May 7, 2026
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आजकल

अथश्री ‘इलीगल’ कथा !

बात उन दिनों की है जब हम शिमला में अख़बार में पत्रकारिता किया करते थे. शिमला में अवैध निर्माण से जुड़ी एक स्टोरी का पीछा करते-करते कुछ ऐसे दस्तावेज़ हाथ लगे कि दंग रह गया. शायद वो टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट की रिपोर्ट थी. जिससे पता चला कि शिमला में हाईकोर्ट की बहुमंजिला इमारत भी लीगल नहीं है. मतलब नियमों के ख़िलाफ़ बनी है. .

हमारा तो माथा ही ठनक गया. एक बड़े अफसर से पता चला कि मामला विधानसभा में भी आया था. लेकिन ‘होली काउ’ पर हाथ कौन डाले ! हालांकि इसके बावजूद अपन ने वो रिपोर्ट छापी. फिर यह भी पता चला कि विधानसभा की इमारत बनाने में भी नियमों का उल्लंघन हुआ है.

कुछ दस्तावेज और खंगाले तो पता चला कि शिमला में कई सरकारी-गैर सरकारी-निजी इमारतें नियमों को धता बताकर बनाई गई थीं. रिज़ की पूर्वी ढलान पर स्थित पदमदेव कमर्शियल कॉम्पलेक्स भी ऐसे ही बना था. मेयर तक के यहाँ अवैध निर्माण पाया गया. ऐसी ही सिचुएशन पर कभी धूमिल कह गए हैं- ‘मैंने जिसकी पूँछ उठाई है/उसको मादा पाया है।’

शिमला के मॉल रोड पर उन दिनों एक होटल बन रहा था. वो ऐसी जगह थी, जहां पर लीगली इतने भारी-भरकम निर्माण की इजाजत नहीं मिल सकती थी. कुछ खटक रहा था. लिहाज़ा मैं उस स्टोरी के पीछे लगा. कुछ सुराग भी मिला. सुनी-सुनाई थी कि ये होटल उन दिनों केंद्र के एक बड़े और पावरफुल नेता/मंत्री या उनके किसी रिश्तेदार का है. सुराग तलाशते-तलाशते एक बड़े अफसर तक भी पहुंच गया, जो उस फाइल को डील कर रहे थे.

पूछने पर बोले, आप हमारे मित्र हैं. लेकिन इस संबंध में कुछ भी सूचना लीक हुई तो मेरी नौकरी ख़तरे में पड़ जाएगी. उन्होंने सिर्फ इतनी पुष्टि की कि एक बहुत बड़े आदमी से जुड़ा मामला है.

शिमला के रिज़ पर चर्च के पास उन दिनों एक आइसक्रीम पार्लर हुआ करता था. दिखने में बहुत सुंदर. पहाड़ी स्टाइल का डिजाइन. शायद अभी भी है.रोज़ाना लाखों की बिक्री होती है,क्योंकि वह इकलौता है. वह कोई मामूली आइसक्रीम पार्लर नहीं था. उसके मालिक के सिर पर बड़े-बड़ों का वरदहस्त था लेकिन उसने भी दस्तावेजों में हेरफेर करके अतिक्रमण करके जमीन कब्जाई हुई थी.

उस स्टोरी का पीछा करते हुए मेरे हाथ बहुत से दस्तावेज लगे तो मैंने दो-तीन रिपोर्ट छाप दी.खलबली मच गई. शिमला नगर निगम को एक्शन लेना पड़ा. भारी पुलिस बल की मौजूदगी में खाली करवा दिया. अब वो आइसक्रीम पार्लर सरकार चलाती है. वहां हिमाचल सरकार के उत्पाद जूस वगैरह बेचे जाते हैं. हमारे मित्र और पूर्व ब्यूरोक्रेट Devender Gupta उस किस्से के गवाह हैं.

