March 27, 2026
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घूमघाम

अंग्रेज क्या छोड़कर गए?

उत्तराखंड के चकराता के पास डाक बंगला

हमें फ़िल्म ‘शोले’ का शुक्रगुज़ार होना चाहिए जो ‘अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर’ वाले डायलॉग के ज़रिये हमें अंग्रेज़ों का ज़माना याद दिलाता है. हालांकि फिल्म में ‘अंग्रेज़ों के ज़माने का जेलर’ भले ही असरानी का सिर्फ तकिया-कलाम ही था, लेकिन अंग्रेज़ों के ज़माने की कई चीज़ें अब भी मूर्तरूप में हैं जो स्मृतियों की उंगली पकड़कर हमें अतीत की सैर कराती हैं. जैसे अंग्रेज़ों के ज़माने का यह डाक बंगला.

ये बरामदा भी कुछ अलग फील देता है

घने जंगल के बीच बसे ढलाऊ छत वाले इस बंगले को देखकर किसी के भी मन में बहुत सुंदर ख्याल आएंगे। कोई भी यहां ठहरना या इसके बारे में जानना चाहेगा। यह डाक बंगला है। अंग्रेज़ों के ज़माने का बना हुआ। देहरादून से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर चकराता के कनासर के घनघोर जंगल के बीच है यह डाक बंगला।

इस बंगले को देखकर मुझे एक बात याद आ रही है। छोटे कस्बों में अक्सर लोग किसी की अंग्रेज़ियत पर ताना मार देते हैं- अंग्रेज़ चले गए, औलाद छोड़ गए। यह जुमला कई बरसों से अब तक हमारे कानों में गूंजता है। लेकिन अंग्रेज़ जो चीज़ें छोड़कर गए, उनमें एक है उनकी बेजोड़ भवन निर्माण शैली।

बंगले में इसके बनने का साल लिखा 1898

खासकर पहाड़ों में ब्रिटिशकाल में बनी इमारतें/ डाक बंगले तो आज भी इसकी गवाही देते हैं। हम उन जैसा तो नहीं बना पाए, मगर कई जगह अब भी अंग्रेज़ों के दौर की ही बनाई इमारतों/डाक बंगलों से काम चला रहे हैं।

खासकर, पर्वतीय इलाकों में बनाई गई उनकी इमारतें/डाक बंगले सौ, सवा सौ, डेढ़ सौ साल बाद भी वैसी ही खूबसूरती के साथ तनकर खड़ी हैं। चकराता के पास कनासर में देवदार के घने जंगल के बीच यह डाक बंगला सन् 1898 का बना हुआ है। यानी 118 बरस का हो गया है यह डाक बंगला. यहां दो डबल बेड वाले सूइट हैं। दोनों डबल बेड के बीच में एक सेंट्रल सिटिंग कम डाइनिंग रूम है और बाहर है एक सुंदर बरामदा। जिसकी तस्वीर आप ऊपर देख रहे होंगे।

 

उन दिनों अंग्रेज़ अफ़सर लाव-लश्कर के साथ ऐसे ही डाक बंगलों में ठहरते थे। कालंतर में हिंदुस्तानी वीआईपी, मंत्री-संतरी ठहरने लगे। अब इस डाक बगले की देखरेख वन विभाग करता है। दाद देनी होगी कि अब तक इस बंगले का कुछ भी नहीं बिगड़ा। चकराता के बारे में यह भी बताते चलें कि यहां अंग्रेज़ों के ज़माने में छावनी हुआ करती थी। इसकी स्थापना कर्नल ह्यूम और उनके सहयोगी अधिकारियों ने की थी। चकराता ब्रिटिश फौज़ की 55 रेजिमेंट का समर बेस था।

खिर्सू वाले डाक बंगले का आंगन

ऊपर वाली सारी तस्वीरें देहरादून ज़िले के चकराता के कनासर डाक बंगले की हैं। लेकिन अंग्रेज़ों के बनाए डाक बंगले उत्तराखण्ड में कई जगह आज भी मौजूद हैं। जैसे दाहिनी तरफ वाली तस्वीर में दिख रहा खिर्सू वाला यह डाक बंगला। यह देहरादून नहीं, पौड़ी ज़िले में पड़ता है। यह डाक बंगला अंग्रेज़ों ने 1913 में बनाया था। अब यह वन विभाग का विश्राम गृह कहलाता है और इसकी देखरेख वन विभाग करता है। ज़िला मुख्यालय पौड़ी से यहां के लिए परमिट बनता है।

 

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अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी ढ़ल ही नहीं सकी। कोर्ट कचहरी से लोग डरते हैं और अपन का बचपन, कई शामें और कई दिन कचहरी में बीते। अपन लोग अल्मोड़ा के बाजार के लोग थे, सो खेलने कूदने की जगह कम थी। अपने मोहल्ले में खेलने की एक ही जगह हो सकती थी वो कचहरी था

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