May 11, 2026
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राग-रंग

कहां से निकला गढ़वाली लोकगीत ‘राजा की बग्वानी मोर नाचला झुमैलो’?

राजा की बग्वानी मोर नाचाला झूमैलो….ये गढ़वाली झुमैलो गीत को
हम बचपन से सुनते आ रहे हैं…मुमकिन है कि आप में से बहुत से
लोगों ने ये गढ़वाली लोकगीत सुना होगा…या आप में से जिनका वास्ता
गढ़वाल के गांवों से रहा है…उन्होंने बसंत पंचमी से लेकर बिखौती यानी
बैसाखी तक चौक में यानी आंगन में लगने वाले लोकगीतों में कभी न
कभी ये गाना जरूर सुना होगा….
आपको क्या लगता है, क्या यह गढ़वाली गीत सिर्फ किसी रचनाकार की
कल्पना पर आधारित है? या ये गीत किसी घटना, किसी जगह या किसी
सिचुएशन पर लिखा गया है? यहां इसकी पूरी अनसुनी कहानी
आपको बताने जा रहा हूं। पहले तो यह जान लीजिए कि राजा की
बाग्वानी मोर नाचाला झूमैलो, इस पंक्ति का हिंदी में भावार्थ हुआ-
राजा के बगीचों में मोर नाच रहे हैं
मोर चूंकि गर्म इलाकों में पाया जाता है, इसलिए पहाड़ों में मोर का जिक्र
आना थोड़ा चौंका सकता है. इसीलिए इस गढ़वाली गीत में मोर के जिक्र
से हो सकता है कि कई लोग रिलेट नहीं कर पा रहे हों..लेकिन इस
लोकगीत की ये पंक्तियां कल्पनाभर नहीं है…किसी दौर में टिहरी के
राजा, जोकि साल 1815 से पहले तक पूरे गढ़वाल के राजा हुआ करते
थे, उनके महल के इर्द-गिर्द बगीचे हुआ करते थे.. उनमें किस्म-
किस्म के फूल खिले होते थे… और न सिर्फ फूल खिले होते थे,
बल्कि उनमें मोर भी होते थे…मोर नाचा करते थे…और ये गढ़वाली
लोकगीत भी वहीं से निकला हुआ माना जाता है..वरिष्ठ पत्रकार और

लेखक महिपाल नेगी ने अपनी किताब ‘टिहरी की जलसमाधि’ में
टिहरी के राजा के राजमहल के बगीचों में मोर नाचने का उल्लेख किया
है

वह टिहरी जो डैम की खातिर डुबोया जा चुका है…उसके एक ऊंचे टीले
में पुराना राजमहल हुआ करता था…ये राजमहल 1815 में बनना तब
शुरू हुआ था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने गढवाल का विभाजन
करवा लिया था और गढ़वाल के पंवार राजवंश के उत्तराधिकारियों को
केवल टिहरी-उत्तरकाशी वाला हिस्सा ही दिया…वरिष्ठ पत्रकार और
लेखक महिपाल नेगी के मुताबिक, ‘टिहरी के उस राजमहल को
बनने में करीब तीस साल लगे। मतलब साल 1815 में उस पर काम
शुरू हुआ और साल 1845 तक चला….टिहरी के राजमहल में कुल
मिलाकर 100 कमरे थे…पहली मंजिल के नीचे तहखाने थे और बाहर
निकलने के लिए गुप्त द्वार थे…राजमहल के आंगन के बाहर चारों ओर
ऊंची दीवारें थीं. प्रवेश करने के लिए विशाल फाटक थे जिनसे हाथी
भीतर जा सकते थे…यह महल उस दौर की गढ़वाली वास्तुकला का
उत्कृष्ट उदाहरण था।’
इस राजमहल को टिहरी रियासत के पहले राजा सुदर्शन शाह ने बनवाया
था…यहां उस राजमहल की पुरानी तस्वीर दी जा रही है..जिसे पुराना
दरबार कहा जाता था..सुदर्शन शाह एकीकृत गढ़वाल राज्य के आखिरी
शासक राजा प्रद्युमन शाह के बेटे थे…साल 1815 में अंग्रेजों ने गोरखों
से गढ़वाल राज्य मुक्त करवाने के बदले इस राज्य को दो हिस्सों में बांट
दिया था और पंवार राजवंश के उत्तराधिकारी सुदर्शन शाह को टिहरी वाला
हिस्सा लेकर संतोष करना पड़ा था और खुद अंग्रेजों ने आज के पौड़ी
गढ़वाल, चमोली और रुद्प्रयाग जिले वाला हिस्सा अपने पास रख लिया
था…

