February 16, 2026
Chicago 12, Melborne City, USA
Blog

राजनीतिक प्रहसन में क्यों बदल गए नए राज्य? मनु पंवार

 

पंद्रह बरस का वक़्त कम नहीं होता यह समझने के लिए कि देश में नई बनी
छोटी प्रशासनिक इकाइयां आखिर विफल क्यों रहीं? ठीक पंद्रह साल पहले सन्
2000 में देश के नक्शे में तीन नए राज्य उग आए थे। उत्तराखण्ड, झारखण्ड
और छत्तीसगढ़। हालांकि छत्तीसगढ़ को तब गिफ्ट माना गया क्योंकि
उत्तराखण्ड और झारखण्ड के लिए वहां की अवाम ने लंबी लड़ाइयां लड़ीं।
झारखण्ड की राज्य प्राप्ति के संघर्ष में तो हिंसा भी बड़े पैमाने पर हुई
लेकिन उत्तराखण्ड आंदोलन में जो खून बहा, जो हिंसा हुई वो तत्कालीन
राजसत्ता की कारगुजारी का नतीजा था। वरना यहां के लोगों ने राज्य
प्राप्ति के लिए क़रीब अर्धशती तक अहिंसक आंदोलन चलाया। छत्तीसगढ़ की
बुनियाद भले ही खून से नहीं सनी हो, लेकिन पृथक राज्य बनने के बाद एक अलग
तरह के आंतरिक संघर्ष ने इस राज्य को हिलाकर रख दिया।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन पंद्रह सालों में इन तीन राज्यों की
उपलब्धियों के खाते में ऐसा क्या है जिसे हम नए-नवेले राज्य तेलंगाना को
राह दिखा सकते हैं या देश में छोटी प्रशासनिक इकाइयों के हक़ में कोई
नज़ीर पेश कर सकते हैं? क्या ये तीन राज्य यानी उत्तराखण्ड, झारखण्ड और
छत्तीसगढ़ इस बात को भरोसे के साथ कह सकते हैं देश में छोटी प्रशासनिक
इकाइयां ही व्यावहारिक हैं और बड़े प्रदेशों को छोटे-छोटे हिस्से में
बांट देना ही एकमात्र उपाय है? छोटी प्रशासनिक इकाइयों के ज़रिये आम आदमी
की तक़लीफों को क़रीबी से जानने-समझने और उनका निवारण करने का जो सपना
देखा गया है, क्या वो सच में साकार हो पा रहा है? ईमानदारी से विवेचन
करें तो पंद्रह साल पहले साल 2000 में बनाए गए तीनों राज्य
स्वातंत्र्योत्तर भारत में राजनीतिक विफलता के सबसे बड़े नमूने हैं।
राजनीति, नौकरशाही और कॉरपोरेट के गठजोड़ ने सामूहिक लूट का जो खुला खेल
इन राज्यों में खेला है वह आंखें खोल देने वाला है।
झारखण्ड और उत्तराखण्ड इन तीनों राज्यों में किसी बड़े राजनीतिक प्रहसन
की तरह दिखाई देते हैं। झारखण्ड के तो क्या कहने। यह राज्य प्राकृतिक
संसाधनों के लिए ही समृद्ध नहीं है बल्कि मुख्यमंत्रियों की पैदावार के
लिए भी यहां की ज़मीन बेहद उर्वर दिखती है। इन 15 सालों में झारखण्ड 10
मुख्यमंत्री देख चुका है। झारखण्ड में हर नया मुख्यमंत्री किसी नाटक के
सूत्रधार की तरह सियासत के रंगमंच पर प्रकट होता गया और अपनी भूमिका अदा
करके साल-छह महीने के अंतराल में कहीं लुप्त हो गया। उत्तराखण्ड का हाल
भी ज्यादा अलग नहीं है। यहां 15 साल में 8 मुख्यमंत्री बदले जा चुके हैं।
इन नए राज्यों को अपने अलग होने को सही साबित करना था लेकिन ये राज्य भी
सत्ता की जोड़तोड़
और भ्रष्टाचार के नए रोल मॉडल बन बैठे। झारखण्ड का एक पूर्व मुख्यमंत्री
तो जेल भी गया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों
में घिरने के बावजूद न तो उत्तराखण्ड के किसी पूर्व मुख्यमंत्री का बाल
भी बांका हुआ और न ही किसी मंत्री की कुर्सी गई। छत्तीसगढ़ में ज़रूर
राजनीतिक तौर पर अस्थिरता नहीं रही है लेकिन यह छोटी प्रशासनिक इकाई
लोगों की आकांक्षाओं पर ख़रा उतर पा रही है, यह कहना जल्दबाजी होगी।
तो आखिर क्या वजह है कि राजनीतिक उतावलेपन में हम नए राज्यों के गठन से
