March 27, 2026
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रहन-सहन

हिंगोसा : गढवाल के गांवों का जुगाड़

ये बात अक्सर कही जाती है, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जैसे ये लकड़ी है। यूँ तो यह किसी पेड़ का एक तना है, लेकिन इस तरह के तने को हमारे यहां ‘हिंगोस’ कहते हैं। ये एक जुगाड़ है, जिसका इस्तेमाल गांव में ऊँचे पेड़ों से फल इत्यादि तोड़ने के लिए किया जाता है। मतलब जहां आपका हाथ नहीँ पहुँच पाता, वहां ‘हिंगोस’ पहुँच जाता है।

इसका इस्तेमाल कुछ यूं होता है कि पेड़ पर लगे फल की जड़ पर ‘हिंगोस’ का मुड़ा हुआ हिस्सा फंसाया, एक झटका दिया और फल पत्त से ज़मीन पर गिर जायेगा। मैंने इस बार अपनी गांव यात्रा में ‘हिंगोस’ से अपने छोटे से बगीचे से माल्टा (संतरा), पपीते और कागजी (नींबू) तोड़े।

लेकिन ये जो ‘हिंगोस’ आपको तस्वीर में दिख रहा है, उसका किस्सा बड़ा मज़ेदार है। गांव में पड़ोस के कुछ शरारती बच्चों ने हमारे अखरोट के पेड़ से अखरोट चोरी करने के लिए ये ‘हिंगोस’ लटकाया हुआ था। वो छुप-छुप के जाने कब से हमारे अखरोटों पे हाथ साफ कर रहे थे। गांव में बुजुर्ग मां अकेले रहती है। उसकी नज़र नहीं पड़ी। लेकिन एक दिन मेरी मां ने ‘मौका-ए-वारदात’ से ये ‘हिंगोस’ ज़ब्त कर ही लिया।

मेरी माँ कई बार पड़ोस में आवाज़ लगाके कह चुकी है कि अपना ‘हिंगोस’ वापस ले जाओ रे ! मगर ‘गुनाह’ में इस्तेमाल हुआ ‘हथियार’ बरामद हो चुका था। ऐसे में भला ‘हिंगोस’ पर क्लेम करने कौन माई का लाल आगे आता? कोई आया भी नहीं। ये कमबख्त अपराधबोध भी क्या चीज़ है।

 

administrator
अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी ढ़ल ही नहीं सकी। कोर्ट कचहरी से लोग डरते हैं और अपन का बचपन, कई शामें और कई दिन कचहरी में बीते। अपन लोग अल्मोड़ा के बाजार के लोग थे, सो खेलने कूदने की जगह कम थी। अपने मोहल्ले में खेलने की एक ही जगह हो सकती थी वो कचहरी था

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