March 9, 2026
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स्मृति शेष : मंगलेश डबराल काफलपाणी कि वो ‘लालटेन’ जिसने दुनिया में रोशनी फैलाई

हो सकता है कि काफलपानी गांव के बारे में टिहरी के बाहर बहुत लोगों को पता न हो। लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में लोगों ने काफलपानी का नाम सुना हुआ है। वो इसलिए क्योंकि वहां मंगलेश डबराल पैदा हुए थे। हमारे देश के जाने-माने कवि, लेखक, सम्पादक, अनुवादक मंगलेश डबराल। वह कवि जो सबसे प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी अवॉर्ड से सम्नित हैं। जिनका साल 2020 में दिल्ली के एम्स अस्पताल में देहांत हुआ। मंगलेश जी कोरोना की चपेट में आ गए थे लेकिन जिंदगी की लड़ाई हार गए। 72 साल की उम्र में परलोक सिधार गए।

 

मंगलेश डबराल को याद करने की कई वजहें हैं। पहली वजह तो यह है कि जिन्होंने दुनिया में अपनी मेधा की धाक जमाई, वह हमारे उत्तराखण्ड के थे। टिहरी गढ़वाल ज़िले में काफलपाणी गांव के मूल निवासी थे जिनकी पढ़ाई-लिखाई उस ज़माने में देहरादून में हुई थी। वह कोई मामूली हस्ती नहीं थे, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कवि थे। उनका लिखा हुआ दुनिया की कई भाषाओं में पढ़ा जाता है। जैसे हम विदेशी भाषाओं के जाने-माने कवि-साहित्यकारों को पढ़ते हैं, वैसे ही विदेश में मंगलेश डबराल को पढ़ा जाता है।

 

मंगलेश जी कितने बड़े लेबल के कवि रहे हैं, इसका आकलन करने के लिए मैं बहुत छोटा हूं लेकिन जिस कवि की कबिता जर्मनी में एक शहर की म्यूनिसिपल्टी के गेट पर उकेरीं गई हो,  उससे अंदाजा लगा सकते हैं कि वह कोई मामूली कवि तो रहे नहीं होंगे।  मंगलेश जी के लिखे की ताकत यह है कि उन्होंने बहुत मामूली सी चीजों में भी बहुत बड़ी बात लेख दी। बहुत गहरी बात कह दी। जैसे उनकी यह कविता है-

 

पहाड़ पर चढ़ते हुए

तुम्हारी साँस फूल जाती है

आवाज़ भर्राने लगती है

तुम्हारा क़द भी घिसने लगता है

पहाड़ तब भी है जब तुम नही हो ।

 

 

मंगलेश जी मेरे प्रिय कवि हैं। हैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वह अपनी कविताओं में जिंदा हैं। उनसे से आमने-सामने का परिचय मेरा साल 203 में हुआ। और पहली ही मुलाकात में मैं उस विलक्षण इंसान का मुरीद हो गया। मंगलेश जी के साथ वह मुलाकात उन दिनों हुई जब मैं अख़बार की नौकरी छोड़कर टेलीविजन न्यूज़ की नौकरी के वास्ते शिमला से दिल्ली पहुंचा। हम गढ़वाली लोग जब दिल्ली आते हैं तो सबसे पहले नाते-रिश्तेदारों को खोजते हैं, फिर परिचित लोगों के बारे में पता करते हैं। मेरे नाते-रिश्तादार तो दिल्ली में गिनती के ही थे लेकिन एक पत्रकार के तौर पर अपने पहाड़ के कुछ बड़े लोगों से मुलाकात हुई। हालांकि उनमें से ज्यादातर लोगों से मेरी शुरुआती मुलाकात प्रतिमा खण्डित होने जैसे अनुभव वाली रही। लेकिन मंगलेश डबराल जी से मुलाकात के बाद वो कड़वा अनुभव धुल गया। मंगलेश जी भले ही कम बात करते थे, लेकिन पहाड़ और पहाड़ी को लेकर उनके चेहरे पर एक अलग सी चमक दिख जाती थी।

 

उस समय उनको देखकर मुझे उनकी ही लिखी एक कविता यादआ गई-

 

आधा पहाड़ दौड़ाता है

आधा दौड़ाता है हमारा बोझ

आधा प्रेम दौड़ाता है

आधा दौड़ाता है सपना

दौड़ते हैं हम।

 

 

जो जैसे मैंने बताया कि मेरी उनके साथ आमने-सामने की पहली मुलाकात साल 2003 में हुई थी। मंगलेश जी उस वक्त साप्ताहिक अखबार ‘सहारा समय’ के साहित्य सम्पादक हुआ करते थे। तब वह जनसत्ता छोड़कर वहां पहुंचे थे। हम एक ही कैंपस में काम करते थे लेकिन मंगलेश जी से पहली मुखाभेंट के वास्ते मुझे बहुत साहस जुटाना पड़ा। आखिर हिन्दी के चर्चित कवि और साहित्य अकादमी से सम्मानित कवि से मुलाकात होने थी जिनकी कविता पढ़कर हम बड़े हुए। वह तब एक नामी सम्पादक भी थे और अनुवादक के रूप में भी उनका बड़ा नाम था।

उनसे मुलाकात हुई तो फिर मेरी शुरुआती झिझक गायब हो गई। मैंने उनको बहुत ही सहृदय और शालीन इंसान पाया। फिर तो दिल्ली से लेकर हिमाचल और उत्तराखण्ड के बारे में खूब छ्वीं-बथ हुई। उन्होंने ‘सहारा समय’ साप्ताहिक में मशहूर ग़ज़ल गायक गुलाम अली का मेरा इंटरव्यू प्रकाशित किया। कालका-शिमला रेल लाइन के सौ साल पूरे होने पर उन्होंने मुझसे लिखवाया और उसे छापा।