पूर्व उनकी बुनियादी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक ज़रूरतों को नज़रअंदाज
करते जाते हैं? किसी भी नई प्रशासनिक इकाई का पूर्ण राज्य में तब्दील
होना एक क्रमिक विकास का हिस्सा है। हिमाचल प्रदेश इसका सबसे सटीक उदाहरण
है। हिमाचल को जब 25 जनवरी 1971 में पूर्ण राज्यत्व का दर्ज़ा दिया गया,
तब तक हिमाचल इसके लिए हर तरह से तैयार हो चुका था। इस राज्य की नींव तो
15 अप्रैल 1948 को ही पड़ चुकी थी जब 30 छोटी-बड़ी रियासतों ने हिमाचल
प्रदेश के नाम पर एक प्रशासनिक इकाई में रहने के लिए घोषणा की थी। इस
पहाड़ी प्रांत को केंद्र शासित ‘चीफ कमिश्नर्ज प्रोविन्स’ का दर्जा दिया
गया। हालांकि जब चीफ कमिश्नर के शासन में भी कोई विशेष प्रगति नहीं हुई
तो वहां ज़ोरदार संवैधानिक लड़ाई आरम्भ हो गई। इसी लड़ाई में डॉ. यशवन्त
सिंह परमार जैसा प्रखर और ईमानदार नेता उभरा। इस संघर्ष का नतीजा यह रहा
है कि केंद्र सरकार ने हिमाचल को ‘पार्ट-सी स्टेट’ का दर्जा देकर वहां
विधान मण्डल की व्यवस्था की। 24 मार्च 1952 को डॉ.यशवंत सिंह परमार
हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। बाद में ‘पार्ट-सी स्टेट’ का
दर्जा हटाकर हिमाचल को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। इस तरह इस
राज्य के विकास के लिए सिलसिलेवार कार्यक्रम और योजनाएं चलीं लेकिन
हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला इसकी स्थापना के 23 साल बाद यानी 25
जनवरी 1971 को। तब तक हिमाचल को एक परिपक्व राजनीतिक नेतृत्व मिल चुका था
और वह आर्थिक तौर पर भी स्वावलंबी होने की ओर बढ़ रहा था।
नए राज्य के लिए संघर्ष की बुनियाद में एक साम्य यह होता है कि वह अपने
मूल राज्य का उपनिवेश बनकर नहीं रहना चाहता। हिमाचल वाले इलाके को पंजाब
का, उत्तराखण्ड क्षेत्र को यूपी का, झारखण्ड को बिहार का और छत्तीसगढ़ को
मध्य प्रदेश का उपनिवेश बने रहना मंज़ूर नहीं था। आंध्र प्रदेश से अलग
हुए तेलंगाना की कहानी भी ज़्यादा अलग नहीं है। लेकिन जिन वजहों से ये
प्रशासनिक इकाइयां अलग हुईं, बाद में वही वजहें हाशिये पर चली गईं और
लूटखसोट प्राथमिकता बन गई। एक बड़े जनांदोलन की कोख से निकले उत्तराखण्ड
राज्य में तो कोई राजनीतिक नेतृत्व ही तैयार नहीं था। इस शून्य में ऐसी
बदशक्ल सी राजनीतिक तस्वीर सामने आई कि जो नेता पंचायत सदस्य तक नहीं बन
सकता था, वह मंत्री बन गया और जो मंत्री बनने के काबिल न था, वह
मुख्यमंत्री बन बैठा। लिहाजा एक नए राज्य के लिए ज़रूरी राजनीतिक दृष्टि
आज तक पैदा ही नहीं हो पाई, सिर्फ चुनावबाज नेताओं की एक जमात ही तैयार
हुई।
दरअसल साल 2000 में बनाए गए तीन राज्यों की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता
यही है कि नए राज्य को आकार देने से पहले जिस ‘विज़न’ की दरकार होती है,
वह नदारद रही। इन 15 साल में तो अब यह साबित भी हो गया है कि भूभाग पर
लकीरें खींचकर नया राज्य बनाने देने से ही किसी क्षेत्र विशेष की तकदीर
बदलने की बात बेमानी है। नये राज्य को आकार देने से पहले दीर्घकालिक
योजनाओं का खाका तैयार होना ज़रूरी है। उन पर अमल करने की राजनीतिक
इच्छाशक्ति प्रबल होनी ज़रूरी है। वरना पिछले साल अस्तित्व में आया
तेलंगाना भी कल को झारखण्ड, उत्तराखण्ड या छत्तीसगढ़ की राह पर न चल
पड़े, इसकी क्या गारंटी है?

Leave feedback about this

  • Quality
  • Price
  • Service

PROS

+
Add Field

CONS

+
Add Field
Choose Image
Choose Video