May 11, 2026
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लोग-बाग

इस ‘पण्डत’ को हिमाचल नहीं भुला पाएगा

हिमाचल प्रदेश में सुखराम अपने समर्थकों/प्रशंसकों के बीच ‘पण्डत सुखराम’ के नाम से जाने जाते थे. समर्थकों के लिए वो देश में संचार क्रांति के मसीहा रहे हैं. हालांकि बहुत से लोगों को उनका नाम इसलिए याद होगा क्योंकि वो नरसिम्हा राव सरकार में हुए संचार घोटाले के आरोपी थे. जो उनके नाम से कतई परिचित नहीं है, उनके लिए इतना बता सकता हूं कि पण्डित सुखराम सलमान खान के बहनोई आयुष शर्मा के दादा थे.

इन तमाम पहचानों के बीच पण्डित सुखराम पर एक दौर में हिमाचल को बहुत नाज़ रहा है. वह 1993-1996 के दौरान नरसिम्हा राव सरकार में दूरसंचार मंत्री थे, वो भी स्वतंत्र प्रभार. उनकी ‘संचार क्रांति’ ने हिमाचल प्रदेश में बहुत लोगों की जान भी बचाई है. इस बात से किसी को भी हैरानी हो सकती है लेकिन मुझे एक घटना याद आ रही है.

यह साल 2001 के शायद जुलाई या अगस्त की बात होगी. उन दिनों मैं ‘अमर उजाला’ में शिमला में रिपोर्टर था. हिमाचल के हिमालयी इलाके किन्नौर में कहीं झील फटी या बादल फटा, अब ठीक से याद नहीं आ रहा है. लेकिन उससे सतलुज नदी ने आधी रात को बहुत विकराल रूप धारण कर लिया. सतलुज गरजते हुए आगे बढ़ रही थी. ऐसा भयानक सैलाब आया कि सैकड़ों लोगों की जान पर बन आई.

सतलुज चूंकि दूरदराज के इलाके किन्नौर से होकर आती है..लिहाजा वहां के लोगों ने नदी का रौद्र रूप देखकर आधी रात को ही निचले इलाकों के लोगों को अलर्ट करने के लिए फोन घनघनाने शुरू कर दिए. शिमला और मंडी जिले के निचले इलाके तत्तापानी में लगभग हर घर में आधी रात घण्टियां बज उठीं. तब सब गहरी नींद में थे. उसी हालत में उन्होंने फोन उठाए.. लेकिन दूसरी तरफ से आई बदहवास आवाजों ने निचले इलाके के लोगों की नींद उड़ा दी.

लोगों ने आव देखा न ताव, किन्नौर से आए टेलीफोन संदेशों के बाद तुरन्त एक्शन में आए. नदी किनारे के गांव के गांव आधी रात को जाग गए..उन्होंने भी अपने परिचितों के फोन घनघनाए और जब तक सतलुज की लहरों पर सवार वो विकराल आपदा ऊंचे इलाके किन्नौर से नीचे उतरकर कई किलोमीटर आगे तत्तापानी जैसे इलाकों तक पहुंचती, तत्तापानी के लोग अपना ज़रूरी सामान निकालकर सुरक्षित ठिकाने तक पहुंच चुके थे.

ऐसा सिर्फ़ उस टेलीफोन की वजह से हो पाया जिसे केंद्र में दूरसंचार मंत्री रहते हुए पण्डित सुखराम ने हिमाचल के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचाया था. ये ख़बर मिलते ही मुझे अख़बार की तरफ से सुबह सैलाब प्रभावित इलाकों में भेजा गया. सैलाब की रिपोर्टिंग करने मैं तत्तापानी गया तब मुझे उस आपदा की तीव्रता का अंदाजा हुआ.

सतलुज नदी अपने जलस्तर से कई फीट ऊंचे बह रही थी. तत्तापानी में तो नदी किनारे खड़े पीपल के एक विशालकाय पेड़ के ऊपर से सतलुज बेहद आक्रामक अंदाज में गुजर रही थी. वो डरावना मंज़र दो दशक बाद भी मेरी आँखों में घूमता है.

वो सैलाब नदी के इर्द-गिर्द के इलाकों को डुबो गया. लेकिन सबसे बड़ी बात ये रही कि जान का कोई नुकसान नहीं हुआ. मैंने वहां जितने भी लोगों से बात की, सभी ने यही कहा कि अगर आधी रात को किन्नौर से टेलीफोन नहीं आते तो आज शायद हम ज़िन्दा न होते..

उस भीषण आपदा के बीच सुखराम बहुत याद आए. उन्होंने हिमाचल के गांव-गांव तक दूरसंचार का जाल बिछाया था. हिमाचल में कुछ साल काम करने के दौरान हम चकित होते थे कि इस पहाड़ी राज्य के ऐसे दूर-दराज इलाकोंं, जहां कि कई दूसरी सुविधायें नहीं पहुंच पाई हैं, वहां सुखराम की बदौलत टेलीफोन पहुंच गया. वो उपेक्षित इलाके टेलीफोन की वजह से कनेक्ट फील करते थे.

हमें तब भी लगता था कि वाकई सुखराम का हिमाचल के लिए यह बड़ा योगदान है. वरना हमारे यहां नेता तो पावर में आते ही सबसे पहले अपना घर भरने लगते हैं..

टेलीफोन ने अगर पण्डित सुखराम को स्कैम वाली बदनामी दी तो टेलीफोन की बदौलत ही उन्हें न जाने कितनों की दुआयें भी मिली होंगी. वैसे सुखराम ने अच्छी खासी जिन्दगी जी. करीब 95 साल की उम्र में आज सुबह उनका देहांत हुआ. समर्थकों के लिए ‘दूरसंचार क्रांति’ का यह हीरो अब बहुत दूर चला गया है, लेकिन हिमाचल प्रदेश ‘पण्डत’ सुखराम को शायद ही भुला पाएगा.

Admin
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

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