March 27, 2026
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लिखा-पढ़ी

हरिद्वार या हरद्वार : सही नाम क्या है?

क्या आपने कभी सोचा कई जगह आपको हरिद्वार का नाम अंग्रेजी में हरद्वार क्यों लिखा मिलता है? जब इसका नाम हरिद्वार है-तो अंग्रेजी में भी  H-A-R-I-D-W-A-R होना चाहिए, लेकिन बहुत सी जगहों में इसका अंग्रेजी नाम हमें हरद्वार-यानी  H-A-R-D-W-A-R लिखा मिलता है…ऐसा क्यों होता है? इस वीडियो में इस रहस्य को टटोलने की कोशिश करते हैं,और ये भी जानने की कोशिश करते हैं कि अगर सही नाम-हरिद्वार है तो फिर हर की पैड़ी का नाम हरि की पैड़ी क्यों नहीं हुआ? Cआपको ताज्जुब हो सकता है लेकिन हमारे पहाड़ का जो ग्राम्य जीवन है न.. उसमें आज भी हरिद्वार को हरद्वार कहा जाता है.. मतलब अंग्रेजी की स्पेलिंग में कहें तो -H-A-R-I-D-W-A-R नहीं, बल्कि H-A-R-D-W-A-R…हर द्वार….

 

मेरे जेहन में कई बरस से ये बात आती थी कि आखिर जब नाम हरिद्वार है, तो भला हमारे पहाड़ों में लोग इसे हरद्वार क्यों उच्चारित करते होंगे?..फिर सोचा कि लोकजीवन में कई नाम-कई शब्द अपभ्रंश हो जाते हैं…बिगड़ जाते हैं… तो हो सकता है कि हरिद्वार से हरद्वार भी ऐसे ही अपभ्रंश हो गया होगा…जैसे हमारी गढ़वाली बोली में आम तौर पर श्रीनगर को सिन्नगर और बदरीनाथ को बदिन्नाथ उच्चारित किया जाता है…

 

लेकिन नब्बे के दशक के आखिरी दौर मेंं मैं पत्रकारिता के सिलसिले में अपने वाले पहाड़ से निकलकर हिमाचल प्रदेश पहुंचा और वहां कुछ साल रहा, तो वहां देखा कि उस पहाड़ के लोग, खासकर पुराने और बुजुर्ग लोग भी हरिद्वार को हरद्वार ही उच्चारित कर रहे हैं….फिर मेरा माथा ठनका कि ऐसे कैसे सकता है.. हमारे गढ़वाल और कुमाऊं में चलो उच्चारण का चक्कर हो सकता है …हरि-कहना उतना सहज-सरल नहीं लगा होगा, जितना-हर-कहना… तो  हो सकता है कि इस वजह से वो अपभ्रंश होकर हरिद्वार के बजाय हरद्वार हो गया होगा..  लेकिन मैंने हिमाचल में भी बुजुर्ग लोगों से हरिद्वार की जगह  हरद्वार  सुना तो इससे मुझे ये बात समझ में आई कि ये सिर्फ उच्चारण का मसला नहीं हो सकता…अगर उच्चारण की गलती होती तो इस नाम का चलन सिर्फ हमारे गढ़वाल और कुमाऊं में ही होता…हिमाचल में भी भला क्यों होगा..इसीलिए मैंने सोचा कि इसे खंगाला जाए क्योंकि हो सकता है इसमें कोई न कोई कहानी होगी..

 

जब हम अंग्रेजों के दौर के सरकारी दस्तावेज देखते हैं तो उसमें भी मुझे हरिद्वार नहीं, हरद्वार लिखा मिला..1909 में ्ब्रिटिश भारत का जो सरकारी दस्तावेज-द इंपीयिरल गैजेट ऑफ इंडिया पब्लिश हुआ था, उसमें हरिद्वार नहीं, बल्कि जगह-जग हरद्वार लिखा हुआ है…H-A-R-D-W-A-R

 

 

इससे एक जिज्ञासा पैदा होती है कि अगर हरिद्वार पुराना नाम है, तो फिर अंग्रेजों ने अपने सरकारी डॉक्यूमेंट में इसे हरद्वार यानी H-A-R-D-W-A-R क्यों लिखा? उन्होंने इस स्पेलिंग में अंग्रेजी के आई लेटर को क्यों गायब कर दिया? क्या यहां हर द्वार नाम पहले से चलन में था?

