May 9, 2026
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आजकल

पांच साल की बाध्यता में घुटती ज़िंदा कौमें मनु पंवार

राम मनोहर लोहिया कहा करते थे, ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’। लेकिन मुश्किल ये है कि किसी निर्वाचित सरकार या प्रतिनिधि को पांच साल ढोने की विवशता का कोई तोड़ हम आज तक नहीं ढूंढ पाए हैं। इस मजबूरी ने एक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था को किस कदर बेबस और लाचार बना दिया है, उत्तराखंड का घटनाक्रम इसकी ताज़ा मिसाल है। उत्तराखंड के लोगों को लोहिया के शब्दों को हकीकत में बदलने का मौका ही नहीं मिल रहा है। अपनी आंखों के सामने अपने जनादेश की दुर्गति होते देखकर उत्तराखंड के लोग इंतजार करने के सिवाय चाहकर भी कुछ कर नहीं कर सकते। उत्तराखंड का ये सियासी ड्रामा बता रहा है कि आज के दौर की सत्तालोलुप राजनीति बहुत अधीर हो गई है। उसे पांच साल का इंतज़ार करना गवारा नहीं। नेताओं में कम समय में सब कुछ हासिल कर लेने के इस निर्ल्लजतापूर्ण उतावलेपन ने जनादेश को बेमानी बना दिया है। पांच साल की अवधि अब किसी कारावास की सज़ा जैसी लग रही है, जो जनता को भोगनी पड़ रही है।

 

वैसे ये लाचारगी, ये विवशता अकेली उत्तराखंड की नहीं है। हर उस राज्य/देश के लोगों की है, जहां की सरकारें या जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद जनादेश को पैरों की जूती समझने लगते हैं। जिसकी आड़ में वो कुछ भी कर गुजरते हैं। लेकिन उनको चुनने वाले लोग सिवाय अफसोस जताने के कुछ कर नहीं सकते। कुछ न कर पाने की इसी झुंझलाहट की कोख से ‘राइट टु रिकॉल’ यानी अपने चुने हुए प्रतिनिधि की वापसी के अधिकार की मांग ने जन्म लिया था। उसके लिए आवाज़ें भी बुलंद होती रही हैं। अन्ना आंदोलन के दौरान इस मुद्दे को हवा भी मिली थी, लेकिन ‘राइट टु रिकॉल’ राजनीति के नक्कारखाने में कब गुम हो गया, किसी को पता ही नहीं चला। जिन लोगों ने अन्ना आंदोलन के दौरान ‘राइट टु रिकॉल’ को लुभावने रैपर में लपेटकर राजनीति के मार्केट में उतारने की कोशिश की थी, वो भी अब उसी सिस्टम का हिस्सा हो चुके हैं। लगता है कि ‘राइट टु रिकॉल’ का धुर-लोकतांत्रिक अस्त्र भी किसी जुमले की मौत मर गया है। नतीजा ये कि पहले अरुणाचल प्रदेश और अब उत्तराखण्ड में हम जनादेश की बेकद्री के सबसे दयनीय दौर के गवाह बने हैं।

 

असल में यह राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के विस्फोट का दौर है। लेकिन हैरानी इसलिए है क्योंकि इसकी सबसे घटिया तस्वीर उस उत्तराखंड में दिखाई दे रही है जोकि जनसंघर्षों की कोख से पैदा हुआ है। अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए जनादेश का तमाशा बनाने वाले उत्तराखंड के विधायकों को शायद 2012 के विधानसभा चुनाव नतीजों का असल संदेश याद नहीं रहा। जिंदा कौमें कैसे फैसला देती हैं, उत्तराखंड के लोग पिछले चुनाव में इसकी झलक दे चुके हैं। उत्तराखंड के मतदाताओं ने मोहभंग के बीच 2012 में ऐसा फंसा हुआ जनादेश दिया कि दोनों प्रमुख पार्टियों की सांसें अटक गईं। कांग्रेस को 32 सीटें तो बीजेपी को 31 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को 34 फीसदी तो बीजेपी को 33 फीसदी वोट मिले थे। बाकी के 33 फीसदी वोटरों ने कांग्रेस और बीजेपी दोनों को खारिज कर दिया था और वो इसलिए क्योंकि उत्तराखंड का वोटर दोनों पार्टियों को बारी-बारी से परख चुका था। 2002 के पहले चुनाव में कांग्रेस को और फिर 2007 में बीजेपी को सत्ता मिली लेकिन उन सरकारों ने राज्य को राजनीतिक प्रहसन में बदल दिया। मुख्यमंत्री बदलने का ज़रा औसत तो देखिए। उत्तराखंड में पिछले 15 साल में 8 मुख्यमंत्री बदले जा चुके हैं। नवां मुख्यमंत्री कभी भी प्रकट हो सकता है। लेकिन हर नया मुख्यमंत्री अपने खाते में अपयश लेकर गया। मंत्रियों के ऐसे-ऐसे घोटाले सामने आए कि सुनकर कानों पर यकीन न कर पाएं। तो फिर ऐसी सरकारों और ऐसे जनप्रतिनिधियों को पांच साल चलाए रखने की बाध्यता क्यों हो? ये सवाल एक बार फिर से मौजूं हो गया है।

 

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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