अगर आपको ये लग रहा है कि भगत सिंह कोश्यारी साहब महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से रहस्मयी परिस्थितियों में इस्तीफा देने के बाद से गायब हो गए हैं तो ये भ्रम हो सकता है…क्योंकि उत्तराखण्ड की पुष्कर सिंह धामी सरकार में भगत सिंह कोश्यारी एक अदृश्य शक्ति की तरह मौजूद हैं….फिल्मी अंदाज में कहें तो वो एक तरह से मिस्टर इंडिया की तरह हैं…जोकि सामने से दिखते नहीं हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी धामी सरकार के बड़े फैसलों में या धामी सरकार की ओर से की गई नियुक्तियों में दिखती है…जैसे हाल ही में धामी सरकार ने 14 दायित्वधारी बनाए हैं…मतलब अपने 14 नेताओं या कार्यकर्ताओं या समर्थकों को सरकारी सिस्टम में कोई जिम्मेदारी दी है.. तो कई लोग उस फैसले में भी कोश्यारी साहब की छाप देख रहे हैं….
जैसे हमारे एक पुराने परिचित मीडियाकर्मी रहे हैं…ध्रुव रौतेला नाम है उनका..उनको अभी कुछ ही दिनों पहले धामी सरकार में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है…उन्हें मीडिया सलाहकार समिति का उपाध्यक्ष बनाया गया है… वो पिछले कई साल से कोश्यारी साहब के साथ किसी अटैच्ड फाइल की तरह रहे हैं…उनके भरोसेमंद रहे हैं… जब कोश्यारी साहब महाराष्ट्र के राजभवन पहुंचे तो उन्हें भी ले गए थे। राजभवन में उन्हें कोश्यारी साहब ने अपना ओएसडी बनाया था..अब चुनावी साल में धामी साहब ने उनका पुनर्वास कर दिया है…
कुछ समय पहले भी एक बहुत सीनियर और बहुत काबिल जर्नलिस्ट को भी धामी सरकार में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई, तो उन्हें भी कोश्यारी साहब की पसंद बताया जाता है…हालांकि वो वरिष्ठ पत्रकार खुद भी बहुत काबिल, बहुत अनुभवी हैं…और उनका उत्तराखंड सरकार का हिस्सा होना शायद ही किसी को खटका हो…
उनसे पहले कुछ साल पहले भी हमारे एक और पत्रकार मित्र को धामी सरकार में एक बड़ी नियुक्ति मिली थी, तो सत्ता के गलियारों में अंदर की ख़बर रखने वालों से पता चला कि वो नियुक्ति भी कोश्यारी साहब के प्रताप से ही संभव हो पाई थी। मतलब कोश्यारी साहब की संस्तुति या उनकी सिफारिश ने उस नियुक्ति में अहम रोल अदा किया।
मतलब कह सकते हैं कि पुष्कर सिंह धामी सरकार में भगत सिंह कोश्यारी जी की फुल चल रही है….देहरादून में मेरे कई पत्रकार मित्रों से पता चला कि डिफेंस कॉलोनी में जहां भगत सिंह कोश्यारी रह रहे हैं, वहां दिनभर राजनीतिक श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है….उनके लिए कोश्यारी साहब से मिलना, उनसे बतियाना किसी राजनीतिक तीर्थ करने जैसा हो जाता है..
कई लोगों के लिए या यूं कहूं कि सत्ता से कुछ पाने, कुछ हासिल करने या अपना काम निकलवाने के आकांक्षी लोगों के लिए भगत सिंह कोश्यारी जी, धामी सरकार तक पहुंचने का सबसे महत्वपूर्ण रूट हैं…और भगतदा के घर पर दर्शनार्थियों का आना यूं ही नहीं होता…ये धारणा पुख्ता हो चुकी है कि धामी साहब भगत दा की सुनते हैं और उस पर अमल भी करते हैं…
इसी चक्कर में देहरादून में बहुत से कार्यक्रमों में भगत सिंह कोश्यारी को बुलाने की होड़ लगी रहती है…शायद आयोजकों को लगता होगा कि गुरु को साधकर वो चेले को भी साध ही लेंगे….तो कुल मिलाकर धामी राज में भगतदा की भी जै-जै हो रही है…
वरना तो फरवरी 2023 में जब भगतदा महाराष्ट्र का राज्यपाल पद रहस्यमयी परिस्थितियों में छोड़कर सीधे पहाड़ों में पहुंच गए थे तो कहा जाने लगा कि अब भगतदा राजनीतिक वानप्रस्थ की ओर हैं….मतलब सारी राजनीतिक मोह-माया त्यागकर वानप्रस्थी बन गए हैं…लेकिन फिर भगतदा तो भगतदा ठहरे…राजनीति उनकी नस-नस में हैं….
उनके लिए सुविधाजनक बात ये रही कि उनके अपने गृह राज्य में पिछले 9 साल से न सिर्फ उनकी अपनी पार्टी बीजेपी की सरकार है, बल्कि पिछले करीब साढ़े चार साल से उनके अपने राजनीतिक शिष्य पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री हैं…कोश्यारी साहब और धामी साहब के बीच की केमिस्ट्री के बारे में किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है….
