April 15, 2026
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लोग-बाग

लव इन ‘श्यामला’ मनु पंवार

ऐसे समय में जबकि 21वीं सदी में भारत में स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणाओं ने अभी ज़मीन भी नहीं पकड़ी है, अंग्रेजों द्वारा 19वीं सदी में खूबसूरत पहाड़ियों पर बसाई अपनी तरह की ‘स्मार्ट सिटी’ शिमला का नाम बदलने की चर्चाओं ने ज़ोर पकड़ लिया है। शिमला का नाम बदलकर ‘श्यामला’ किए जाने की मुहिम

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लिखा-पढ़ी

400 साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा केदारनाथ मनु पंवार

केदारनाथ में साल 2013 में क्या हुआ, ये आप सब जानते ही हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि केदारनाथ मंदिर कभी करीब चार सौ साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा? शायद बहुत से लोगों को पता न हो…लेकिन साइंटिफिक स्टडी में इस बात की पुष्टि होती है…इस वीडियो में केदारनाथ से जुड़े इसी

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लिखा-पढ़ी

स्मृति शेष : मंगलेश डबराल काफलपाणी कि वो ‘लालटेन’ जिसने दुनिया में रोशनी फैलाई

हो सकता है कि काफलपानी गांव के बारे में टिहरी के बाहर बहुत लोगों को पता न हो। लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में लोगों ने काफलपानी का नाम सुना हुआ है। वो इसलिए क्योंकि वहां मंगलेश डबराल पैदा हुए थे। हमारे देश के जाने-माने कवि, लेखक, सम्पादक, अनुवादक मंगलेश डबराल। वह कवि जो सबसे

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आजकल

हिमाचली टोपी : सरकार बदलते ही बदल जाता है रंग मनु पंवार

हिमाचल प्रदेश में सरकार ही नहीं, टोपियां भी सत्ताच्युत हुई हैं. वीरभद्र सिंह की सरकार जाने के साथ ही उनके ट्रेडमार्क हरी टोपी को भी राजनीतिक वनवास मिल गया. टोपियां हिमाचल प्रदेश के लोकजीवन का ही नहीं, राजनीतिक संस्कृति का भी अहम हिस्सा है. ये बात जुदा है कि यहां टोपियों का रंग सरकारों के

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लोग-बाग

‘किन्नर’ से लड़ता किन्नौर मनु पंवार

‘यदि होता किन्नर नरेश मैं राजमहल में रहता सोने का सिंहासन होता सिर पर मुकुट चमकता’ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की इस कविता से गुजरना किसी स्वप्नलोक की सैर करने जैसा है। बचपन में इस कविता को पढ़कर सोचा करते थे कि आखिर वह किन्नर देश सचमुच में होगा कैसे?  इस पूरी कविता की एक-एक पंक्ति

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आजकल

राजनीतिक प्रहसन में क्यों बदल गए नए राज्य? मनु पंवार

  पंद्रह बरस का वक़्त कम नहीं होता यह समझने के लिए कि देश में नई बनी छोटी प्रशासनिक इकाइयां आखिर विफल क्यों रहीं? ठीक पंद्रह साल पहले सन् 2000 में देश के नक्शे में तीन नए राज्य उग आए थे। उत्तराखण्ड, झारखण्ड और छत्तीसगढ़। हालांकि छत्तीसगढ़ को तब गिफ्ट माना गया क्योंकि उत्तराखण्ड और

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लोग-बाग

पांच साल की बाध्यता में घुटती ज़िंदा कौमें मनु पंवार

राम मनोहर लोहिया कहा करते थे, ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’। लेकिन मुश्किल ये है कि किसी निर्वाचित सरकार या प्रतिनिधि को पांच साल ढोने की विवशता का कोई तोड़ हम आज तक नहीं ढूंढ पाए हैं। इस मजबूरी ने एक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था को किस कदर बेबस और लाचार बना दिया है,

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आजकल

बड़कोट।उपजिलाधिकारी बृजेश कुमार तिवारी ने रविवार को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में स्वतंत्र और स्वतंत्र प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका पर ज़ोर दिया।

बड़कोट।उपजिलाधिकारी बृजेश कुमार तिवारी ने रविवार को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में स्वतंत्र और स्वतंत्र प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका पर ज़ोर दिया। उन्होंने उन पत्रकारों की सराहना करते हुए कहा कि पत्रकार आज भी भ्रष्टाचार और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका में रहते

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