ALMORA KACHHARI
अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी ढ़ल ही नहीं सकी। कोर्ट कचहरी से लोग डरते हैं और अपन का बचपन, कई शामें और कई दिन कचहरी में बीते। अपन लोग अल्मोड़ा के बाजार के लोग थे, सो खेलने कूदने की जगह कम थी। अपने मोहल्ले में खेलने की एक ही जगह हो सकती थी वो कचहरी था। खजांची मोहल्ले की तंग गली को पारकर बाजार में दाखिल होना होता था और दस कदम ऊपर चलकर मुड़ना होता था। फिर जूते वाले सलीम भाई की दुकान से ऊपर सीढ़ियों की तरफ बढ़ो तो कचहरी की सीढ़ियों में दाखिल हो जाते हैं। सर्दियों की कई शामों में कचहरी बंद भी नहीं हो पाती थी कि हम लोग बल्ले और बॉल के साथ पहुंच जाते और खेल शुरू हो जाता । वकील कम अर्जीनवीसों की पटखाटें स्टंप बन जाती । हमारे हाथों में जान कम थी, तो अपने ज्यादातर शॉट कचहरी की सीमाओं के अंदर ही लगते थे लेकिन संतोष भाई के शॉट कमाल के होते थे।कई बार उन्होंने कचहरी की सीमा को पार करते हुए, नीचे केमू स्टेशन की तरफ, गेंदों को पहुंचाया था। Puran Bisht पूरन दा बल्ले के हत्थे में थूक बहुत लगाते थे, उनके साथ बैटिंग करने वाला एक रन लेने में आनाकानी करता क्योंकि फिर हाथ में थूक से लिथड़ा बल्ला आना होता था।
पटाल के मुख्य प्रांगण के दाईं तरफ प्राचीन राम मंदिर है और ठीक सामने लोअर कोर्ट। बैंटिंग छोर लोअर कोर्ट के ठीक सामने होता था। कई बार यॉर्कर बॉल सीधे लोअर कोर्ट के शीशे तोड़ती हुई अंदर पहुंच जाती । जब शीशे टूटते तो एक ही काम बचता, सिर पर हाथ रखकर नौ दो ग्यारह हो जाना। उस जमाने के जज सीधे होते होंगे, बार बार ऑफिस के शीशें टूटे तो बवाल भी हो सकता है लेकिन शीशा टूटने के दूसरे दिन हम फिर पहुंच जाते और क्रिकेट शुरू हो जाता। लोअर कोर्ट के बगल में बार एसोशिएशन का दफ्तर था और उसके बगल में पुलिसवालों का हॉस्टल। जिस तरफ पुलिसवालों का हॉस्टल था उस तरफ जाने में डर लगता। डर इस बात का लगा रहता कि कभी कोई पुलिसवाला पकड़ न ले और जेल में बंद न कर दे। हालांकि क्रिकेट खेलते खेलते कुछ पुलिसवालों से दोस्ती भी हो गई थी। कुछ पुलिसवाले हमारे साथ क्रिकेट खेलने लगे थे और धीरे धीरे पुलिस का खौफ जाता रहा। कचहरी में कई फरियादे आते। दूर दूर से आते। उस दिन भी शायद वो फरियादी ही होगा। कचहरी के सिस्टम का पीड़ित। सिर घुटा हुआ, दाढ़ी बढ़ी हुई, निर्बल दुर्बल। हमारी क्रिकेट खेलने की जगह के करीब ही वो बैठा था। किसी के बल्ले से एक शॉट पड़ा और बॉल उसके सिर पर लगी। उसका सिर कुछ डिग्री झुका और फिर अपनी ही जगह पर आ गया। दर्द से कांप गया था वो लेकिन चू तक नहीं की। वो इतना निर्बल था कि बल्लेबाज की इस हरकत का विरोध भी नहीं कर सका और ज्यूं का त्यूं अपनी ही जगह पर बैठा रहा। उसके सिर पर लगी चोट और बॉल के सिर पर लगने की खटाक की आवाज़ कई दिनों तक मेरे अंदर गूंजती