आज भी भगत सिंह कोश्यारी, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पुष्कर कहकर संबोधित करते हैं….जबकि धामी साहब भी अपने राजनीतिक गुरु भगतदा को बाबूजी कहकर संबोधित करते हैं….तो दोनों के बीच एक अनौपचारिक और एक मजबूत रिश्ता है…एक तगड़ी बौंडिंग है…
मुझे बहुत करीबी लोगों से पता चला कि मुख्यमंत्री धामी भी कोश्यारी साहब से कई बार परामर्श लेते रहते हैं…खासकर तब जबकि कोई बाहरी या भीतरी संकट घिर आता है..ऐसे मौकों पर कई बार खुद कोश्यारी मुख्यमंत्री आवास पहुंच जाते हैं और कुछ मौके तो ऐसे भी आए हैं जब खुद सीएम धामी देहरादून में डिफेंस कॉलोनी स्थित भगतदा के घर पहुंच गए…
जैसे इसी साल जनवरी महीने की बात है…जब अंकिता भंडारी मामले में वीआईपी को लेकर हुए खुलासे के बाद जो प्रोटेस्ट हो रहे थे…उसी दौरान आंदोलनकारी संगठनों ने फरवरी के पहले हफ्ते मे देहरादून के परेड ग्राउंड में बड़े प्रोटेस्ट का आह्वान किया था..
आंदोलनकारियों की अपील पर लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी जी ने भी एक वीडियो संदेश जारी किया था कि परेड ग्राउंड में बड़ी संख्या में शामिल होवें…नेगीजी की अपील का कैसा असर होता है, धामी सरकार इसे मूल निवास भू कानून वाले आंदोलन में देख चुकी थी..
जनवरी में अंकिता केस में लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी की तरफ से आई अपील से खुद मुख्यमंत्री धामी साहब इतने विचलित हुए कि सीधे अपने राजनीतिक गुरु भगत सिंह कोश्यारी के घर पहुंच गए…
मुझे जो अंदर की खबर पता चला है, वो ये है कि धामी साहब को ये बात पता है कि कोश्यारी साहब के नरेंद्र सिंह नेगीजी से अच्छे ताल्लुकात हैं…तो उन्होंने भगतदा के घर पहुंचकर उन्हें इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वो नेगीदा के घर जाकर उन्हें मनाएंगे…उनसे अपील वापस लेने की अपील करेंगे…
आपको ये तस्वीरें ध्यान होंगी…अपने राजनीतिक शिष्य सीएम धामी के कहने पर भगतदार 31 जनवरी को देहरादून में नेगीदा के घर पर पहुंच गए…उन्हें मनाने की कोशिश की…लेकिन नेगीदा वो वीडियो संदेश वापस लेने को राज़ी नहीं हुए…
उस किस्से का जिक्र यहां इसलिए कर रहा हूं ताकि आपको ये अंदाजा हो जाए कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भगत सिंह कोश्यारीजी के बीच कितने घनिष्ठ संबंध हैं…और धामी सरकार के फैसलों में भगतदा कितने बड़े फैक्टर हैं।
वैसे ये बात शायद आपको पता ही होगी कि धामी साहब, कभी कोश्यारी जी की उंगली पकड़कर ही राजनीति में दाखिल हुए थे….कोश्यारी जी जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने थे तो एबीवीपी के रास्ते बीजेपी युवा मोर्चा में पहुंचे पुष्कर सिंह धामी को तब उन्होंने अपना ओएसडी बनाया था….उससे पहले धामी लखनऊ में हुआ करते थे..
आपको बता दूं कि उत्तराखण्ड में इन 26 साल में जो 12 मुख्यमंत्री हुए हैं, उनमें भगत सिंह कोश्यारी जी दूसरे मुख्यमंत्री थे…हालांकि उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी बहुत ही कम समय के लिए नसीब हो पाई…अलग राज्य बनने के बाद उन्होंने उत्तराखंड की अंतरिम सरकार में 30 अक्टूबर 2001 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी…और 1 मार्च 2002 तक ही वो मुख्यमंत्री रह पाए…यानी उनका कार्यकाल सिर्फ चार महीने ही रहा..इसकी कसक उन्हें आज तक है..
तो उन चार महीनों के दौरान आज के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तब के मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के ओएसडी यानी ऑफिसर Officer on Special Duty रहे और वहीं से वो सरकारी सिस्टम की फंक्शनिंग को करीब से देख और समझ पाए…
मतलब कोश्यारी साहब का राज धामी साहब के लिए राजनीतिक पाठशाला की तरह रहा….साल 2002 में उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी की सरकार चली गई तो धामी को भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और कहा जाता है कि पहली बार साल 2012 के विधानसभा चुनाव में खटीमा से विधायकी का टिकट भी उन्हें भगत सिंह कोश्यारी की बदौलत ही मिला।….
खटीमा से धामी लगातार दो बार विधायक रहे..लेकिन पिछली बार यानी साल 2022 में जबकि वो मुख्यमंत्री थे, तब खटीमा से चुनाव हार गए थे….चुनाव हारने के बावजूद बीजेपी हाईकमान ने उन्हीं पर भरोसा जताया और हारे हुए मुख्यमंत्री को फिर से मुख्यमंत्री बना दिया…उसके बाद की कहानी तो आप लोग जानते ही हैं…
वैसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने राजनीतिक गुरु और अपने राजनीतिक संकटमोचक भगतदा को इसी साल बड़ा नागरिक सम्मान भी दिलाया है…इसी साल गणतंत्र दिवस के मौके पर भगत सिंह कोश्यारी को पद्मभूषण सम्मान देने की घोषणा हुई थी..
वैसे पद्मभूषण को लेकर भगत सिंह कोश्यारी की पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया बड़ी चौंकाने वाली थी…उन्होंने किसी मीडिया के माइक पर कह दिया मुझे भूषण-फूषण की कोई चाह नहीं रही..मेरी कोई उपलब्धि भी नहीं है…


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