March 27, 2026
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लोग-बाग

मेरे अध्यापक, जिन्होंने विविधता के सौंदर्य की समझ विकसित की

इंद्र मोहन मुदगिल. यही नाम था हमारे स्कूल के प्रिंसिपल का, जिन्होंने हमें पर्यावरण संरक्षण की व्यावहारिक सीख दी. जिन्होंने पेड़ों की अहमियत बताई. फूलों के होने का मतलब समझाया. जिन्होंने आंगन में दूब के उगने का अर्थ बतलाया. जिन्होंने बगीचे को संवारने का शऊर दिया और फलदार वृक्षों की महत्ता समझाई. वो मुदगिल साहब ही थे जिन्होंने फूलों, पौधों के ज़रिये हममें विविधता के सौंदर्य की समझ विकसित करने में मदद की.

ये स्केच उनके बेटे अरविंद मौदगिल ने बनाया है

मुदगिल साहब हमारे पहाड़ी शहर पौड़ी (तत्कालीन यूपी, अब उत्तराखण्ड) में डीएवी स्कूल के प्रिंसिपल हुआ करते थे. ये अस्सी के दशक की बात है. डीएवी में बतौर प्रिंसिपल उनकी तब दूसरी पारी थी. पहली पारी में वो सख्त मिज़ाज प्रशासक की छवि से सबको अपना मुरीद बना ही चुके थे. दूसरी पारी में उन्होंने अपनी रचनात्मकता से डीएवी स्कूल की पूरी सूरत ही बदल डाली. कुछ ऐसा किया कि खुद वहां के जीवन में किस्से-कहानियों का हिस्सा बन गए.

उन दिनों मुदगिल सर की बड़ी धाक थी. ऐसी कि उनके नाम से ही अभिभावकों ने अपने बच्चों को डीएवी स्कूल में दाखिला दिलवाया. मुझे खुद मेरे पिताजी ने गवर्नमेंट इंटर कॉलेज मने जीआईसी से नाम कटवाकर डीएवी में दाखिला करवाया था. ऐसे कई बच्चे थे जिनके घरवालों ने मुदगिल साहब की वजह से अपने बच्चों को डीएवी में डाला.

पौड़ी का डीएवी स्कूल सरकारी नहीं था, मैनेजमेंट से चलता था. संसाधनों की कमी थी. लेकिन मुदगिल साहब ने अपने नायाब आइडियाज से उस स्कूल को पौड़ी का सबसे समृद्ध, हरा-भरा और सबसे चमकता हुआ स्कूल बनवा दिया. उन दिनों हम फख्र से कहा करते थे कि हम डीएवी में पढ़ते हैं. बाहर से सख्त मिजाज मुदगिल साहब दिल के शायद नर्म रहे होंगे. उन्हें फूलों-पौधों से बड़ा प्यार था. उन्होंने स्कूल के बंजर से आंगन में एक आइडिया बोया. खुशहाली का आइडिया. समृद्धि का आइडिया. सौंदर्य का आइडिया. आंगन में उन्होंने ख़ूबसूरत लॉन तैयार करवाया. हरी-भरी घास से झमाझम लॉन. उसके चारों तरफ फूलों का आयताकार घेरा हुआ करता था. तब हमारा स्कूल किसी वाटिका सा लगता था.

जहां देखते, फूल ही फूल. एक से एक प्रजाति के फूल. सुबह क्लास में बैठकर खिड़की से लॉन पर नज़र पड़ती थी तो लगता था कि मानों फूल एक-दूसरे से बतियाते रहे हों. खिलखिला रहे हों. हंसी-ठट्ठा, अठखेलियां कर रहे हों. आंगन में हरी घास, फूलों की कतार और ठीक सामने दमकता हिमालय. अहा ! तबियत खुश हो जाती थी तब. उसी लॉन में हमारी सुबह की प्रेयर हुआ करती थी. वो मनोहारी तस्वीर अब तक हमारे ज़ेहन में बसी है. उन दिनों देखते ही देखते डीएवी का पूरा कैंपस बड़े आयोजनों का सबसे हॉट डेस्टिनेशन बन गया था. लोग कैंपस को देखने आया करते थे. उस पर फिदा हो जाते थे. लेकिन मुद्गिल साहब का रौब इतना था कि मजाल नहीं कोई फूलों से छेड़छाड़ भी कर दे.

