
पिछले कुछ समय से जब से हमारे उत्तराखंड में क्षेत्रीय अस्मिताओं के मुद्दों ने सिर उठाया है, उनको लेकर गोलबंदी शुरू हुई है। यूकेडी को लेकर एक अलग सेंटिमेंट नज़र आता है। ये जानते हुए भी कि यूकेडी की अपनी समस्याएं कितनी विकट हैं, इस समय उसकी स्थिति क्या है—उसके पास लीडरशिप की क्राइसिस है, कोई चेहरा नहीं है, संगठन का बुरा हाल है, कार्यकर्ता भी गिनती के ही हैं, उसके पास संसाधनों का भी टोटा है। यूकेडी लोगों तक पहुंच नहीं पा रहा है। ऐसे बहुत से फैक्टर हैं जो यूकेडी की इस सोशल मीडिया वाली जन्नत की हकीकत को सामने ला देते हैं।
लेकिन असल सवाल तो यह है कि क्या वाकई उत्तराखण्ड क्रांति दल में बीजेपी या कांग्रेस का विकल्प बनने का दमखम है? क्या वो 44 फीसदी वोट शेयर वाली बीजेपी और 38 फीसदी वोट लाने वाली कांग्रेस के आगे कहीं ठहरती है? क्या उसमें ऐसा माद्दा है कि बीजेपी-कांग्रेस के पहाड़ी वोटर या समर्थक अपनी-अपनी पार्टियों से परे जाकर यूकेडी को सिर माथे पर बैठा लें? इस पर विस्तार से बात होनी जरूरी है।
लेकिन पहले ये समझना जरूरी है कि आखिर यूकेडी उत्तराखण्ड के वोटरों का भरोसा क्यों नहीं जीत पाई है? क्यों चुनाव में लोग यूकेडी को वोट नहीं देते हैं? सवाल ये भी है कि क्या पहाड़ के हितों के लिए यूकेडी में नई जान फूंकी जा सकती है? आखिर पहाड़ के लिए उत्तराखण्ड क्रांति दल क्यों जरूरी है?
इस पर बात करने से पहले आंकड़ों के जरिए ये समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर यूकेडी हकीकत की जमीन पर कहां खड़ा है। इसे जानने के लिए चुनाव-दर-चुनाव यूकेडी के ग्राफ को देखना जरूरी है, जो लगातार गिरता जा रहा है।

उत्तराखंड के पहले चुनाव यानी साल 2002 से शुरू करते हैं। साल 2002 में यूकेडी को 4 सीटें मिली थीं, उसे 5.5% वोट मिले और 1 सीट पर यूकेडी दूसरे नंबर पर रही। अगले चुनाव यानी 2007 में उसके 3 विधायक जीते, वोट मिले 3.7% और 3 सीटों पर यूकेडी दूसरे नंबर पर रही। साल 2012 के चुनाव में यूकेडी सिर्फ 1 सीट ही जीत पाई, तब उसका वोट प्रतिशत घटकर 1.93% रह गया और 1 सीट पर दूसरे नंबर पर रही।
साल 2017 का चुनाव यूकेडी के लिए डिजास्टर रहा। उसे कोई सीट नहीं मिली और वोट भी घटकर 0.7% रह गया। यूकेडी से ज्यादा वोट तब नोटा को पड़े थे—नोटा को 1% वोट मिले। पिछले चुनाव यानी 2022 में भी यूकेडी की दुर्गति जारी रही। कोई सीट नहीं मिली, उसे 1.1% वोट मिले। इनमें भी दिवाकर भट्ट देवप्रयाग से 31% वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे और द्वाराहाट में पुष्पेश त्रिपाठी 20% वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे।

2022 के चुनाव में यूकेडी 70 में से 43 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन सिर्फ दो सीटों—देवप्रयाग और द्वाराहाट—में ही कुछ बेहतर प्रदर्शन कर पाई। बाकी सीटों पर उसका बहुत बुरा हाल रहा। राज्य बनने के शुरुआती पांच-सात साल तक ही यूकेडी के पास कुछ जनाधार रहा, लेकिन 2007 के बाद पार्टी का ढलान शुरू हुआ और वो लगातार गिरती चली गई।
अब सवाल ये आता है कि यूकेडी की ऐसी दुर्गति क्यों हो रही है? वो हर चुनाव में अपना आधार और सीटें क्यों खोती जा रही है? इसकी चर्चा भी जरूरी है। लेकिन पहले ये समझते हैं कि उत्तराखण्ड और खासकर पहाड़ के लिए यूकेडी क्यों जरूरी है।
दरअसल, यूकेडी इकलौती पार्टी है जिसकी उत्तराखण्ड आंदोलन में सक्रिय भागीदारी रही। उसका गठन ही अलग राज्य के निर्माण के लिए हुआ था। यूकेडी उत्तराखण्ड की इकलौती क्षेत्रीय पार्टी है, जिसके साथ पब्लिक के सेंटीमेंट आज भी जुड़े हुए हैं।
2007 के चुनाव में लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने भी यूकेडी के समर्थन में मंचीय प्रस्तुतियां दी थीं। यूकेडी इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उसके नेता और मुद्दे दिल्ली से तय नहीं होंगे। उसके पास पहाड़ के मुद्दे होंगे और वो हाईकमान की राजनीति से मुक्त होगी।
उत्तराखंड में जमीन खरीद पर ढील या मूल निवास से जुड़े फैसले बाहरी दबाव में लिए गए—ऐसा माना जाता है। नेशनल पार्टियों के नेता अगर सख्त कानून बनाने की कोशिश भी करें, तो उनकी अपनी पार्टी में ही विरोध हो जाता है, क्योंकि उन्हें पूरे देश में राजनीति करनी होती है। लेकिन यूकेडी इन बंधनों से मुक्त है। उससे उम्मीद है कि वो पहाड़ की जनाकांक्षाओं को आवाज देगी।

