April 14, 2026
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जो बड़े-बड़े उस्ताद न कर सके, वो पौड़ी के मोहन ने कर दिखाया

पण्डित मोहन सिंह रावत। यही नाम है पहाड़ के इन विलक्षण संगीतज्ञ का, जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वो कर दिखाया है जोकि चुनींदा हस्तियां ही कर पाई हैं। जैसे उस्ताद मरहूम बिस्मिल्लाह खां साहब ने ब्याह-शादियों में बजने वाले साज़ शहनाई को वहां से उठाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में स्थापित कर दिया। कौड़ी के

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अल्मोड़ा के वो सिनेमाघर – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA CINEMA दशकों तक अल्मोड़ा में दो सिनेमाहॉलों का बोलबाला रहा है। पहला रीगल और दूसरा जागनाथ। जागनाथ की चर्चा अगली पोस्ट में करूंगा। आज चर्चा रीगल की। जागनाथ सिनेमाहॉल एलीट कहा जा सकता था लेकिन अल्मोड़ा का रीगल सिनेमाहॉल सबका था..मुख्य सड़क से बिल्कुल सटा हुआ। ऊपर वाली मंजिल में बालकनी और नीचे वाली

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मेरे बचपन की यादों की कचहरी – संजय बिष्ट (Author PHO)

ALMORA KACHHARI अल्मोड़ा की कचहरी अब अतीत की बात हो चुकी है। कचहरी का माल असबाब उठ चुका है। कुछ कहीं और शिफ्ट हो गया होगा, कुछ नष्ट हो गया होगा, और कुछ यहीं रह गया होगा। जो यहां रह गया है वो अब संग्रहालय का हिस्सा होगा। मेरे यादों के संग्रहालय से कचहरी कभी

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प्रतिमा हो गए ‘राजा साब’

शिमला के मशहूर रिज़ पर एक और मूर्ति लग गई है. इस बार दिवंगत वीरभद्र सिंह की प्रतिमा यहां लगाई गई. कल सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं की मौजूदगी में इस प्रतिमा का अनावरण किया गया. रिज़ शिमला की धड़कन है. अब ये दिवंगत हस्तियों की प्रतिमाओं वाला स्थल हो गया है.

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लव इन ‘श्यामला’ मनु पंवार

ऐसे समय में जबकि 21वीं सदी में भारत में स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणाओं ने अभी ज़मीन भी नहीं पकड़ी है, अंग्रेजों द्वारा 19वीं सदी में खूबसूरत पहाड़ियों पर बसाई अपनी तरह की ‘स्मार्ट सिटी’ शिमला का नाम बदलने की चर्चाओं ने ज़ोर पकड़ लिया है। शिमला का नाम बदलकर ‘श्यामला’ किए जाने की मुहिम

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‘किन्नर’ से लड़ता किन्नौर मनु पंवार

‘यदि होता किन्नर नरेश मैं राजमहल में रहता सोने का सिंहासन होता सिर पर मुकुट चमकता’ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की इस कविता से गुजरना किसी स्वप्नलोक की सैर करने जैसा है। बचपन में इस कविता को पढ़कर सोचा करते थे कि आखिर वह किन्नर देश सचमुच में होगा कैसे?  इस पूरी कविता की एक-एक पंक्ति

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पांच साल की बाध्यता में घुटती ज़िंदा कौमें मनु पंवार

राम मनोहर लोहिया कहा करते थे, ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’। लेकिन मुश्किल ये है कि किसी निर्वाचित सरकार या प्रतिनिधि को पांच साल ढोने की विवशता का कोई तोड़ हम आज तक नहीं ढूंढ पाए हैं। इस मजबूरी ने एक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था को किस कदर बेबस और लाचार बना दिया है,

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