May 5, 2026
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लोग-बाग

इस ‘पण्डत’ को हिमाचल नहीं भुला पाएगा

हिमाचल प्रदेश में सुखराम अपने समर्थकों/प्रशंसकों के बीच ‘पण्डत सुखराम’ के नाम से जाने जाते थे. समर्थकों के लिए वो देश में संचार क्रांति के मसीहा रहे हैं. हालांकि बहुत से लोगों को उनका नाम इसलिए याद होगा क्योंकि वो नरसिम्हा राव सरकार में हुए संचार घोटाले के आरोपी थे. जो उनके नाम से कतई

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खान-पान

जख्या : गाली भी और स्वाद भी !

यह है जख्या, काले-भूरे दाने वाला बीज ऐसा आपने कई लोगों के मुंह से और अक्सर सुना होगा- अजी! आपकी तो गाली भी हमारे लिए आशीर्वाद की तरह है. अब आप ही बताइए, ये भला कैसे हो सकता है कि बंदा आपको गाली दिए जाए और आप आशीर्वाद समझकर उसे अपने सिर माथे रख दें?

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खान-पान

घर-घर महक रहे विपिन के मसाले

हमारी रसोई में लंबे समय से पहाड़ी मसाले महक रहे हैं, वो भी विपिन पंवार की बदौलत. वैसे इसमें कोई अचरज नहीं है लेकिन इस महक के पीछे एक युवा की जी-तोड़ मेहनत, उनका जज़्बा, उनका पुरुषार्थ है. विपिन कभी दिल्ली में रहते थे, अब उत्तराखण्ड के टिहरी ज़िले के प्रतापनगर में अपने गांव में

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रहन-सहन

कहां गायब हो रहे हैं पारंपरिक पहाड़ी घर?

ये तस्वीरें हमारे गांव की हैं। उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल ज़िले में है गांव। ढलाऊ छत वाले मिट्टी-पत्थर के ऐसे मकान हमारे पहाड़ी गांवों की ख़ास पहचान रहे हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत तो ये है कि ये बर्फीले/सर्द मौसम में भी आपको गुमटी (गर्माहट) देते हैं। मिट्टी के फर्श तापमान को मेन्टेन किये रखते

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रहन-सहन

हिंगोसा : गढवाल के गांवों का जुगाड़

ये बात अक्सर कही जाती है, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जैसे ये लकड़ी है। यूँ तो यह किसी पेड़ का एक तना है, लेकिन इस तरह के तने को हमारे यहां ‘हिंगोस’ कहते हैं। ये एक जुगाड़ है, जिसका इस्तेमाल गांव में ऊँचे पेड़ों से फल इत्यादि तोड़ने के लिए किया जाता है। मतलब

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आजकल

क्या उत्तराखण्ड क्रान्ति दल से हो पाएगा? — मनु पंवार

पिछले कुछ समय से जब से हमारे उत्तराखंड में क्षेत्रीय अस्मिताओं के मुद्दों ने सिर उठाया है, उनको लेकर गोलबंदी शुरू हुई है। यूकेडी को लेकर एक अलग सेंटिमेंट नज़र आता है। ये जानते हुए भी कि यूकेडी की अपनी समस्याएं कितनी विकट हैं, इस समय उसकी स्थिति क्या है—उसके पास लीडरशिप की क्राइसिस है,

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आजकल

सतपाल महाराज के ‘बैंड, बाजा, बारात’ की इनसाइड स्टोरी — मनु पंवार।

उत्तराखण्ड की राजनीति में और कुछ हो न हो, मनोरंजन की कोई कमी नहीं है। फुल एंटरटेनमेंट है। इतनी सारी तकलीफों में घिरी पब्लिक को कुछ एनजॉयमेंट मिल जाता है, वो भी फ्री में। अब इससे ज्यादा अच्छे दिन और क्या चाहिए। अभी हुआ क्या है कि धामी सरकार के हैवीवेट कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज,

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राग-रंग

कहां से निकला गढ़वाली लोकगीत ‘राजा की बग्वानी मोर नाचला झुमैलो’?

राजा की बग्वानी मोर नाचाला झूमैलो….ये गढ़वाली झुमैलो गीत को हम बचपन से सुनते आ रहे हैं…मुमकिन है कि आप में से बहुत से लोगों ने ये गढ़वाली लोकगीत सुना होगा…या आप में से जिनका वास्ता गढ़वाल के गांवों से रहा है…उन्होंने बसंत पंचमी से लेकर बिखौती यानी बैसाखी तक चौक में यानी आंगन में

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आजकल

पानी ने हमारा सामाजिक सौहार्द बिगाड़ दिया है – मनु पंवार

  ऐसे मौसम में गांव आना हुआ जब हमारे गृह राज्य की सरकार बहादुर अपनी पीठ थपथपाने में मस्त है. बड़ा शोर सुना कि समान नागरिक संहिता वाला पहला राज्य होने जा रहे हैं. जहां-तहां गर्व के गुब्बारों को हवा दी जा रही थी, सो हमने भी सोचा कि ‘गर्व’ के एकाध छींटे इधर भी

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राग-रंग

जो बड़े-बड़े उस्ताद न कर सके, वो पौड़ी के मोहन ने कर दिखाया

पण्डित मोहन सिंह रावत। यही नाम है पहाड़ के इन विलक्षण संगीतज्ञ का, जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वो कर दिखाया है जोकि चुनींदा हस्तियां ही कर पाई हैं। जैसे उस्ताद मरहूम बिस्मिल्लाह खां साहब ने ब्याह-शादियों में बजने वाले साज़ शहनाई को वहां से उठाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थापित कर दिया। कौड़ी के

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