अब जो जिक्र इस गढ़वाली लोकगीत में आ रहा है कि राजा की बग्वानी
मोर नचाला झुमैलो…वो कहां का चित्रण है…इसे भी समझिए।
दरअसल 1871 में प्रताप शाह टिहरी के नए राजा बने थे…उन्होंने करीब
16 साल राज किया। प्रताप शाह वही राजा थे, जिन्होेंने अपने
राज्याभिषेक के 6 साल के बाद ही यानी सन 1877 में टिहरी से करीब
12 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में ऊंची पहाड़ी पर अपने नाम से प्रताप
नगर को बसाना शुरू किया…. तो जैसा कि महिपाल नेगी की किताब
टिहरी की जलसमाधि में जिक्र है,‘टिहरी के राजा प्रताप शाह ने ही
पुराने राजदरबार के करीब तीन किलोमीटर दूर शहर के पूर्वी छोर पर
सिमलासू में एक भव्य भवन बनाया और उसकी दोनों मंजिलों का अलग-
अलग नामकरण कर दिया.  निचली मंजिल रंग महल और ऊपरी
मंजिल शीश महल।’


ये उस रंग महल की और शीश महल की बहुत पुरानी तस्वीर है…बाद
में ये महल टिहरी बांध के विशाल जलाशय में डूब गए…शीश महल और
रंग महल आखिरी दिनों में टिहरी बांध के निर्माण में लगी एक कंपनी का
ऑफिस रहा…तस्वीर बता रही है कि डूबने से पहले राजा प्रताप शाह का
बनाया रंग महल और शीश महल कबाड़खाने में बदल गया था…
महिपाल नेगी लिखते हैं ‘राजा प्रताप शाह पुराना राजदरबार के अलावा
रंगमहल और शीशमहल में भी काफी समय बिताते थे। इन महलों के
चारों ओर एक बगीचा विकसित किया गया, जिसे रानी बाग कहा
गया।’ इसी रानीबाग में उस दौर में मोर नाचा करते थे। तब जो हमारे
लोक गायक थे… जो बेडा परम्परा के गीतकार थे और गायक थे,
उन्होंने रानीबाग के उन्हीं मोरों को लेकर एक गीत बनाया…राजा की
बग्वानी मोर नाचाला झुमैलो….हालांकि कई जानकारों का ये भी कहना
है कि पंवार राजवंश की पुरानी राजधानी श्रीनगर भी बाग-बगीचों वाली
नगरी थी…वहां भी मोरों की मौजूदगी का कुछ जगह जिक्र आता है.,.

 

तो राजा के बगीचे में मोर नाचते थे…लेकिन ये बहुत पुरानी बात हो
गई… अब न तो पुराना श्रीनगर रहा, न टिहरी रहा..न राजा रहे, न
महल रहा, न बगीचा रहा और न ही मोर रहे…लेकिन इंटरेस्टिंग बात
देखिए कि तब के लोककलाकारों के कंठों से उस दौर में फूटा वो गढ़वाली
लोकगीत अब तक जिंदा है…जो इतिहास के उस दौर को शब्द चित्रों में
बयां कर रहा है…तो टिहरी राज परिवार के दो महलों का जिक्र मैंने
किया…पहला- तो तिमंजिला राजदरबार था…100 कमरों वाला..जिसे
बनाया था राजा सुदर्शन शाह ने और दूसरा वो महल जिसमें रंग महल
और शीश महल थे और जिसे बनाया था राजा प्रताप शाह ने…लेकिन
टिहरी के राजवंश ने एक और महल बनाया था….वो तीसरा महल
कैसल दरबार के नाम से जाना गया…. जिसे बनाया था राजा कीर्ति
शाह ने जिन्होंने कि अपने पुरखों की राजधानी श्रीनगर गढ़वाल के पास
अपने नाम से एक नगर भी बसाया—नाम है कीर्ति नगर….महिपाल
नेगी अपनी किताब में लिखते हैं, ‘कैसल दरबार नाम का राजमहल
राजा कीर्ति शाह ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में बनवाया….राजा
सुदर्शन शाह द्वारा बनाए गए पहले महल, जिसे पुराना राजदरबार कहते
थे, से पूर्व दिशा में कुछ और अधिक ऊंची चोटी पर तहखाने सहित यह
तीन मंजिला भव्य महल बना। इसी के निकट रानी महल भी बनवाया
गया था। ऊंचाई पर होने के कारण यह महल काफी बाद में डूबा।’
अब तो टिहरी को डूबे हुए कई साल हो चुके हैं…महलों का नामोनिशान
तक नहीं बचा हुआ है…हां, जब कभी टिहरी झील में पानी कम हो
जाता है तो झील में डूबे उन महलों का कुछ हिस्सा कभी-कभार नजर
आ जाता है….लेकिन ये लोकगीत चूंकि लोक के कंठों में बैठ गया
था…इसलिए वो पीढी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता गया….और आज भी बहुत
से मंचों पर ये गाया जाता है…पंचमी से लेकर बैसाखी तक पहाड़ के
आंगन-आंगन में गाया जाता है… रेडियो से भी ये गाना सुना जाता है

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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