मुदगिल साहब ने दिलकश लॉन ही तैयार नहीं करवाया, स्कूल कैंपस के बंजर हिस्से में बगीचे भी तैयार करवाए. जिनमें उन्होंने सिर्फ फलदार पौधे लगवाए. देखते ही देखते कुछ ही बरस के भीतर बगीचे सेब, खुबानी, पुलम, नाशपाती जैसे फलों से लकदक हो गए. फलदार वृक्षों की अहमियत हमें तब समझ में आती थी, जब स्कूल में इंटरवल हुआ करता था. हम ज्यादातर बच्चे बगीचे में घुस जाया करते थे. नाशपाती, आडू, पुलम, सेब, जो मर्ज़ी आया तोड़ा और भकोस लिया. स्कूली दिनों में बहुत भूख लगती थी. मुदगिल साहब खुद बगीचे में जाकर एक-एक पेड़ को देखा करते थे. अगर उनको कनखियों से भी देख लिया तो सारे बच्चे डर के मारे उल्टे पांव दौड़ लिया करते थे, लेकिन उन्होंने कभी डांटा नहीं कि बच्चे पेड़ों से फल क्यों तोड़ रहे हैं.

वो बगीचे, वो लॉन, वो फूलों की क्यारियां उन्होंने कैसे तैयार करवाईं, इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है. उन दिनों डीएवी स्कूल में कृषि अध्यापक की एक पोस्ट थी. बहुगुणा जी हुआ करते थे कृषि टीचर. उनको आदेश ये था कि जो बच्चे स्कूल में समय पर न आएं या जो क्लास में झगड़ा करते हुए पकड़े जाएं, उन्हें दंडस्वरूप बेंत मारने या मुर्गा बनवाने के बजाय उनसे खाद मंगवाई जाए. खाद माने जैविक खाद. मने गोबर. ऐसे बच्चे प्लास्टिक की पन्नियों में यथानुसार गोबर या मिट्टी लेकर आते थे. अपन भी ले गए. उसी गोबर को स्कूल के बगीचों में डाला जाता था. यह तरक़ीब काम कर गई. पूरा डीएवी स्कूल हरा-भरा हो गया. कैंपस के बगीचे नाना प्रजातियों के फलदार वृक्षों के साथ एक छोटे से मगर घने जंगल में  बदल गए.

 

सुबह स्कूल के गेट के अंदर घुसते ही एक अलग ही फील आती थी. फूलों और फलों की महक मुग्ध कर देती थी. हरा-भरा लॉन और फलों से लकदक बगीचे देखकर दिल गार्डन-गार्डन टाइप हो जाया करता था. ये सब मुदगिल साहब की बदौलत हुआ. मुद्गिल साहब अब उस दुनिया में नहीं हैं. आज पौड़ी के डीएवी स्कूल की हालत देखकर भी तकलीफ होती है. उस स्वर्णिम अतीत के वहां नामोनिशान तक नहीं हैं. हमारी बंजर सोच ने नया तो कुछ उगाया नहीं, जो लहलहा रहा था उसे भी तहस-नहस कर डाला. लेकिन मुद्गिल साहब के दौर की वो सुनहरी तस्वीरें अब सिर्फ हमारी आंखों में ही बसी हैं.

 

सच में, मुदगिल साहब जैसा टीचर/प्रिंसिपल होना कितना ज़रूरी है.

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अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी ढ़ल ही नहीं सकी। कोर्ट कचहरी से लोग डरते हैं और अपन का बचपन, कई शामें और कई दिन कचहरी में बीते। अपन लोग अल्मोड़ा के बाजार के लोग थे, सो खेलने कूदने की जगह कम थी। अपने मोहल्ले में खेलने की एक ही जगह हो सकती थी वो कचहरी था

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