May 11, 2026
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लिखा-पढ़ी

‘किन्नर’ से लड़ता किन्नौर मनु पंवार

यदि होता किन्नर नरेश मैं

राजमहल में रहता

सोने का सिंहासन होता

सिर पर मुकुट चमकता

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की इस कविता से गुजरना किसी स्वप्नलोक की सैर करने जैसा है। बचपन में इस कविता को पढ़कर सोचा करते थे कि आखिर वह किन्नर देश सचमुच में होगा कैसे?  इस पूरी कविता की एक-एक पंक्ति किन्नौर इलाके के जीवन और उसकी विशिष्ट पहचानों से जुड़ी हैं. पत्रकारीय जीवन में जब हिमाचल को देखने, समझने, जानने का अवसर मिला तो हिमालय की गोद में बसे जनजातीय इलाके किन्नौर से ढंग से परिचय हुआ। वाकई इस धरती पर कुदरत के किसी ख़ूबसूरत रहस्यलोक की तरह है किन्नौर। लेकिन पिछले कुछ बरस से यही किन्नौर अपनी विशिष्ट पहचान पर मंडरा रहे एक संकट को लेकर फिक्रमंद दिख रहा है। इसकी वजह है मीडिया द्वारा गढ़ा गया एक शब्द ‘किन्नर’, जोकि हिंजड़ों यानी थर्ड जेंडर के लिए धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।

किन्नौरवासियों की ये चिंता इसलिए भी ज़्यादा गहरी है क्योंकि संविधान में इन्हें ‘किन्नौरा’ या ‘किन्नर’ से संबोधित किया गया है। किन्नौरवासियों को दिए जाने वाले जनजाति प्रमाणपत्र में भी ‘किन्नर’ या ‘किन्नौरा’ साफ-साफ लिखा होता है। किन्नर समाज को यह दर्जा अनुसूचित जनजाति सूची (संशोधन) आदेश 1956 और हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम 1970 के तहत मिला है। चूंकि यह संविधान प्रदत्त व्यवस्था है, इसलिए किन्नौर इलाक़े के कई लोग अपने नाम के आगे उपनाम ‘किन्नर’ भी लगा देते हैं क्योंकि ये उनके जनजातीय गौरव से जुड़ा है। लेकिन हाल के वर्षों में, ख़ासकर मीडिया में, इस शब्द को जिस तरह से हिंजड़ों या थर्ड जेंडर के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है, उससे न सिर्फ ‘किन्नर’ उपनाम वाले लोग अपमानित महसूस करते हैं, बल्कि भविष्य में किन्नौर के निवासियों की संवैधानिक पहचान पर भी संकट खड़ा हो गया है। जबकि हिंजड़ों के लिए किन्नर कहे जाने का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। न प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों में न साहित्य-कृतियों में। पंडित राहुल सांकृत्यायन ने हिमाचल यात्रा के दौरान ‘किन्नर देश‘ नाम की क़िताब हिंजड़ों पर नहीं लिखी थी, बल्कि तिब्बत सीमा से सटे किन्नौर इलाके के इस जनजातीय समाज की विशिष्टताओं पर लिखी थी। डॉ. बंशीराम शर्मा की किताब ‘किन्नर लोक साहित्य’ इसी किन्नर देश पर पहला शोध ग्रन्थ माना जाता है। किन्नर का विस्तार से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उल्लेख किन्नौर के गजेटियर में भी मिलता है। यहां तक कि देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी 15 अप्रैल 2014 को अपने ऐतिहासिक फैसले में हिंजड़ा या ट्रांसजेंडर्स को ‘थर्ड जेंडर’ की मान्यता दी है। गौर करने की बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘थर्ड जेंडर’ कहा है, किन्नर नहीं कहा। लेकिन मीडिया का एक हिस्सा अपने ईजाद किए हुए ‘किन्नर’ पर इस कदर मुग्ध है कि उसे छोड़ने को तैयार नहीं।

‘किन्नर’ शब्द के ऐसे इस्तेमाल पर हिमाचल प्रदेश की विधानसभा में दो बार अलग-अलग सरकारों के समय में बहस हो चुकी है और बाकायदा निंदा प्रस्ताव भी पारित हो चुका है। वर्ष 2007 में मधुर भंडारकर की फिल्म ‘ट्रैफिक सिग्नल‘  भी इसीलिए हिमाचल प्रदेश में बैन कर दी गई थी क्योंकि उसमें हिंजड़ों को ‘किन्नर’ कहा गया था। लेकिन जैसा कि प्राय: होता है, देश के पहाड़ी हिस्सों से उठी आवाज़ें उस तूती की तरह होती हैं जिनकी नक्कारखाने में कोई हैसियत नहीं। अस्मिता पर ऐसा हमला अगर दूसरे समाजों पर होता तो मीडिया में हिंजड़ा या थर्ड जेंडर के लिए ‘किन्नर’ शब्द का चलन कब का बंद हो चुका होता। इस मामले में हाल ही में प्रधानमंत्री तक को चिट्ठी लिख चुके हिमाचल के साहित्यकार एसआर हरनोट कहते हैं- ‘ऐसा ही जारी रहा तो आने वाले समय में लोग इस किन्नर जनजाति को थर्ड जेंडर ही मानेंगे।’  किन्नौर के लोगों की असल चिंता भी यही है।

 

 

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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