लेकिन क्या अब ऐसा संभव है? क्या यूकेडी में इतनी कूवत है कि वो क्षेत्रीय जनआकांक्षाओं का मजबूत प्लेटफॉर्म बन सके?
आज स्थिति ये है कि लोग बीजेपी और कांग्रेस से नाराज तो दिखते हैं, लेकिन चुनाव में फिर उन्हीं को वोट देते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो 26 साल में 16 साल बीजेपी और 10 साल कांग्रेस सत्ता में नहीं रहती। इसलिए असली सवाल यही है—क्या यूकेडी एक मजबूत विकल्प बन सकती है?
मुझे लगता है कि अभी ये सोचना भी दूर की बात है। इसकी सबसे बड़ी वजह है नेतृत्व का अभाव। यूकेडी के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है। संगठन कमजोर है, कार्यकर्ता कम हैं और जनाधार लगातार घट रहा है।
एक समय था जब यूकेडी के पास काशी सिंह ऐरी, इंद्रमणि बडोनी, बिपिन त्रिपाठी, दिवाकर भट्ट, त्रिवेंद्र सिंह पंवार जैसे मजबूत नेता थे। इन नेताओं की विश्वसनीयता थी, वो आंदोलन से निकले थे और पहाड़ के मुद्दों को समझते थे। लेकिन सेकेंड लाइन लीडरशिप तैयार नहीं हो पाई।
अब कुछ युवा जरूर सक्रिय दिख रहे हैं, लेकिन आशंका ये भी है कि कहीं पार्टी को कोई अपने फायदे के लिए हाईजैक न कर ले। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है—गिरते जनाधार को रोकना।
यूकेडी की गिरावट के पीछे उसकी अपनी गलतियां भी हैं। सबसे बड़ी गलती थी—राजनीतिक अपरिपक्वता। कभी बीजेपी के साथ, तो कभी कांग्रेस के साथ सत्ता में शामिल होना। इससे लोगों का भरोसा टूटा।
दूसरी बड़ी गलती थी 1996 के लोकसभा चुनाव का बहिष्कार। उस समय उत्तराखण्ड आंदोलन अपने चरम पर था। अगर यूकेडी चुनाव लड़ती, तो आज उसकी स्थिति अलग होती। लेकिन बहिष्कार करके उसने पूरा मैदान राष्ट्रीय पार्टियों के लिए छोड़ दिया।
तीसरी बड़ी समस्या रही गुटबाजी। पार्टी बार-बार टूटती रही, नेताओं को निकाला जाता रहा। इससे संगठन कमजोर होता गया।
अगर यूकेडी सत्ता में शामिल होकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर काम करती, तो उसका जनाधार बढ़ सकता था। लेकिन नेताओं ने पार्टी के बजाय अपने फायदे को प्राथमिकता दी।
अब सवाल ये है कि यूकेडी को फिर से कैसे खड़ा किया जाए?
इसके लिए पार्टी में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है। नए लोग, नया विजन, मजबूत नेतृत्व और जमीन पर संघर्ष जरूरी है। सिर्फ सोशल मीडिया से कुछ नहीं होगा—सड़क पर उतरना पड़ेगा।
साथ ही, जो भी छोटे-बड़े जनसंगठन पहाड़ के मुद्दों पर लड़ रहे हैं, उन्हें एक मंच पर लाना होगा। यूकेडी इसके लिए एक छतरी बन सकती है, लेकिन इसके लिए नेतृत्व को बड़ा दिल और त्याग दिखाना होगा।
अगर अभी भी ऐसा नहीं किया गया, तो यूकेडी किसी और के हाथ का औजार बन सकती है और उस पर “बी-टीम” का ठप्पा लग सकता है।
यूकेडी को बड़ी तस्वीर देखनी होगी। वरना उत्तराखंड की राजनीति बीजेपी और कांग्रेस तक ही सीमित रह जाएगी।
सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिन पहाड़ों की वजह से उत्तराखंड बना, वही पहाड़ अपनी शर्तों पर राजनीति तय नहीं कर पा रहे हैं।
अगर इस बार भी कुछ अलग नहीं हुआ, तो वही चुनावी नेता, भ्रष्ट सिस्टम और ठेकेदार सत्ता पर काबिज रहेंगे—चाहे पार्टी कोई भी हो। फिर जनता सिर्फ देखती रह जाएगी।


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