 

कभी हरिद्वार की जगह हर-द्वार नाम कितने चलन में था. इसकी झलक हमें साल 1952 में आई हिंदी फिल्म-यात्रिक-में भी मिलती है…यहां हरिद्वार रेलवे स्टेशन के साइन बोर्ड पर हिंदी में हरिद्वार लिखा है लेकिन अंग्रेजी में लिखा है HARDWAR- यानी हरद्वार….इसी तरह फिल्म में हरिद्वार से ऋषिकेश के बीच चलने वाली बस का एक सीन है, उसमें भी हरिद्वार की स्पेलिंग H-A-R-I-D-W-A-R के बजाय H-A-R-D-W-A-R लिखी है. यानी हरिद्वार नहीं हरद्वार..

देश के बहुत जाने-माने कवि, लेखक, नाटककार और सामाजिक विचारक रहे हैं डॉक्टर धर्मवीर भारती …उनके संपादन में निकलने वाली  धर्मयुग पत्रिका की एक दौर में बड़ी धाक रही है…1979 में उन्होंने धर्मयुग में गंगा दशहरा पर एक कवर स्टोरी छापी. जिसमें उन्होंने जो कवर फोटो लगाई, उसमें हरिद्वार नहीं, बल्कि हरद्वार लिखा था…कवर स्टोरी का शीर्षक था-हरद्वार के तीर्थ पुरोहित.

 

ये इस बात को और पुष्ट करता है कि हरद्वार या जिसे अंग्रेजी में कहें तो H-A-R-D-W-A-R लिखा जाता रहा है, ये भी बहुत पहले से वजूद में रहा है…तो अब ये समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर ये हरि और हर का चक्कर क्या है?

 

असल में ये जो हरि शब्द है- वो हिंदू मान्यताओं में भगवान विष्णु के लिए प्रयोग होता है…वहीं-हर-जो शब्द है वो प्रमुख रूप से भगवान शिव के लिए प्रयुक्त होता है। हमारा ये जो मध्य हिमालयी इलाका है, मतलब जिसका प्राचीन नाम केदारखण्ड रहा है, वो शिव की भूमि कही जाती है…वैसे भी हमारे पहाड़ों में शैव और शाक्त परंपराएँ बहुत मजबूत थीं। केदारनाथ क्षेत्र सदियों से शैव साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। तो इससे एक स्वाभाविक सा कनेक्शन पता चलता है कि शिव की भूमि या हर की भूमि का प्रवेश द्वार-हरद्वार कहलाया होगा….

 

बहुत से जानकारों ने लिखा है और ये माना भी जाता है कि हमारे उत्तराखण्ड हिमालय में वैष्णव परंपरा बाहर से आई है…वरना आपने भी गौर किया होगा कि मूल रूप से शैव परंपरा को मानने की वजह से हमारे पहाड़ों में वैष्णव भोजनालयों का चलन भी आम तौर पर नहीं रहा है..हां, लेकिन चारधाम यात्रा रूट पर अब शुद्ध वैष्णव भोजनालय के बोर्ड आपके लगे दिख जाएंगे…

 

बाकी लोग भले ही यकीन करें न करें, लेकिन हमारे पहाड़ में तो पण्डित यानी ब्राह्णण भी मांस का भक्षण करते रहे हैं…जिन लोगों का पहाड़ से ताल्लुक है, वो तो जानते ही होंगे कि हमारे पहाड़ के गांवों में जब पूजा होती है..बड़ा धार्मिक अनुष्ठान होता है..अठ्वाड़ होती है…और बकरे की बलि दी जाती है…तो ऐसी परंपरा रही है या ऐसा चलन रहा है कि उस बकरे का जो सिर वाला हिस्सा है, उस पर पण्डितजी का ही हक होता है…यजमान को पता होता है कि ये हिस्सा तो पंडिजी को ही जाना है…पूजा के बाद पंडितजी बकरे का सिर अपने घर ले जाते हैं…और हम तो ये बचपन से देखते आ रहे हैं…मतलब ब्राह्मणों का मांस भक्षण करना हमारे पहाड़ों में कभी भी वर्जित नहीं रहा है… हमारे लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगीजी ने अपने एक गीत में इस पर एक चुटीली लाइन भी लिखी है- सिकार नि खांदु मिं सिरी-सिरी…इस गाने में कोई किरदार कहता है कि वैसे तो मैं मीट नहीं खाता हूं, लेकिन सिरी-सिरी…मतलब बकरे के सिर से मुझे कोई परहेज नहीं है…लेकिन वैष्णव परंपरा में पंडित या ब्राह्मण आम तौर पर मांसाहार से परहेज करते हैं या दूर रहते हैं…बल्कि ऐसे कई लोग तो मांसाहार तो दूर की बात है, खाने में प्याज-लहसुन तक से परहेज करते हैं।

