February 24, 2026
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अल्मोड़ा के वो सिनेमाघर – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA CINEMA दशकों तक अल्मोड़ा में दो सिनेमाहॉलों का बोलबाला रहा है। पहला रीगल और दूसरा जागनाथ। जागनाथ की चर्चा अगली पोस्ट में करूंगा। आज चर्चा रीगल की। जागनाथ सिनेमाहॉल एलीट कहा जा सकता था लेकिन अल्मोड़ा का रीगल सिनेमाहॉल सबका था..मुख्य सड़क से बिल्कुल सटा हुआ। ऊपर वाली मंजिल में बालकनी और नीचे वाली

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मेरे बचपन की यादों की कचहरी – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA KACHHARI अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी

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प्रतिमा हो गए ‘राजा साब’

शिमला के मशहूर रिज़ पर एक और मूर्ति लग गई है. इस बार दिवंगत वीरभद्र सिंह की प्रतिमा यहां लगाई गई. कल सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं की मौजूदगी में इस प्रतिमा का अनावरण किया गया. रिज़ शिमला की धड़कन है. अब ये दिवंगत हस्तियों की प्रतिमाओं वाला स्थल हो गया है.

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लव इन ‘श्यामला’ मनु पंवार

ऐसे समय में जबकि 21वीं सदी में भारत में स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणाओं ने अभी ज़मीन भी नहीं पकड़ी है, अंग्रेजों द्वारा 19वीं सदी में खूबसूरत पहाड़ियों पर बसाई अपनी तरह की ‘स्मार्ट सिटी’ शिमला का नाम बदलने की चर्चाओं ने ज़ोर पकड़ लिया है। शिमला का नाम बदलकर ‘श्यामला’ किए जाने की मुहिम

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400 साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा केदारनाथ मनु पंवार

केदारनाथ में साल 2013 में क्या हुआ, ये आप सब जानते ही हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि केदारनाथ मंदिर कभी करीब चार सौ साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा? शायद बहुत से लोगों को पता न हो…लेकिन साइंटिफिक स्टडी में इस बात की पुष्टि होती है…इस वीडियो में केदारनाथ से जुड़े इसी

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स्मृति शेष : मंगलेश डबराल काफलपाणी कि वो ‘लालटेन’ जिसने दुनिया में रोशनी फैलाई

हो सकता है कि काफलपानी गांव के बारे में टिहरी के बाहर बहुत लोगों को पता न हो। लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में लोगों ने काफलपानी का नाम सुना हुआ है। वो इसलिए क्योंकि वहां मंगलेश डबराल पैदा हुए थे। हमारे देश के जाने-माने कवि, लेखक, सम्पादक, अनुवादक मंगलेश डबराल। वह कवि जो सबसे

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हिमाचली टोपी : सरकार बदलते ही बदल जाता है रंग मनु पंवार

हिमाचल प्रदेश में सरकार ही नहीं, टोपियां भी सत्ताच्युत हुई हैं. वीरभद्र सिंह की सरकार जाने के साथ ही उनके ट्रेडमार्क हरी टोपी को भी राजनीतिक वनवास मिल गया. टोपियां हिमाचल प्रदेश के लोकजीवन का ही नहीं, राजनीतिक संस्कृति का भी अहम हिस्सा है. ये बात जुदा है कि यहां टोपियों का रंग सरकारों के

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‘किन्नर’ से लड़ता किन्नौर मनु पंवार

‘यदि होता किन्नर नरेश मैं राजमहल में रहता सोने का सिंहासन होता सिर पर मुकुट चमकता’ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की इस कविता से गुजरना किसी स्वप्नलोक की सैर करने जैसा है। बचपन में इस कविता को पढ़कर सोचा करते थे कि आखिर वह किन्नर देश सचमुच में होगा कैसे?  इस पूरी कविता की एक-एक पंक्ति

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राजनीतिक प्रहसन में क्यों बदल गए नए राज्य? मनु पंवार

  पंद्रह बरस का वक़्त कम नहीं होता यह समझने के लिए कि देश में नई बनी छोटी प्रशासनिक इकाइयां आखिर विफल क्यों रहीं? ठीक पंद्रह साल पहले सन् 2000 में देश के नक्शे में तीन नए राज्य उग आए थे। उत्तराखण्ड, झारखण्ड और छत्तीसगढ़। हालांकि छत्तीसगढ़ को तब गिफ्ट माना गया क्योंकि उत्तराखण्ड और

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पांच साल की बाध्यता में घुटती ज़िंदा कौमें मनु पंवार

राम मनोहर लोहिया कहा करते थे, ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’। लेकिन मुश्किल ये है कि किसी निर्वाचित सरकार या प्रतिनिधि को पांच साल ढोने की विवशता का कोई तोड़ हम आज तक नहीं ढूंढ पाए हैं। इस मजबूरी ने एक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था को किस कदर बेबस और लाचार बना दिया है,

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