March 19, 2026
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पत्रकारिता की फिक्र छोड़िए, पहले समाज को बचाइए

गांव की बचपन की यादें हैं। जो पहाड़ में रहे हैं या अभी रह रहे हैं, उन्हें तो पता ही होगा। हमारे गांव के पुंगड़ों (खेतों) में लोग अक्सर खड़ी फसल के बीच कुछ-कुछ फासले पर पुतले खड़े कर दिया करते थे। फटे-पुराने, अनुपयोगी कपड़ों से बने या घास-फूस से बने पुतले। पुतलों को कुछ इंसानी शक्ल दे दी जाती थी। मुंह, हाथ, पैर वगैरह बनाकर, ताकि लगे कि कोई जीता-जागता इंसान खड़ा है।

 

ये पुतले उन जंगली जानवरों के झुंड को झांसा देने या डराने, जो भी कहें, के लिए बनाए जाते थे, जोकि अक्सर शाम ढलते ही या रात को फसल को नुकसान पहुंचाने खेत में घुस आते थे। ध्येय यह था कि इंसानी शक्लों को देखकर वो जंगली जानवर इस धोखे में रहे कि अरे ! ये बंदा तो अपनी फसल की रखवाली के लिए खड़ा है। यहां अटैक करना ठीक नहीं वरना बहुत कूटे जाएंगे। इंसान होने का इतना प्रिविलेज तो मिलता है।

 

पहाड़ में तब के प्राय: शरीफ लोग यह मान बैठते थे या उनको ये गुमान था कि इस पुतले वाले छल-छद्म से वो जंगली जानवरों से अपनी फसलें बचा लेते हैं। यह जंगली जानवरों के व्यवहार या बर्ताव को पढ़ने लेने का हमारे पुरखों का अपना स्टाइल था। हो सकता है, उस दौर के जंगली जानवर भी उस दौर के पहाड़ियों जैसे मासूम या नादान रहे हों, जो उस आभासी दुश्मन से ही भयभीत हो जाते थे। जबकि असल में वो हाड़-मांस का इंसान नहीं, बल्कि लट्ठ पर खड़ा घास-फूस या अनुपयोगी कपड़ों का एक पुतला मात्र होता था। यह निहायत ही हद दर्जे की मासूमियत थी।

 

लेकिन खेतों में खड़ी फसल को इंसानी पुतलों की निगेहबानी में छोड़ देने वाले वही भोले, नादान, शरीफ पहाड़ी भाईबंद बाघ से अपने मूल्यवान पशुधन को नहीं बचा पाते थे। जिस पशुधन से कई परिवारों का गुज़ारा चलता था। घर चलता था। परिवार चलता था।  उसे किसी रोज़ बाघ उठाकर ले जाता। ऐसी कई  घटनायें उस दौर में हमारे सामने ही हुईं।

 

1990 के दशक की शुरुआत मेंं जब मैं नैनीताल से प्रकाशित होने वाले उत्तराखण्ड के एक धारदार पाक्षिक अख़बार  ‘नैनीताल समाचार’ से जुड़ा हुआ था। पौड़ी से लिखता था। तब राजू भाई (दिवंगत राजेंद्र रावत) की एक लीड स्टोरी प्रकाशित हुई थी। उसका शीर्षक कुछ यूं था कि, गढ़वाल में बाघ इतने लाख रुपये डकार गया। उसमें राजू भाई ने पूरी डीटेल दी थी कि कैसे पहाड़ में बाघ ने पशुपालकों की इकॉनमी की कमर तोड़ दी है। वो रिपोर्ट बहुत चौंकाने वाली थी। करीब तीन दशक बाद भी वो रिपोर्ट मेरे ज़ेहन में गूंजती है।

 

बाघ को हम इंसानी पुतले से नहीं डरा सकते। बाघ ताकत का प्रतीक है। सत्ता का प्रतीक है। बाहुबल का प्रतीक है। बाघ इंसानों को भी खा जाता है। यह किस्सा साझा करने का मेरा अभिप्राय सिर्फ इतना है कि पहाड़ के समाज पर आज ख़तरा बड़ा है। आज के डिजिटल दौर में एक समाज के तौर पर हम आदमखोर हमलों की चपेट में हैं। इसके लिए इंसानी पुतले खड़े कर देने जैसी जुगत नहीं चलेगी। बाघ अलग रूप धरकर आए हैं। उनसे भिड़ने के लिए आपका जिगर मजबूत होना ही काफी नहीं है। ये हमले बेहद घातक हैं। उनके खिलाफ सामूहिक लड़ाई की जरूरत है।

