…जब मैं सचिन के सामने नि:शब्द था
यह वर्ष 2002 के नवम्बर महीने की ही बात है। यानी आज से करीब 17 साल पहले। उस समय मैं उत्तर भारत के
यह वर्ष 2002 के नवम्बर महीने की ही बात है। यानी आज से करीब 17 साल पहले। उस समय मैं उत्तर भारत के
शम्मी नारंग के साथ मुलाकात की एक तस्वीर कुछ आवाज़ें, कुछ छवियां ज़ेहन में हमेशा ताज़ा रहती हैं. बरसों तक, दशकों तक, उम्र
बात उन दिनों की है जब हम शिमला में अख़बार में पत्रकारिता किया करते थे. शिमला में अवैध निर्माण से जुड़ी एक स्टोरी
शिमला में इसी रिज़ मैदान पर नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह हो रहा है नहीं..नहीं…. ये वो पानी की टंकी नहीं है
हमारी नगरी पौड़ी (उत्तराखंड) के क्यूंकालेश्वर में शिव की मूरत बचपन का किस्सा है. पहाड़ में कई बार स्कूल जाते वक्त कोई किताब,
(दिवंगत राजेन टोडरिया हमारे समय के धाकड़ पत्रकार / लेखक रहे हैं. वह हमारे बॉस भी रहे और मेंटॉर भी. राजेनजी की पत्रकारिता उत्तराखण्ड से
हिमाचल प्रदेश में सुखराम अपने समर्थकों/प्रशंसकों के बीच ‘पण्डत सुखराम’ के नाम से जाने जाते थे. समर्थकों के लिए वो देश में संचार
यह है जख्या, काले-भूरे दाने वाला बीज ऐसा आपने कई लोगों के मुंह से और अक्सर सुना होगा- अजी! आपकी तो गाली भी
हमारी रसोई में लंबे समय से पहाड़ी मसाले महक रहे हैं, वो भी विपिन पंवार की बदौलत. वैसे इसमें कोई अचरज नहीं है
ये तस्वीरें हमारे गांव की हैं। उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल ज़िले में है गांव। ढलाऊ छत वाले मिट्टी-पत्थर के ऐसे मकान हमारे पहाड़ी