October 17, 2026

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राग-रंग

कहां से निकला गढ़वाली लोकगीत ‘राजा की बग्वानी मोर नाचला झुमैलो’?

राजा की बग्वानी मोर नाचाला झूमैलो….ये गढ़वाली झुमैलो गीत को हम बचपन से सुनते आ रहे हैं…मुमकिन है कि आप में से बहुत से लोगों ने ये गढ़वाली लोकगीत सुना होगा…या आप में से जिनका वास्ता गढ़वाल के गांवों से रहा है…उन्होंने बसंत पंचमी से लेकर बिखौती यानी बैसाखी तक चौक में यानी आंगन में

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आजकल

पानी ने हमारा सामाजिक सौहार्द बिगाड़ दिया है – मनु पंवार

  ऐसे मौसम में गांव आना हुआ जब हमारे गृह राज्य की सरकार बहादुर अपनी पीठ थपथपाने में मस्त है. बड़ा शोर सुना कि समान नागरिक संहिता वाला पहला राज्य होने जा रहे हैं. जहां-तहां गर्व के गुब्बारों को हवा दी जा रही थी, सो हमने भी सोचा कि ‘गर्व’ के एकाध छींटे इधर भी

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राग-रंग

जो बड़े-बड़े उस्ताद न कर सके, वो पौड़ी के मोहन ने कर दिखाया

पण्डित मोहन सिंह रावत। यही नाम है पहाड़ के इन विलक्षण संगीतज्ञ का, जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वो कर दिखाया है जोकि चुनींदा हस्तियां ही कर पाई हैं। जैसे उस्ताद मरहूम बिस्मिल्लाह खां साहब ने ब्याह-शादियों में बजने वाले साज़ शहनाई को वहां से उठाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थापित कर दिया। कौड़ी के

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आजकल

पत्रकारिता की फिक्र छोड़िए, पहले समाज को बचाइए

गांव की बचपन की यादें हैं। जो पहाड़ में रहे हैं या अभी रह रहे हैं, उन्हें तो पता ही होगा। हमारे गांव के पुंगड़ों (खेतों) में लोग अक्सर खड़ी फसल के बीच कुछ-कुछ फासले पर पुतले खड़े कर दिया करते थे। फटे-पुराने, अनुपयोगी कपड़ों से बने या घास-फूस से बने पुतले। पुतलों को कुछ

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किस्सागोई

अल्मोड़ा के वो सिनेमाघर – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA CINEMA दशकों तक अल्मोड़ा में दो सिनेमाहॉलों का बोलबाला रहा है। पहला रीगल और दूसरा जागनाथ। जागनाथ की चर्चा अगली पोस्ट में करूंगा। आज चर्चा रीगल की। जागनाथ सिनेमाहॉल एलीट कहा जा सकता था लेकिन अल्मोड़ा का रीगल सिनेमाहॉल सबका था..मुख्य सड़क से बिल्कुल सटा हुआ। ऊपर वाली मंजिल में बालकनी और नीचे वाली

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किस्सागोई

मेरे बचपन की यादों की कचहरी – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA KACHHARI अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी

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लोग-बाग

प्रतिमा हो गए ‘राजा साब’

शिमला के मशहूर रिज़ पर एक और मूर्ति लग गई है. इस बार दिवंगत वीरभद्र सिंह की प्रतिमा यहां लगाई गई. कल सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं की मौजूदगी में इस प्रतिमा का अनावरण किया गया. रिज़ शिमला की धड़कन है. अब ये दिवंगत हस्तियों की प्रतिमाओं वाला स्थल हो गया है.

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खोजबीन

लव इन ‘श्यामला’ मनु पंवार

ऐसे समय में जबकि 21वीं सदी में भारत में स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणाओं ने अभी ज़मीन भी नहीं पकड़ी है, अंग्रेजों द्वारा 19वीं सदी में खूबसूरत पहाड़ियों पर बसाई अपनी तरह की ‘स्मार्ट सिटी’ शिमला का नाम बदलने की चर्चाओं ने ज़ोर पकड़ लिया है। शिमला का नाम बदलकर ‘श्यामला’ किए जाने की मुहिम

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खोजबीन

400 साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा केदारनाथ मनु पंवार

केदारनाथ में साल 2013 में क्या हुआ, ये आप सब जानते ही हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि केदारनाथ मंदिर कभी करीब चार सौ साल तक बर्फ के नीचे दबा रहा? शायद बहुत से लोगों को पता न हो…लेकिन साइंटिफिक स्टडी में इस बात की पुष्टि होती है…इस वीडियो में केदारनाथ से जुड़े इसी

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लिखा-पढ़ी

स्मृति शेष : मंगलेश डबराल काफलपाणी कि वो ‘लालटेन’ जिसने दुनिया में रोशनी फैलाई

हो सकता है कि काफलपानी गांव के बारे में टिहरी के बाहर बहुत लोगों को पता न हो। लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में लोगों ने काफलपानी का नाम सुना हुआ है। वो इसलिए क्योंकि वहां मंगलेश डबराल पैदा हुए थे। हमारे देश के जाने-माने कवि, लेखक, सम्पादक, अनुवादक मंगलेश डबराल। वह कवि जो सबसे

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