 

हमारे दिमागों में, सोच-समझ में, बुद्धि में, विचार में ज़हरबुझे और खूनी पंजे लगातार गाड़े जा रहे हैं। हमारी एक पूरी पीढ़ी बर्बाद की जा रही है। यह सोचा-समझा हमला है। पिछले कुछ सालों के भीतर इसकी स्पीड बहुत तेज़ हुई है। हमारे धैर्य, विवेक, समझ, तर्कशीलता सबका बंध्याकरण कर दिया गया है।  पहाड़ के लोगों ने अपने धारदार दिमागों से दुनिया में अपनी प्रतिभा, अपनी बौद्धिकता का परचम लहराया है। उन्हीं दिमागों पर अटैक हो रहे हैं। उन्हें डिजिटल माध्यमों के ज़रिये बंजर किया जा रहा है। हम पहाड़ी समाज की एक भिन्न किस्म की बुनावट रही है। उसमें उदारता है, संवेदनशीलता, सामूहिकता का पुट है। हमें इस पर नाज़ रहा है। यही इसकी ख़ूबसूरती रही है। लेकिन देखते ही देखते हम मुर्दा समाज बनाए जा रहे हैं। और ताज्जुब की बात यह है कि हमें इसका अहसास तक नहीं है।

 

पता नहीं हम में से कितने लोग अपने पहाड़ के समाज पर इस तरह के ख़तरों को भांप पा रहे हैं या नहीं, मगर अपने इर्द-गिर्द हर कोई ऐसा घटते हुए रोज़ाना देख-सुन या अनुभव कर रहा होगा। वैसे तो यह बहुत से लोगों का अनुभव होगा, लेकिन मैं अपने निजी अनुभव से कह रहा हूं कि तमाम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर मैं अपने परिचितों, मित्रों, यहां तक कि गांंववालों और रिश्तेदारों तक से लगभग रोज़ भिड़ जाता हूं। अपने पहाड़ के कई वॉट्सएप ग्रुपों में परिचित लोगों से भी सिर्फ़ इसलिए उलझ जाता हूं क्योंकि वो बेहद नफ़रत भरे, उन्मादी, फर्जी सूचनाओं से लैस कॉन्टेंट, वीडियो, तस्वीरें, इन्फो ग्राफिक्स, मीम्स शेयर करते हैं।

 

आप ताज्जुब करेंगे कि ऐसा कुकृत्य करने वालों की जब मैंने पहचान करनी शुरू की तो उनमें से कई तो सरकारी अध्यापक निकले। मुझे उनके अध्यापक या शिक्षक होने पर अफसोस होने से ज्यादा अपने पहाड़ की उस पीढ़ी की फिक्र है जिनको संवारने और जिन्हें अच्छा नागरिक बनाने का जिम्मा ऐसे ज़हरीले लोगों के पास है। मुझे निश्चित ही उन मासूम दिमागों की फिक्र है जिन्हें ऐसे ‘आदमखोरों’ के बाड़े में छोड़ दिया गया है। चिंता की बात यह भी है कि ऐसे कई सरकारी नौकर, जिनका कि घर पब्लिक के पैसे चलता है, वो हमारे ही पैसे से एक बेहद ख़तरनाक सोसायटी तैयार करने के बेहद ख़तरनाक प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं।

 

 

