March 25, 2026
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आजकल

क्या उत्तराखण्ड क्रान्ति दल से हो पाएगा? — मनु पंवार

पिछले कुछ समय से जब से हमारे उत्तराखंड में क्षेत्रीय अस्मिताओं के मुद्दों ने सिर उठाया है, उनको लेकर गोलबंदी शुरू हुई है। यूकेडी को लेकर एक अलग सेंटिमेंट नज़र आता है। ये जानते हुए भी कि यूकेडी की अपनी समस्याएं कितनी विकट हैं, इस समय उसकी स्थिति क्या है—उसके पास लीडरशिप की क्राइसिस है,

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आजकल

सतपाल महाराज के ‘बैंड, बाजा, बारात’ की इनसाइड स्टोरी — मनु पंवार।

उत्तराखण्ड की राजनीति में और कुछ हो न हो, मनोरंजन की कोई कमी नहीं है। फुल एंटरटेनमेंट है। इतनी सारी तकलीफों में घिरी पब्लिक को कुछ एनजॉयमेंट मिल जाता है, वो भी फ्री में। अब इससे ज्यादा अच्छे दिन और क्या चाहिए। अभी हुआ क्या है कि धामी सरकार के हैवीवेट कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज,

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गीत-संगीत

कहां से निकला गढ़वाली लोकगीत ‘राजा की बग्वानी मोर नाचला झुमैलो’?

राजा की बग्वानी मोर नाचाला झूमैलो….ये गढ़वाली झुमैलो गीत को हम बचपन से सुनते आ रहे हैं…मुमकिन है कि आप में से बहुत से लोगों ने ये गढ़वाली लोकगीत सुना होगा…या आप में से जिनका वास्ता गढ़वाल के गांवों से रहा है…उन्होंने बसंत पंचमी से लेकर बिखौती यानी बैसाखी तक चौक में यानी आंगन में

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Blog पहाड़ को जानो

पानी ने हमारा सामाजिक सौहार्द बिगाड़ दिया है – मनु पंवार

  ऐसे मौसम में गांव आना हुआ जब हमारे गृह राज्य की सरकार बहादुर अपनी पीठ थपथपाने में मस्त है. बड़ा शोर सुना कि समान नागरिक संहिता वाला पहला राज्य होने जा रहे हैं. जहां-तहां गर्व के गुब्बारों को हवा दी जा रही थी, सो हमने भी सोचा कि ‘गर्व’ के एकाध छींटे इधर भी

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Blog लिखा-पढ़ी

जो बड़े-बड़े उस्ताद न कर सके, वो पौड़ी के मोहन ने कर दिखाया

पण्डित मोहन सिंह रावत। यही नाम है पहाड़ के इन विलक्षण संगीतज्ञ का, जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वो कर दिखाया है जोकि चुनींदा हस्तियां ही कर पाई हैं। जैसे उस्ताद मरहूम बिस्मिल्लाह खां साहब ने ब्याह-शादियों में बजने वाले साज़ शहनाई को वहां से उठाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थापित कर दिया। कौड़ी के

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Blog लिखा-पढ़ी

पत्रकारिता की फिक्र छोड़िए, पहले समाज को बचाइए

गांव की बचपन की यादें हैं। जो पहाड़ में रहे हैं या अभी रह रहे हैं, उन्हें तो पता ही होगा। हमारे गांव के पुंगड़ों (खेतों) में लोग अक्सर खड़ी फसल के बीच कुछ-कुछ फासले पर पुतले खड़े कर दिया करते थे। फटे-पुराने, अनुपयोगी कपड़ों से बने या घास-फूस से बने पुतले। पुतलों को कुछ

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अल्मोड़ा के वो सिनेमाघर – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA CINEMA दशकों तक अल्मोड़ा में दो सिनेमाहॉलों का बोलबाला रहा है। पहला रीगल और दूसरा जागनाथ। जागनाथ की चर्चा अगली पोस्ट में करूंगा। आज चर्चा रीगल की। जागनाथ सिनेमाहॉल एलीट कहा जा सकता था लेकिन अल्मोड़ा का रीगल सिनेमाहॉल सबका था..मुख्य सड़क से बिल्कुल सटा हुआ। ऊपर वाली मंजिल में बालकनी और नीचे वाली

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मेरे बचपन की यादों की कचहरी – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA KACHHARI अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी

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प्रतिमा हो गए ‘राजा साब’

शिमला के मशहूर रिज़ पर एक और मूर्ति लग गई है. इस बार दिवंगत वीरभद्र सिंह की प्रतिमा यहां लगाई गई. कल सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं की मौजूदगी में इस प्रतिमा का अनावरण किया गया. रिज़ शिमला की धड़कन है. अब ये दिवंगत हस्तियों की प्रतिमाओं वाला स्थल हो गया है.

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लव इन ‘श्यामला’ मनु पंवार

ऐसे समय में जबकि 21वीं सदी में भारत में स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणाओं ने अभी ज़मीन भी नहीं पकड़ी है, अंग्रेजों द्वारा 19वीं सदी में खूबसूरत पहाड़ियों पर बसाई अपनी तरह की ‘स्मार्ट सिटी’ शिमला का नाम बदलने की चर्चाओं ने ज़ोर पकड़ लिया है। शिमला का नाम बदलकर ‘श्यामला’ किए जाने की मुहिम

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