोले- “एक तो पहाड़ में घुमावदार सड़कें होती हैं. बीड़ी पिओगे तो धुआं बस में घूमता रहेगा. यात्रियों को दिक्कत होगी. उल्टियां करने लगेंगे. फिर कितना काम बढ़ जाएगा. बस को साफ करना पड़ेगा”। पंडाल में बैठे ड्राइवर-कंडक्टर बोले- राजा साब, ये हमने पहले ही बंद कर दिया. फिर भी आइंदा से आपको कोई शिकायत नहीं मिलेगी.
एक बार बतौर मुख्यमंत्री भ्रमण के दौरान PWD के गेस्ट हाउस में पहुंचे. उन्होंने पर्दों की तरफ देखा. बोले- ये कैसी कर्टेन लगाई हैं. एक तो कहीं से मैच नहीं हो रही हैं और दूसरी साफ धुली भी नहीं हैं। टूरिस्ट में क्या मैसेज जाएगा. वीरभद्र के जाते ही सारे पर्दे उतवा दिए गए. नए पर्दों का ऑर्डर हो गया. वीरभद्र बहुत छोटी-छोटी चीजों/ बातों का भी ध्यान रखने वाले नेताओं में से थे.
एक किस्सा और याद आ रहा है. एक दफा हिमाचल के एक मंत्री के रिश्तेदारों पर PWD की मेहरबानी पर मैंने एक खोजी रिपोर्ट ‘अमर उजाला’ में छापी. उस दौरान हिमाचल का विधानसभा सत्र चल रहा था. मैं शिमला नगर निगम में बैठा हुआ था. वीरभद्र के करीबी एक नेता का फोन आ गया. बोले- राजा साहब आपसे मिलना चाहते हैं. मैंने वजह पूछी तो कहने लगे, शायद आपकी स्टोरी के सिलसिले मे. मैंने कहा- अरे भई, मैंने स्टोरी में सारे फैक्ट्स लिखे हैं. मिलने का औचित्य समझ में नहीं आया. वो आख़िर जानना क्या चाह रहे हैं?
उस नेता ने गुजारिश की. बोला, बाकी बातें आप राजा साहब से ही पूछ लेना. वो नेता अपने साथ मुझे विधानसभा तक ले गये. अब वीरभद्र मुखातिब थे. बोले- आपने बढ़िया स्टोरी की है. आज मैं इसे हाउस में उठाऊंगा. बस इतनी सी बात हुई. मैं किसी और खोजबीन में जुटा था, उस संक्षिप्त मुलाक़ात के बाद लौट आया. बाद में पता चला कि उन्होंने सदन में हमारा अखबार लहराया. विधानसभा में तब भारी हंगामा हो गया. सरकार के एक मंत्री ने ललकारा कि मैं इस रिपोर्टर को नोटिस भेजूंगा. नोटिस तो आया नहीं, सरकार की किरकिरी हो गई.
उस दौरान हिमाचल के राजनीतिक हालात पर हमारे बॉस राजेन टोडरिया ने सुखराम को फीनिक्स पक्षी की तरह कहा था जोकि अपनी ही राख से फिर जिंदा हो जाता है. मुझे लगता है, हिमाचल प्रदेश की राजनीति में असली फीनिक्स वीरभद्र सिंह थे. राजनीति में जब-जब उनके मर्सिये गाए जाने लगे, वो और भी ज्यादा मज़बूत होकर उभरे और छा गए.
लेखक के बारे में
(मनु पंवार, हिमालयन टॉक्स के एडिटर-इन-चीफ हैं. प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रेडियो और डिजिटल मीडिया का करीब ढाई दशक का अनुभव है)

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