March 27, 2026
Chicago 12, Melborne City, India
रहन-सहन

कहां गायब हो रहे हैं पारंपरिक पहाड़ी घर?

ये तस्वीरें हमारे गांव की हैं। उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल ज़िले में है गांव। ढलाऊ छत वाले मिट्टी-पत्थर के ऐसे मकान हमारे पहाड़ी गांवों की ख़ास पहचान रहे हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत तो ये है कि ये बर्फीले/सर्द मौसम में भी आपको गुमटी (गर्माहट) देते हैं। मिट्टी के फर्श तापमान को मेन्टेन किये रखते हैं, चाहे सर्दी हो या गर्मी।

ढलाऊ छत पर पठाल लगी है। स्लेट भी कह सकते हैं (हिमाचल के गांवों में स्लेट ही कहा जाता है)। बड़ी सी चट्टान को तोड़कर उससे इन पठालों को तराशा जाता रहा है। लकड़ी की मोटी-मोटी और गोलाकार बल्लियों और फट्टों को बिछाकर छत और फर्श तैयार किये जाते हैं। ऐसे घरों के निर्माण हमारे गांवों में सामुदायिकता की शानदार मिसाल भी रहे हैं।

किसी का ऐसा मकान बनता था तो उसमें पूरे गांव की भागीदारी होती थी। दूर जंगल में काटे गए पेड़ की मोटी बल्लियां कंधे और सिर पर ढो कर लाना, पत्थरों और मिट्टी की ढुलाई, पानी की व्यवस्था सब कुछ लोग मिलजुल कर करते थे। कुछ घरों में तो ऐसी ज़बरदस्त शिलायें लगी हैं, जिनको देखकर पुरखों के पुरुषार्थ को नमन करने का मन करता है। इन घरों को बनाने वाला मिस्त्री प्रायः दलित होता था।

भवन निर्माण की ये बेजोड़ शैली रही है। एक एक बेडौल पत्थर को तराशना, उसको बिछाना, दो पत्थरों के बीच के गैप को पाटने के लिए छोटे-छोटे पत्थर तराशना, ये कोई कम धैर्य का काम नहीँ है।

हमारे यहां ऐसे घर बनने अब लगभग बंद हो गए हैं। तर्क ये है कि उनमें मेहनत और समय बहुत लगता है। कुल मिलाकर श्रमसाध्य है। हालांकि अब वैसे कारीगर या मिस्त्री भी नहीं रहे। लिहाजा उन घरों की जगह गांव-गांव में सीमेंट, कंक्रीट, ईंट वाले घर लेते जा रहे हैं। लेकिन ये घर पहाड़ के मिजाज के कतई अनुकूल नहीं हैं। न यहां के भूगोल के और न ही जलवायु के। सीमेंट-कंक्रीट वाले घर गर्मियों में गरम और सर्दियों में चस्से (बेहद ठंडे) होते हैं।

administrator
अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी ढ़ल ही नहीं सकी। कोर्ट कचहरी से लोग डरते हैं और अपन का बचपन, कई शामें और कई दिन कचहरी में बीते। अपन लोग अल्मोड़ा के बाजार के लोग थे, सो खेलने कूदने की जगह कम थी। अपने मोहल्ले में खेलने की एक ही जगह हो सकती थी वो कचहरी था

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