 

उन दिनों सहारा समय में छपना बड़ी बात थी क्योंकि उसके संपादक मंगलेश जी थे। वो दिल्ली के साहित्य जगत में हमारे पहाड़ की सबसे बड़ी हस्ती थे। वह हमारा गौरव थे, जो इतने बड़े कवि होने के बावजूद अपनी जड़ों को नहीं भूले थे। वह कवि जिन्होंने अपने पहाड़ के लोक कलाकारों तक को अपनी कविताओं में जिंदा रखा। पहाड़ के बड़े  लोककलाकार केशव अनुरागी पर मंगलेश जी की यह कविता याद आती-

 

बिना शिष्य का गुरु केशव अनुरागी 

नशे में धुत्त सुनाता था एक भविष्यहीन ढोल के बोल 

किसी ने नहीं अपनाई उसकी कला 

अनछपा रहा वर्षों की साधना का ढोल सागर 

इस बीच ढोल भी कम होते चले गए हमारे गाँवों में 

कुछ फूट गए कुछ पर नई पूड़ें नहीं लगीं 

उनके कई बाजगी दूसरे धंधों की खोज में चले गए “ 

 

दिल्ली में आकर मंगलेश जी को समझने के और भी कई मौके आए। उनके प्रति सम्मान और बढ़ा। मैं उनका मुरीद हो गया जब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के बारे में उनकी बारीक जानकारी के बारे में मुझे पता चला। मैं तब और भी चौंक गया जब मैंने उनकी आवाज़ में शास्त्रीय संगीत कि कुछ बंदिशें (रचनायें) सुनीं। गज़ब के आदमी थे मंगलेश डबराल। शास्त्रीय संगीत पर उनकी पकड़ कैसी थी, इसकी झलक उनकी एक कविता ‘संगतकार’ में मिलती है।

 

एक इंसान के तौर पर भी मैंने मंगलेश जी को बहुत अलग पाया। हालांकि उनसे मुलाकात और बातचीत के दौरान न जाने क्यों एक झिझक सी मुझ में हमेशा बनी रही। शायद वह उनके प्रति सम्मान का भाव था। साल 2007 में जब संगीत, रंगकर्म, सिनेमा की बड़ी हस्तियों के साथ मेरी इंटरव्यू की किताब ‘समय से संवाद’ हिंदी अकादमी दिल्ली से छप रही थी तो झेंप-झेंप कर मैंने मंगलेश जी से भूमिका लिखने का आग्रह किया। उन्होंने भी बिना टालमटोल के भूमिका लिखी। मैंने उस समय बहुत सम्मानित महसूस किया क्योंकि मैं तो एक बहुत ही मामूली सा लेखक/पत्रकार रहा हूं।

ऐसे ही नौबत वर्ष 2014 में भी आई, जब मेरी एक और किताब “गाथा एक गीत की- द इनसाइड स्टोरी ऑफ नौछमी नारेणा” प्रकाशित हो रही थी। उस समय भी पुस्तक की भूमिका लिखने के वास्ता मैं मंगलेश जी के पास ही गया। उस समय वह बहुत व्यस्त थे। अनुवाद, किताब, संपादन, कविता, गोष्ठी कई कामों में व्यस्त थे, लेकिन उन्होंने मुझे निराश नहीं किया।

 

मंगलेश डबराल जी की लिखी उस भूमिका के कुछ अंश यहां दे रहा हूं- “मनु पंवार ने अपनी पुस्तक गाथा एक गीत कीमें नौछमी नारेण नामक इस परिघटना की ऐतिहासिकता और सामाजिकता की पड़ताल करने की एक गंभीर कोशिश की है. उन्होंने यह रेखांकित भी किया कि वे कौन से कारण और कारक हैं जो समकालीनता के किसी बिंदु पर एक साहित्यिक अभिव्यक्ति को ऐतिहासिक आयाम दे देते हैं और उसे लोक स्मृति में भेज देते हैं. नौछमी नारेण को एक महत्वपूर्ण परिघटना मानते हुए लेखक ने एक शोधार्थी की तरह इस गीत के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक आयामों की विस्तार से खोजबीन की है और उत्तराखण्ड की लोकगीति परम्परा में उसकी स्थिति का निर्धारण किया है.”

 

मंगलेश जी ने मुझे कभी निराश नहीं किया, लेकिन साल 2020 में बहुत उदास, बहुत बेचैन कर गए मंगलेश जी। उनकी खास बात यह थी कि पहाड़ को उन्होने बिल्कुल नहीं बिसराया। उनका कविता संग्रह- ‘पहाड़ पर लालटेन’  इसका गवाह है। ऐसा लगता था कि जैसे पहाड़ उनके भीतर बहुत गहरे जमा रहा। काफलपाणी गांव से वाया देरादून दिल्ली तक की अपनी यात्रा पर उन्होंने एक छोटी सी लेकिन जबर्दस्त कविता लिखी छै, जोकि पलायन पर एक जोरदार कविता है-

मैंने शहर को देखा

और मुस्कुराया

वहाँ कोई कैसे रह सकता है

यह जानने मैं गया

और वापस न आया

 

 

administrator
अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी ढ़ल ही नहीं सकी। कोर्ट कचहरी से लोग डरते हैं और अपन का बचपन, कई शामें और कई दिन कचहरी में बीते। अपन लोग अल्मोड़ा के बाजार के लोग थे, सो खेलने कूदने की जगह कम थी। अपने मोहल्ले में खेलने की एक ही जगह हो सकती थी वो कचहरी था

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