
| शिमला में इसी रिज़ मैदान पर नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह हो रहा है |
नहीं..नहीं…. ये वो पानी की टंकी नहीं है जिस पर चढ़कर ‘शोले’ का बीरू दारू की बोतल लेके कूदकर जान दे देने की धमकी देता है. ये पानी का विशालकाय टैंक है शिमला के फेमस रिज़ मैदान पर, जो ब्रिटिशकाल में बना हुआ है. वैसे इस जगह का नाम है ‘द रिज़’. शिमला का हृदय स्थल. यहीं से शिमला का गला तर करने का इंतजाम होता है. इसी टैंक के ऊपर आज प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में जयराम ठाकुर की सरकार शपथ लेनी जा रही है.
इस पानी के विशालकाय टैंक की खासियत ये है कि ये इस तरह बना है कि किसी को नहीं दिखता. आप अगर रिज़ पर चहलकदमी कर रहे हों, तो आप कतई अंदाज़ा भी नहीं लगा पाएंगे कि आपके कदमों के नीचे विशाल जलाशय है. फिरंगियों ने उसे अंडरग्राउंड ही बनाया है.

रिज पर बिछाई गई कुर्सियां
‘द रिज़’ शिमला की जान है. शिमला की जो प्रमुख जगहें हैं, जैसे मॉल रोड, जाखू हिल्स, लक्कड़ बाज़ार, स्नोडन..सबका रास्ता रिज़ से होकर ही जाता है. लेकिन सैलानियों की सबसे पसंदीदा सैरगाह रिज़ ही है. इसी रिज़ का सीना चीरकर अंग्रेज़ों ने साल 1880 में रिजरवॉयर यानी विशाल जलाशय बनाया था. जो आज भी है.
रिज़ की कोख में ये जो जलाशय है, वो करीब 150 मीटर लंबा है. इसकी गहराई कितनी है, इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं है. सबसे हैरान करने वाली बात है इन पानी के टैंकों की बनावट. अंग्रेजों ने इन पानी के टैंकों को बनाने में कहीं भी सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया, ये टैंक चूने के गारे से बने हैं और पिछले 137 साल से मजबूती के साथ धरती के अंदर डटे हुए हैं. ये भी कम चौंकाने वाली बात नहीं है कि एक सदी से भी ज्यादा उम्र के बूढ़े टैंक इतने लंबे समय से शिमला की प्यास बुझा रहे हैं.
रिज़ के नीचे बने इन वाटर टैंक्स की क्षमता क़रीब 10 लाख गैलन है. यानी लगभग 45 लाख लीटर से ज़्यादा पानी आता है इन टैंकों में. ऐसा बताया जाता है कि रिज़ के टैंकों में सामान्य दिनों में अमूमन 8 से 10 फुट पानी स्टोर रहता है. बताइए, नीचे 45 लाख लीटर से ज्यादा पानी और उसके ऊपर बड़ी-बड़ी रैलियां होती हैं, सभायें होती हैं, बड़े-बड़े समारोह होते हैं, जलसे होते हैं, समर फेस्टिवल होता है. कोई भी सरकार को, कोई भी बड़ा नेता हो, रिज़ पर अपना समारोह करना, अपनी रैली करना शान समझता है. इस शान के चक्कर में कई बार रिज़ मैदान के नीचे गाड़े गए इन बूढ़े पानी के टैंकों की शामत आ जाती है, लेकिन इसकी किसे परवाह.


फिल्म थ्री इडियट्स का रिज वाला सीन
वैसे शिमला के रिज़ को आपने कई फ़िल्मों में देखा होगा. आमिर ख़ान के लीड रोल वाली बहुचर्चित फ़िल्म ‘थ्री इडियट्स’ का ये सीन (बाईं तरफ वाली तस्वीर में) याद होगा. जिसमें माधवन और शरमन जोशी रैंचो की खोज में शिमला पहुंच जाते हैं. ये दोनों अभिनेता जहां खड़े दिख रहे हैं, ये रिज़ का वो मंच है जहां से बड़े नेता रैली को संबोधित करते हैं. आज नए सीएम जयराम ठाकुर का शपथ ग्रहण भी यहीं से होगा. लेकिन मुमकिन है कि इस रिज़ के नीचे विशालय जलाशय होने के बारे में बहुत लोग अनभिज्ञ हों.