रही। आज भी कभी कभी गूंजती है। कचहरी एक तरीके से भूल भुलैया था। पूरा कचहरी कम से कम चार हिस्सों में बंटा है। मैन गेट से एंट्री की तरफ ट्रेजरी थी। ट्रेजरी दो मंजिला थी और पूरी तरह लकड़ी की बनी हुई थी। छिपन छिपायी के लिए ट्रेजरीवाली मंजिल को मुफीद माना जाता। उन बरामदों में जाने पर कौतुहल होता और डर भी लगता। सूरज की रौशनी जब तक रहती तब तक तो वहां छिपा जा सकता था लेकिन रौशनी के कम होते ही वो बरामदे भुतहा हो जाते। ऊपर से सिर कटे भूत की चर्चाएं पूरे मोहल्ले में थी। कहा ये भी जाता कि सिर कटा खचांजी बाजार के मुहल्ले की गली से लेकर कचहरी तक घूमता रहता है। पुराने जमाने के राजा और रानियों, उनके दास-दासी, प्रहरी, सुरक्षाकर्मियों को लेकर भी कई किवदंतियां, अफवाहें थी। हम बच्चे जान हथेली पर लेकर छिपन छिपाई खेलते। कई बार हम किसी बच्चे के साथ मजे लेने के लिए उसे ट्रेजरी की ऊपरी मंजिल पर छिपने की सलाह देते। शाम ढलते ही हम सब सुनियोजित षंडयंत्र की तहत कचहरी से निकल भागते और घर पहुंच जाते। शाम ज्यादा गहरी हो जाने के बाद वो बच्चा कचहरी से निकलता और बाप बाप कहते घर पहुंचता। उस पर सामुहिक रूप से हंसने का कार्यक्रम अगले दिन होता। कचहरी के मुख्य गेट से घुसते ही दाईं तरफ जेल के दो कमरे बने होते थे। उन अस्थाई जेलों में उन लोगों को रखा जाता जो ट्रायल के लिए सेशन कोर्ट लाए जाते थे। हाथों में हथकड़ी पहने और जेल में बंद कैदियों को देखकर हमारी झुर-झुरी छूट जाती। हर कैदी मर्डरर लगता था और ये भी अंदेशा होता था कि ये कैदी छूटा तो सीधे मेरा ही गला पकड़ लेगा। अस्थाई जेल के ठीक बगल में कैंटीन थी। कैंटीन के समोसे मशहूर थे। एक बार ऐसे शख्स ने भी उस कैंटीन को चलाया जो बहुत अच्छा गाना गाता था। कैंटीन के थोड़ा से आगे जाने पर अर्जीनवीशों के लिए एक बड़ा अहाता बना हुआ था। जिस पर ढेरों लकड़ी की पटखाट हुआ करती थी। दिन में इन पटखाटों पर कानूनी काम होता, प्रशासन के खुर पेंच होते, टाइप राइटरों की खटाखट होती लेकिन रात को ये पटखाटें शहर के बेघरों की चैनगाह होती। कई भिखारी, कई बेघर सारी सारी रात इन पटखाटों पर सोकर बिताते थे और सुबह अर्जीनवीशों के आते ही फुर्र हो जाते। अर्जीनवीसों के इस अहाते के ठीक सामने एक बैडमिंटन कोर्ट भी है। बाद में जब हमारे पास बैंडमिंटन आया तो इसी कोर्ट में हाथ साफ किया। कई बार प्रशासन के बड़े बड़े अफसर यहां बैडमिंटन खेला करते और हम बाबुओं की ठसक देखकर खुद को चींटी सा बौना महसूस करते। अर्जीनवीसों के अहाते के ठीक बगल में था हॉटलाइन रूम। इन दोनों के ठीक बीच में थी एक गली जो आपको कचहरी की बाउंड्री वॉल तक ले जाती। उसी बाउंड्री वॉल पर हवा भीषण चलती। वहीं चढ़कर हम पतंग उड़ाते। बाउंड्री वॉल से पतंग उड़ाना रिस्की था क्योंकि नीचे गिरे तो बाजार की दुकानों के छत पर गिर पड़ते और