May 1, 2026
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राग-रंग

जो बड़े-बड़े उस्ताद न कर सके, वो पौड़ी के मोहन ने कर दिखाया

पण्डित मोहन सिंह रावत। यही नाम है पहाड़ के इन विलक्षण संगीतज्ञ का, जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वो कर दिखाया है जोकि चुनींदा हस्तियां ही कर पाई हैं। जैसे उस्ताद मरहूम बिस्मिल्लाह खां साहब ने ब्याह-शादियों में बजने वाले साज़ शहनाई को वहां से उठाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थापित कर दिया। कौड़ी के साज़ को बेशकीमती बना दिया। या जैसे दिवंगत पण्डित शिव कुमार शर्मा ने कश्मीर के फोक में गूंजने वाले संतूर पर इतने अनूठे प्रयोग किए कि उसे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक ज़रूरी साज़ बना दिया। उसे बड़ी प्रतिष्ठा दिला दी। या जैसे पण्डित विश्वमोहन भट्ट ने गिटार को परिष्कृत करते हुए उसे क्लासिक मौसिकी का एक कम्प्लीट साज़ बना दिया और नाम दिया ‘मोहन वीणा’।

 

हमारे गृह नगर पौड़ी के रहने वाले संगीतज्ञ और हमारे बड़े भाई जैसे पण्डित मोहन सिंह रावत ने बैंजो नाम के एक मामूली से साज़ में अपने अभिनव प्रयोगों से ऐसे प्राण फूंके कि उसे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का वाद्य बना दिया है। उसे इस काबिल बना दिया कि मोहन भाई इस साज़ पर अब राग-रागनियां बजा रहे हैं। उन्होंने अपने इस सृजन को नाम दिया है ‘क्लासिक बैंजो’।

 

कई वर्षों की प्रक्रिया के बाद भारत सरकार ने मोहन सिंह रावत की इस सांगीतिक खोज को या इस आविष्कार को अब जाकर मान्यता दे दी है। कई दौर के इम्तिहानों, प्रस्तुतियों, शास्त्रार्थों से गुजरने के बाद भारत सरकार के नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से उनके इस साज़ को और उसके डिजाइन को मान्यता मिल गई है। इस सिलसिले में बाकायदा औपचारिक पत्र पहुंच चुका है। यह उनकी बरसों की तपस्या का सुफल है। अब मोहन भाई के इस नए साज के पेटेंट की प्रक्रिया चल रही है। उसके बाद जल्द ही इस साज़ की मुंह दिखाई विभिन्न मंचों के जरिये की जाएगी।

 

जिन लोगों ने बैंजो साज को देखा होगा, उन्हें पता होगा कि वह बहुत ही मामूली सा साज़ है। उसकी बहुत लिमिटेशंस हैं। उसमें गिनती के तार होते हैं। कोई लेजेण्ड ही इसकी हस्ती बदल सकता था, वो काम हमारे मोहन भाई ने किया। जो बरसों इसके पीछे पड़े रहे। उन्होंने इसे नए डिजाइन में ढाला। कई बदलाव किए। उसमें कई तरह के तार जोड़े। उन्होंने इतने ज्यादा बदलाव किए हैं कि अब वो बैंजो, बैंजो नहीं रहा। मोहन भाई ने इसे शास्त्रीय संगीत का एक संपूर्ण वाद्ययंत्र बना दिया है। दूसरे तार वाद्यों में जो कमियां इन्हें महसूस हुईं, वो उन्होंने अपने क्लासिक बैंजों में दूर कर दीं।

 

मोहन सिंह रावत के इस आविष्कार का हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों ने भी लोहा मान लिया है। इस वाद्य को रजिस्टर्ड करवाने की प्रक्रिया के दौरान मैंने भी देश के कुछ नामी शास्त्रीय संगीत कलाकारों से संपर्क साधकर उन्हें इस वाद्य के बारे में बताया। उन्हें दिखाया, तो उन्होंने इसके बारे में जानने-समझने में बेहद दिलचस्पी दिखाई और मोहन सिंह रावत की इस खोज की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। मुझे बड़ी खुशी हुई। बड़ा फख्र भी है कि मैं भी एक दौर में मोहन भाई की शागिर्दी में रहा हूं। उनकी सोहबत में शास्त्रीय संगीत की कुछ तहज़ीब हासिल कर पाया।

 

वैसे मोहन सिंह रावत जी की शुरुआत तबले से हुई। वो अपने अद्भुत तबला वादन से हमें बचपन से चौंका रहे हैं। लेकिन वो इतने जीनियस हैं कि पौड़ी जैसे छोटे से पहाड़ी नगर में रहते हुए उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कई साज़ों पर महारत हासिल कर ली।

दुनिया उन्हें अब संतूर के पण्डित के तौर पर जानती है। देश के कई बड़े मंचों वह संतूर की प्रस्तुति देते रहे हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि शास्त्रीय गायिकी से लेकर उनकी लगभग हर साज़ पर पकड़ है। सितार, सरोद,सारंगी, वायलिन, बांसुरी, गिटार…. हर साज़ पर उनकी कमाण्ड है। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ऐसी विलक्षण हस्ती तो बाबा अलाउद्दीन खां साहब ही रहे हैं, जिनके बारे में कहा जाता था कि बाबा जिस भी वाद्य को छूते, वो उनका ग़ुलाम बन जाता था।

 

करीब बाईस-चौबीस साल पहले हिमाचल में पत्रकारिता के दिनों में मैंने मोहन भाई को संतूर के साथ शिमला बुलाया था, तो उन्होंने वहां अपनी प्रतिभा और अपने पाण्डित्य से बड़े-बड़ों को अचंभित कर दिया था। वहां बहुत से लोग आज भी वो बैठकी याद करते हैं। वैसे मोहन सिंह रावत आज से नहीं चौंका रहे हैं। किशोर उम्र में एक बार दिल्ली में परफॉर्मेंस के बाद उस्ताद अमज़द अली खां साहब ने उनको दाद दी थी। एक बार दिल्ली में ही दिग्गज एक्टर शशि कपूर साहब तो मोहन भाई के टैलेंट से इतने गदगद हुए कि परफॉर्मेंस के बाद प्यार से इनके गाल पर थपकी देकर इन्हें दुलारभरी शाबाशी दी।

 

पहाड़ों में वर्षों से साधनारत इस जीनियस संगीतज्ञ को अब अपने बनाए ‘क्लासिक बैंजो’ को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठित करवाना है। जितना मैं मोहन भाई को जानता हूं, यकीन के साथ कह सकता हूं कि वो ऐसा भी कर दिखाएंगे। उन्हें भी इसका इल्म है कि सितारों से आगे जहां और भी हैं।

 

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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