
आजकल
अंकिता भंडारी केस में अब सीबीआई क्या उखाड़ लेगी?
by Manu Panwar
- October 13, 2026
- 0 Comments
- Less than a minute
- 14 Views

ऐसे समय में जबकि देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कारगुजारी के खिलाफ पूरा विपक्ष सड़क पर था, तब राष्ट्रपति भवन से 12 अक्टूबर 2026 को 6 राज्यों में नए राज्यपाल नियुक्त किए जाने की एक लिस्ट आती है। उस लिस्ट के मुताबिक ओम प्रकाश माथुर को केरलम, राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को तमिलनाडु, ब्रज मोहन राम को ओडिशा, डॉ. सुधा यादव को कर्नाटक, डॉ. ढाल सिंह बिसेन को उत्तराखंड और दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किया गया है।
इस लिस्ट में उत्तराखण्ड से जुड़े दो जानकारियां थीं। एक तो चुनाव से महज कुछ ही महीने पहले उत्तराखण्ड को नए राज्यपाल मिले हैं और दूसरा दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल बनाकर भेजा जा रहा है। उत्तराखण्ड के लिहाज से इसमें सबसे चौंकाने वाला नाम है दुष्यंत गौतम का ही है। हालांकि दुष्यंत गौतम का उत्तराखण्ड से कोई सीधा ताल्लुक नहीं है। वह हरियाणा से आते हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव रहे हैं और उत्तराखण्ड से उनका नाता सिर्फ इस वजह से रहा कि वह बीजेपी के उत्तराखण्ड प्रभारी रहे हैं। लेकिन उनका परिचय और भी है, जिसकी वजह से वह विवादों में रहे हैं।
साल 2022 में ऋषिकेश के पास बीजेपी नेता के बेटे के एक रिजॉर्ट में बतौर रिसेप्शनिष्ट काम करने वाली पहाड़ की बेटी अंकिता भंडारी वाला केस आपको याद ही होगाष उसमें जिस तथाकथित वीआईपी का नाम लिया जा रहा था, उसमें उंगली इन्हीं दुष्यंत गौतम की तरफ भी उठी, जिन्हें सिक्किम का राज्यपाल बनाकर भेजा गया है।उनका नाम पब्लिक डोमेन में बीजेपी के ही पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ और उनकी कथित दूसरी पत्नी उर्मिला सनावर के बीच हुई टेलीफोनिक वार्तालाप के जरिये सामने आया था। उस कथित बातचीत की फोन रिकॉर्डिंग उर्मिला सनावर ने ही सार्वजनिक की थी। जिसके बाद इसी साल की शुरुआत में उत्तराखण्ड की राजनीति में भारी भूचाल आ गया था।

ऐसा पहली बार हुआ था जब इस मामले में बीजेपी के राज्य प्रभारी दुष्यंत गौतम का नाम सीधे तौर पर लिया गया। इसके बाद तो उत्तराखण्ड में कई जगह बड़े-बड़े प्रोटेस्ट हुए। चूंकि मामला हाईप्रोफाइल था। सत्ताधारी बीजेपी के बड़े नेता का नाम आ गया था। इसलिए उनको बचाने के लिए पूरी मशीनरी झोंक दी गई। तब कई तरह के प्रपंच करके मामले को रफा-दफा करने की पूरी कोशिश की गई।
लेकिन जनता के गुस्से का उबाल थम नहीं रहा था। लिहाजा धामी सरकार को भारी मन से कुछ कदम उठाने पड़े। मसलन, उस कथित वीआईपी का पता लगाने के लिए एक एफआईआर दर्ज कराई गई। लेकिन इसमें भी एक खेल किया गया। और वो यह कि अंकिता भंडारी के माता-पिता को उससे बाहर रखा गया। एफआईआर सरकार समर्थित एक पर्यावरण कार्यकर्ता अनिल प्रकाश जोशी की अर्जी पर दर्ज की गई। जबकि अनिल प्रकाश जोशी का इस मामले से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। न ही उन्होंने कभी अंकिता भंडारी को इंसाफ दिलाने की आवाज़ ही उठाई।
बहरहाल, तब पब्लिक के भारी गुस्से को भांपते हुए तब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अंकिता भंडारी मामले की सीबीआई जांच की घोषणा करनी पड़ी। इससे पहले उत्तराखण्ड हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उत्तराखंड सरकार बार-बार यही दलील देती रही कि उसकी बनाई SIT और उत्तराखण्ड पुलिस की जांच सही दिशा में चल रही है और जांच सीबीआई के हवाले करने की आवश्यकता नहीं है। सीबीआई जांच से सरकार क्यों कतरा रही थी, यह सबको दिख रहा था। लेकिन चूंकि उस कथित वीआईपी को लेकर नए दावे सामने आ गए। खुद बीजेपी के ही पूर्व विधायक सुरेश राठौर ने कथित तौर पर दुष्यंत गौतम का नाम ले लिया। उसके बाद जो प्रोटेस्ट सुलग उठा, उसी के दबाव में मुख्यमंत्री धामी को सीबीआई जांच की घोषणा करवानी पड़ी थी।
यह बात अलग ही कि महीनों गुजर जाने के बाद आज तक ये पता नहीं चल पाया है कि आखिर सीबीआई की जांच शुरू भी हुई है या नहीं? इस बीच बीजेपी के जिस नेता का नाम उस कथित वीआईपी के तौर पर लिया जा रहा था, उन्हें राज्यपाल बना दिया गया है। अब राष्ट्रपति और राज्यपाल के ख़िलाफ़ तो कानून लागू होता नहीं है, तो ऐसे में सीबीआई क्या उखाड़ लेगी, ये आप खुद ही सोच लीजिए। राज्यपाल पद की वजह से उन नेता को ऐसी जांचों से स्वत: ही इम्यूनिटी मिल जाएगी।
जबकि अंकिता भंडारी मामले में वह वीआईपी बहुत खतरनाक करेक्टर है। खुद कोर्ट की कार्यवाही में आया है कि बीजेपी नेता के बेटे के रिजॉर्ट में अंकिता भंडारी पर उस वीआईपी को ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ देने यानी जिस्मफरोशी का दबाव डाला जा रहा था। पहाड़ की उस लड़की ने इसका विरोध किया और उनकी पोल खोलने की धमकी दी तो उसे रास्ते से ही हटा दिया गया। चीला नहर में उसे जिंदा डुबो दिया गया।
अँकिता भंडारी के माता-पिता चार साल से अपनी बेटे के लिए इंसाफ की मांग की खातिर लड़ रहे हैं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। हालांकि जब सत्ताधारी दल के इतने प्रभावशाली लोग जिस हत्याकांड में कथित तौर पर संलिप्त हों, वहां सीबीआई क्या ही जो जांच करती, लेकिन फिर भी कुछ तो पता चलता। अब तो वो सारी उम्मीदें भी खत्म हो गई हैं। तो क्या अंकिता भंडारी मर्डर केस एक मिस्ट्री बना रहेगा?
Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.


Leave feedback about this