जान भी जा सकती थी लेकिन हम रिस्क लेते और मजे से पतंग भी उड़ाते। इसी बाउंड्री वॉल को लेकर ये किवदंती भी थी कि सैकड़ों साल पहले कचहरी की ये पीछे वाली दीवार बनती और फिर ढ़ह जाती। दीवार का रात के समय भरभराकर गिरना कई बार हुआ। दीवार का बनना दूर की कौड़ी साबित होने लगा। फिर ठेकेदार को सपना आया कि वो बाउंड्री वॉल के गड्ढे में किसी जिंदा आदमी को दफ्न कर देगा तो दीवार टूटने का नाम नहीं लेगी। ठेकेदार ने सपने पर विश्वास किया और गड्ढे खोदते हुए तीन मेट यानी नेपाली मजदूरों को जिंदा दफ्न कर दिया। यहां मजदूर दफ्न हुए और उधर दीवार तामील हो गई। उन दफ्न मजदूरों का डर भी हमें यदा कदा सताते रहता। कभी कभी लगता कि पतंग उड़ाते उड़ाते वो दफ्न नेपाली मजदूर झम से सामने खड़े हो जाएंगे..नेपाली में बोलेंगे ‘’कस्तो भन्यो’’ और पतंग की डोर खींच लेंगे। कचहरी की इस टॉप की जगह से पतंग उड़ाते हुए भी नियम वही था, शाम ढलते ही घर की तरफ दौड़ लगाना। हॉटलाइन कमरे के ठीक सामने एक बरामदा था। उस बरामदे में धरना प्रदर्शन होता रहता था। कई लोग कई दिनों तक अनशन करते थे। बचपन में ऐसे लोग हमें बेवकूफ लगते। बड़े हुए तो ऐसे लोगों से हम आंखें चुराने लगे। इसी बरामदे के ठीक सामने पांगर का पेड़ था। पांगर के पेड़ पर जब पांगर लगते तो दर्जनों पांगर घर पहुंच जाते। कुछ खेलने के काम आते और कुछ मारने के। जो जगह धरना प्रदर्शन वाली है, उसके ठीक बगल में डीएम ऑफिस है। डीएम ऑफिस से गुजरते हुए भी कई बार झुर झुर्री होती। ये मुगालता रहता कि जिले का सबसे बड़ा अफसर हम बच्चों का शरारतों का हिसाब न लगा ले और अपन को सजा न दे दे। हालांकि वो दिन कभी नहीं आया। डीएम ऑफिस के सामने तिरंगा फहराने की जगह है। ये जगह हिमालय दर्शन की सबसे मुफीद जगह है। शहर की सबसे ऊंची जगह होने की वजह से नंदादेवी हिमालयन रेंज बेहद सुहानी लगती है। सुबह और शाम के समय हिमालय देखना सुखद अहसास देता है। अल्मोड़ा कचहरी ने मुझे एक बड़ा सबक और दिया है। किस्सा कुछ यूं है कि कचहरी के राम मंदिर से हमारी दो दोस्त बहनों ने कुछ रूपये उठा लिए। ये बात जब मुझे पता लगी तो मेरा खून खौलने लगा। मुझे ये बात हजम ही नहीं हुई कि कोई कैसे भगवान के चरणों से रूपये चोरी कर सकता है। हम सभी बच्चों ने उन बहनों को सबक सिखाने की ठानी। सुनियोचित तरीके से उन्हें मेरे घर के आंगन में बुलाया गया और उनकी कुटाई की गई। दोनों बहनों की आंखों में आंसू थे। और वो हम से गुहार लगा रहे थे कि अब वो भगवान के पैसे नहीं उठाएंगी। आज की परिस्थितयों में उस किस्से को तोलता हूं तो लगता है कि कम ज्ञान धर्मान्धता को चरम पर ले जाता है।
लेखक के बारे में
(संजय बिष्ट अल्मोड़ा के मूल निवासी हैं. फिलहाल दिल्ली में एक न्यूज़ चैनल में काम कर रहे हैं.)

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