पता नहीं अब कितनों को याद होगा कि अंकिता भंडारी मर्डर केस में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सीबीआई जांच की घोषणा की थी। इस बात को महीनों गुजर गए हैं, सीबीआई जांच का क्या हुआ? क्या वाकई सीबीआई जांच हो भी रही है या फिर CBI जांच की घोषणा सिर्फ उस वक्त उठे जनाक्रोश को शांत करने के लिए की गई थी? और अगर जांच हो रही है तो उसकी प्रगति पर सरकार चुप क्यों है?
कई लोगों को पता होगा, एक बड़ी मशहूर अंग्रेजी कहावत है- Justice delayed is justice denied हिंदी में समझें तो न्याय में देरी, न्याय से इनकार है। और यही नाइंसाफी अंकिता भंडारी मामले मे हो रही है। शायद इसीलिए अंकिता के माता-पिता का सब्र जवाब दे गया है। वो दुखियारे माता-पिता अपनी तकलीफ के साथ राहुल गांधी के घर तक पहुंच गए। इसकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर शेयर हुई है। राहुल गांधी ने उन्हें पौड़ी में उनके गांव से दिल्ली बुलाया। उनकी बात सुनी। उनके आंसू पोंछे।
हालांकि ये काम तो राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी कर सकते थे। पहली जिम्मेदारी उन्हीं की बनती है। आखिर वो कुछ दिन पहले ज़माने भर के कैमरों के सामने कांवड़ियों के पैर धो रहे थे। उन पर पब्लिक के टैक्स के पैसों से हेलिकॉप्टर से फूलों की वर्षा करवा रहे थे। अगले दिन अखबारों में धामी साहब का महिमामंडन किया गया, जैसे की उम्मीद थी ही। लेकिन गौर कीजिएगा ये वही कांवड़िये थे जोकि हरिद्वार में टनों कूड़े का अंबार लगाकर लौट गए। मतलब इनकी खातिरदारी उत्तराखंड की जनता के टैक्स के पैसों से हुई और अब इनका छोड़ा कचरा भी उत्तराखंड की जनता के टैक्स के पैसे से ही साफ हो रहा है।

खैर, पता नहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अब याद हो कि न याद हो कि उन्होंने पब्लिक से वादा किया था कि अंकिता भँडारी मर्डर केस में वीआईपी की संलिप्तता के बारे में सीबीआई पता लगाएगी। हिमालयन टॉक्स के यूट्यूब चैनल पर हमने इस जांच को लेकर तब भी आशंका जता दी थी। सरकार की मंशा अगर साफ होती तो अंकिता भंडारी के माता-पिता की अर्जी पर एफआईआर करती और उसी आधार पर जांच होती। लेकिन मुख्यमंत्री धामी ने एक साफे वाले तथाकथित पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी को पकड़कर उनसे अर्जी लिखवाई और उसी अर्जी पर सीबीआई जांच की घोषणा की गई, जबकि अनिल प्रकाश जोशी न तो तीन में थे, न तेरह में। तभी लोग कहने लगे थे कि धामी साहब इस मामले में गेम कर रहे हैं। भई, अगर आप पीड़ित पक्ष की अर्जी पर जांच नहीं करवा रहे हैं तो जाहिर है कोई न कोई खेल खेल रहे होंगे।
मैंने तब भी आशंका जताई थी कि इस मामले को चुनाव तक टाला जा सकता है और इतने महीने गुजरने के बाद अब यही लग रहा है कि अंकिता भंडारी के माता-पिता को न्याय दिलाने में सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है। और शायद इसकी एक बड़ी वजह ये भी है जिसकी तरफ राहुल गांधी ने इशारा किया है। उन्होंने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है कि- “इस दुखद मामले में सबसे शर्मनाक बात है कि राज्य सरकार खुद आज तक उस VIP को संरक्षण दे रही है। क्यों? क्योंकि वो BJP-RSS का बड़ा नेता है।”
पहाड़ की 19 साल की बेटी अंकिता भंडारी का गुनहगार वो बीजेपी-आरएसएस का बड़ा नेता कौन है, उसका नाम पब्लिक प्लेटफार्म पर कई बार सामने आ चुका है।आप सब लोग जानते ही हैं। सीबीआई जांच इसीलिए तो मांगी गई थी कि उस वीआईपी का चेहरा बेनकाब हो। वो एक आदमी था या एक से ज्यादा वीआईपी थे, ये सब कुछ तो सीबीआई जांच से ही पता लगना था, लेकिन अब शक यकीन में बदल रहा है कि कि पहाड़ की बेटी को इंसाफ दिलाने के बजाय सरकार का पूरा जोर अपनी पार्टी के किसी नेता या नेताओं या रसूखदारों को बचाने पर है।
किसी भी सरकार की प्राथमिकता अपने राज्य के लोगों का हित, अपने राज्य के लोगों का कल्याण और अपने राज्य के लोगों को इंसाफ दिलाना होना चाहिए..यही सरकारों का फर्ज है। यही समझदारी है। यही नीति भी कहती है। लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि धामी सरकार की प्राइऑरिटी क्या है? वो किसके लिए काम कर रही है? या तो ये हो सकता है कि वो यह मान बैठी हो कि अंकिता भंडारी मर्डर केस से उनकी सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। या वो ये मान बैठे हों कि इस केस में कोई वीआईपी है ही नहीं या फिर ये हो सकता है कि धामी साहब किसी दबाव में हों। ये भी हो सकता है कि किसी नेता का कोई किसी नाजुक समय का कोई उपकार हो कि उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं हो पा रही है।
जो भी है, उत्तराखण्ड के लिए ये बहुत दुखद है और ऐसे सवाल और ऐसी आशंकायें तब तक उठती रहेंगी जब तक कि सीबीआई जांच के बारे में ये धुंध साफ नहीं हो जाती। आप जानते ही हैं कि पुष्कर सिंह धामी पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाला उत्तराखण्ड में बीजेपी सरकार के पहले मुख्यमंत्री होने जा रहे हैं। यह रिकॉर्ड तो वो शायद बना ही लेंगे क्योंकि अब चुनाव के लिए गिनती के ही महीने बचे हुए हैं। लेकिन इतिहास उन्हें सिर्फ इस रिकॉर्ड के लिए याद नहीं रखेगा। इतिहास उन्हें उस मुख्यमंत्री के रूप में याद रखेगा, जिसके राज में पहाड़ की एक 19 साल की बेटी रोजगार की खातिर और अपने परिवार के बेहतरी के सपनों के लिए नीचे उतरी और रसूखदारों के रिजॉर्ट में उसे नोच दिया गया।
कोई माने या न माने, अंकिता भंडारी मर्डर केस धामी सरकार के दामन पर एक बहुत बड़ा दाग है, इससे वो मुक्त नही ंहो सकते चाहे, वो कितने ही पांच साल पूरे कर लें..कितने ही रिकॉर्ड बना लें या करोड़ों के प्रचार से खुद को धाकड़ कहलवा लेे, लेकिन अंकिता भंडारी मर्डर केस का दाग कितने भी गंगाजल या फूलों की वर्षा से नहीं धुलेगा। धामी साहब सरकार के मुखिया हैं। पहली जिम्मेदारी उन्हीं की बनती है। चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन सरकार का इकबाल भी कोई चीज होती है।



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