एक दिलचस्प किस्सा और. हम शिमला में डेजी बैंक एस्टेट एरिया में जिस बिल्डिंग में किराये पर रहते थे, वो फॉरेस्ट के एक पूर्व अफसर की थी. शायद चार-पांच मंजिला थी. उसको एक बार शिमला नगर निगम से नोटिस आया. वो गुहार लगाते हुए हमारे बॉस टोडरिया जी के पास पहुंच गया. टोडरिया जी ने मुझे कहा कि यार, देखना क्या मैटर है.

मैं अगले दिन कमिश्नर से मिला. उन्होंने अपने कमरे में सारी फाइलें मंगवाईं. पता चला कि उस पट्ठे (हमारे लैंडलॉर्ड) ने भी बिल्डिंग बनाने में गड़बड़झाला किया था. शायद उसकी एक या दो मंजिल इलीगल थी. कमिश्नर मित्रवत बोले- मनु जी, क्या करूं? मैंने कहा, जो कानून अलाऊ करता है बल्कि बंदे पर और जुर्माना भी ठोक सकते हैं, तो कीजिए. कमिश्नर साहब ठहाके मार के हंसे.

शिमला के जिस उपनगर संजौली में मस्जिद में अवैध निर्माण को लेकर बवाल मचा है, वहां के बारे में कहा जाता है कि ज्यादातर निर्माण इलीगल है.उसके आगे ढली के भी यही हाल हैं. कभी बुलडोजर चले तो कुछ भी न बचे. शिमला नगर निगम की फाइलों में ऐसे कई केस बरसों से धूल फांक रहे हैं.मस्जिद में अवैध फ्लोर का केस भी 14 साल से फाइलों में आराम फरमा रहा था.

शायद इसी संजौली या ढली का एक किस्सा है. इन उपनगरों में पहाड़ की ढलान पर घर इतने सटकर बने हैं कि लगता है कि हवा और रोशनी भी कैसे आती होगी. यहां एक दफा किसी घर में किसी का देहांत हुआ, तो बांस की बल्लियों में बंधे शव को घर से बाहर निकालना मुश्किल हो गया. उपाय ये निकाला गया कि घर की खिड़कियां उखाड़ी जाएं. फिर ऐसा ही किया गया. मुर्दे को खिड़की से निकाला गया. पड़ोसी की छत से और फिर उसके बगल की छत से होते हुए तब जाके अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया.

बहरहाल, अब जब न्याय को भीड़ ने टेकओवर कर ही लिया है तो ये उम्मीद बंधी है कि शिमला में अवैध निर्माण के खिलाफ एक वृहद सफाई अभियान चलेगा. जो-जो और जिस-जिसका भी इलीगल कंस्ट्रक्शन है, वो सब साफ हो जाएगा. हमें फिर पहले जैसा ही खूबसूरत शिमला दिखेगा जैसे ब्रिटिशर्स बनाकर और छोड़कर गए थे.

वरना तो अंधाधुंध निर्माण ने शिमला की शक्ल ही बिगाड़ के रख दी है. एक अच्छे-खासे, सुंदर और ऐतिहासिक शहर पर राजधानी थोप कर इसका कबाड़ा कर दिया. देवदार का सफाया कर-कर के सीमेंट-कंक्रीट के जंगल उगा दिए गए. सात पहाड़ियों पर पसरे हुए शिमला को कहीं का नहीं छोड़ा, जबकि इसके पग-पग पर इतिहास है. ये शहर ऐसी जलालत वाली मौत डिज़र्व नहीं करता. हमारे देहरादून की भी ऐसी ही दुर्गति हुई है.

तो नियम-कानून, न्याय, सिस्टम, ये सब अब भीड़ की हिरासत में हैं. भीड़ ये जिम्मेदारी पहले उठा लेती तो शायद हमारे शहर ऐसे बदशक्ल न होते.

हालांकि फिर भी एक उत्सुकता यह जानने की भी रहेगी कि जब सारा इंसाफ सड़क पर भीड़ ही करने लगेगी तो फिर मी लॉर्ड क्या करेंगे? संस्थायें क्या करेंगीं? हैंजी !

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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