 

जैसा कि आप जानते ही होंगे…हमारे इस हिमालयी क्षेत्र में आठवीं सदी में दक्षिण से आदि शंकराचार्य का आना हुआ था…उन्होंने बदरीनाथ मंदिर का पुनरुद्धार किया.. बदरीनाथ धाम भगवान विष्णु यानी हरि का बड़ा तीर्थ है….ऐसा कहा जाता है कि बाद में दक्षिण भारत से वैष्णव परंपरा के लोगों का यहां आना बढ़ा…और धीरे-धीरे यहां वैष्णव प्रभाव बढ़ने लगा। वरना तो इस हिमालयी भूभाग में शंकराचार्य के आने से पहले सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेन सांग भी आया था…उसने अपने अनुभवों पर एक ग्रंथ लिखा था, जिसे साल 1884 में Samuel Beal ने The Great Tang Records on the Western Regions नाम से अंग्रेजी में ट्रांसलेट किया था…उस ग्रंथ में कहीं पर भी हरिद्वार नाम का जिक्र नहीं मिलता है..तो इससे एक ये अंदाजा भी लगता है कि हरिद्वार नामकरण के पीछे हो सकता है कि शंकराचार्य का आना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम रहा हो..

इसलिए हो सकता है कि जिस हरद्वार को हमारे पहाड़ के लोकजीवन में भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता है…वो वैष्णव मत के मानने वालों के प्रभाव में हरद्वार से हरिद्वार हो गया हो…हालांकि मेरे पास इस नामकरण के पीछे की वजहों कोई लेकर कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं..कोई साक्ष्य या कोई दस्तावेज नहीं हैं..लेकिन हरिद्वार नाम की दो अलग-अलग स्पेलिंग चलन में होने और पहाड़ में इस धार्मिक नगरी के नाम का उच्चारण हरिद्वार के बजाय हरद्वार होने की वजह से मैं सिर्फ कड़ियां जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं..और कड़ियां जोड़ने के दौरान ही मेरे सामने एक और रहस्य आ जाता है कि चलो हरद्वार तो हरिद्वार हो गया…लेकिन फिर हर की पैड़ी- हरि की पैड़ी क्यों नहीं कहलाई? जो भी विद्वान लोग-जानकार लोग, इस वीडियो को देख रहे हैं, उनसे निवेदन है कि कृपया इन रहस्य को जरूर खोलने की कोशिश कीजिएगा..

 

वैसे हरिद्वार ज़िले की जो सरकारी वेबसाइट है…उसमें भी साफ-साफ लिखा है कि-  भगवान शिव के अनुयायी और भगवान विष्णु के अनुयायी इसे क्रमशः हरद्वार और हरिद्वार नाम से उच्चारण करते हैं| यानी जो वैष्णव लोग अपने सबसे बड़े तीर्थ बदरीनाथ की यात्रा पर सदियों से आते रहे हैं, उन्होंने इसे हरि के द्वार के नाम पर जाना और हरिद्वार कहना शुरू किया…लेकिन हम जो पहाड़ी लोग हैं…खासकर जो पुराने बुजुर्ग लोग हैं…जो अभी भी गांव में…या पहाड़ी कस्बों में रह रहे हैं…या अपने परिवार के साथ पलायन करके मैदानों में भी आ गए हैं.. उनसे बात करके आप एक बात जरूर नोटिस कीजिएगा…कि उनमें से ज्यादातर की जुबान से हरिद्वार नहीं, बल्कि हर-द्वार ही निकलेगा.. और जैसे मैंने पहले भी बताया कि पहाड़ों में शैव परंपरा बहुत मजबूत रही है…तो भगवान शिव को कहते हैं हर और हर से हुआ हरद्वार…तो ये जो हरिद्वार के नाम की स्पेलिंग में कई जगह H-A-R-D-W-A-R लिखा मिलता है, उसका यही कनेक्शन माना जाता है…

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अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी ढ़ल ही नहीं सकी। कोर्ट कचहरी से लोग डरते हैं और अपन का बचपन, कई शामें और कई दिन कचहरी में बीते। अपन लोग अल्मोड़ा के बाजार के लोग थे, सो खेलने कूदने की जगह कम थी। अपने मोहल्ले में खेलने की एक ही जगह हो सकती थी वो कचहरी था

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