‘किन्नर’ से लड़ता किन्नौर मनु पंवार
‘यदि होता किन्नर नरेश मैं राजमहल में रहता सोने का सिंहासन होता सिर पर मुकुट चमकता’ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की इस कविता से गुजरना किसी स्वप्नलोक की सैर करने जैसा है। बचपन में इस कविता को पढ़कर सोचा करते थे कि आखिर वह किन्नर देश सचमुच में होगा कैसे? इस पूरी कविता की एक-एक पंक्ति