फिल्म बादल का वो सीन जो रिज से प्रेरित है
एक बार फ़िल्मकार राज कंवर को जब ये बात पता चली तो वह भी चकित रह गए. उन्होंने इससे एक आइडिया ले लिया और सन् 2000 में आई अपनी फ़िल्म ‘बादल’ में एक सीन ही क्रिएट कर दिया गया. बॉबी देओल के लीड रोल वाली इस फिल्म की ज़्यादातर शूटिंग शिमला में ही हुई थी. इस फिल्म के लगभग आखिर में एक सीक्वेंस बनाया गया है कि एक मैदान के ऊपर नेता बने विलेन की रैली हो रही है, भाषण चल रहा है और उसी मैदान के नीचे जलाशय बना है. जहां घुसकर नायक यानी बॉबी देओल नेता को निपटाने की तरकीब पर अमल कर रहा है. इस तस्वीर में देख सकते हैं बॉबी देओल टैंक के अंदर हैं. बगल में सीढ़ी है और चारों तरफ पानी के फव्वारे फूट रहे हैं. ये आइडिया रिज़ से ही लिया गया है.

| मेरे कदमों के नीचे जलाशय है |
ऐसा कई बार हो चुका है कि रिज़ के ये टैंक अपने ऊपर का दबाव नहीं झेल पाए. रिज़ पर दरारें उभर आती हैं जोकि संकेत होता है कि ख़तरा नजदीक है. ऐसे मौकों पर शिमलावालों के होश उड़ जाते हैं. डर सताता है कि अपने भीतर 45 लाख लीटर पानी समाये ये टैंक खुदा-न-खास्ता कभी फट गए तो शिमला तो बह जाएगा. ऐसे ही ख़तरे को भांपकर रिज पर मानवीय हलचलों, सरकारी समारोहों, रैलियों को लेकर पाबंदी भी लगाई गई. रिज के ऊपर गाड़ियां ले जाने पर तो पाबंदी है ही. यहां तक कि चीफ मिनिस्टर की गाड़ी भी नहीं जा सकती. केवल एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड ही जा सकती हैं. पिछली बार तो प्रधानमंत्री मोदी की रैली को लेकर भी स्थानीय स्तर पर ऐतराज हुए हैं. शिमला से लेकर दिल्ली तक चिट्ठियां दौड़ाई गईं. लेकिन बहुत असर हुआ नहीं. रिज़ को किसी ने नहीं बख्शा, न कांग्रेस वालों ने और न बीजेपी वालों ने.
वैसे रिज़ के इस बूढ़े जलाशय की चिंता कोई आज से नहीं हो रही है. साल 1880 में जब से ये बनाए गए, तभी से ब्रिटिश अफ़सरों ने इसका खास ख्याल रखा.ऐसा ज़िक्र मिलता है कि ब्रिटिश राज में रिज़ मैदान के ऊपर एक समय लगभग 150 लोगों को ही चलने की इजाज़त थी. ऐसा इसलिए ताकि रिज़ के नीचे जो जलाशय है, उस पर दबाव न पड़े. लेकिन अब यहां खासतौर पर पर्यटन सीज़न में तो बेतहाशा भीड़ हो जाती है. बड़े-बड़े नेता हज़ारों की भीड़ वाली रैली कर गुजरते हैं. आज हम अपने शहरों के लिए ऐसे इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं, तो कम से कम अंग्रेज़ों से मिली विरासत को संभालकर तो रख ही सकते हैं.


Leave feedback about this