ऐसा ज़हरबुझा कॉन्टेंट विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये रोज़ाना आपकी नज़रों से गुजरता होगा। मेरी नज़रों से भी गुज़ता है, लेकिन मैं प्राय: विरोध दर्ज करने से नहीं हिचकता, इसकी परवाह किए बगैर कि फलां बुरा मान जाएगा। मैंने कई बार ऐसी फर्जी वीडियोज/ख़बरों के खिलाफ जवाबी वीडियोज बनाए हैं। सोशल मीडिया पर अपने परिचितों और यहां तक कि पत्रकार मित्रों द्वारा शेयर कई फोटोशॉप्ड तस्वीरों की सच्चाई की पड़ताल करके बताया है कि असलियत वो नहीं, ये है। इस चक्कर में मेरे कई पुराने परिचितों, मित्रों, रिश्तेदारों से सम्बन्ध बिगड़े हैं। लेकिन मुझे इसकी चिंता नहीं है। हालांकि झूठ को बेपर्दा करने की यह कोशिश नक्कारखाने में तूती की हैसियत जैसी है। हमारा पूरा समाज हमले की जद में है। स्मार्ट फोन से पूरी पीढ़ी को जाहिल-गंवार बना देने का यह खेल पहाड़ के गांव-गांव तक पहुंच चुका है। इसीलिए कह रहा हूं कि यह खतरनाक स्तर का हमला है और जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं, इसके खिलाफ लड़ाई व्यक्तिगत न होकर, सामूहिक है।

 

इससे हो यह रहा है कि हमारा फोकस पुतलों से डर जाने वाले जंगली जानवरों से फसल की रक्षा करने पर ज्यादा हो रहा है। हम उसी में मगन हैं। खेतों में खड़े होकर हुर्र-हुर्र कर रहे हैं। हम एक समाज के तौर पर उन बाघों का मुकाबला करने के बारे में सोच ही नहीं पा रहे हैं, जिन्होंने पहले हमारे पशुधन को चट करके हमारी इकॉनमी की कमर तोड़ दी बल्कि अब तो वो आदमखोर हो चुके हैं। इंसानों को खाने लगे हैं। इसका फायदा बाहर की वो ताकतें उठा रही हैं जिनकी नज़र हमारी ज़मीनों पर हैं। हम उनके सेट किए एजेंडे पर अपनों से ही लड़ रहे हैं और वो अपनी पसंद की सरकारें बनवा रहे हैं। महत्वपूर्ण जगहों पर अपनी पसंद के लोग बैठा रहे हैं। अपने मनमाफिक नीतियां बनवा रहे हैं। पता नहीं आपको अहसास भी है कि नहीं कि जिन्हें आप अपना नेता चुनकर भेज रहे हैं, वो तो दिल्लीवालों की मैनेजरी से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

 

आपको ख़बर ही नहीं है कि हम पहाड़ी लोग धीरे-धीरे अपनी ज़मीनों से बेदखल किए जा रहे हैं। एक समाज के तौर पर हमारे भीतर बहुत कुछ टूट रहा है। यह हमला बड़ा सुनियोजित है। और हम इतने लाटे किस्म के लोग हैं कि किसी सब्जी वाले, किसी फल विक्रेता, किसी चूड़ी-बिंदी वाले, फेरी वाले को डरा-धमकाकर, हड़काकर, उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करके ही खुश हैं। हम उसी का हौव्वा खड़ा कर दे रहे हैं और उसी को ज़लील करके हमें छपछपी पड़ जा रही है कि हम पहाड़ को बचाने के सद्कर्म में लगे हैं।  नहीं रे दिदा ! लट्ठ पर खड़ा घास-फूस या अनुपयोगी कपड़ों का पुतला बनाने जैसी समझ से आगे बढ़ना होगा। इसीलिए कह रहा हूं कि पत्रकारिता को लेकर फिक्रमंद होने के बजाय समाज की चिंता करिए। आप बस सोशल मीडिया पर हुर्र-हुर्र करते रह जाओगे और बाहर की ताकत लोग आपके घर-पुंगड़े सब अपने नाम कर देंगे। देखना, ऐसे ही लाटे बने रहे तो किसी दिन आपके पैरों तले ज़मीन ही नहीं रहेगी। तब किसका डर दिखाओगे?

administrator
अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी ढ़ल ही नहीं सकी। कोर्ट कचहरी से लोग डरते हैं और अपन का बचपन, कई शामें और कई दिन कचहरी में बीते। अपन लोग अल्मोड़ा के बाजार के लोग थे, सो खेलने कूदने की जगह कम थी। अपने मोहल्ले में खेलने की एक ही जगह हो सकती थी वो कचहरी था

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