उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पिछले दिनों उत्तरकाशी के प्रसिद्ध काशी-विश्वनाथ मंदिर को कॉरिडोर बनाने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि धार्मिक पर्यटन और रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए ऐसा किया जाएगा। लेकिन यह बात एकदम गले नहीं उतर रही है। सबसे पहली बात तो यही है कि आखिर उत्तराखण्ड सरकार पहाड़ों के प्राचीन मंदिरों, तीर्थों या धामों को कॉरिडोर में बदलने पर क्यों आमादा है? कॉरिडोर तो खालिस एक बिजनेस आइडिया है। जिसमें धर्म और आस्था से ज़्यादा धंधे की नीयत छिपी होती है।
केदारनाथ से लेकर बदरीनाथ में इसी तरह के कॉरिडोर से किसका हित साधा जा रहा है, ये बातें अब छिपी नहीं रह गई हैं। धार्मिक स्थल धीरे-धीरे पूजा और साधना के स्थान से बड़े पर्यटन केंद्र की तरह संचालित होने लगे हैं। जबकि प्राचीन मंदिरों के आसपास की गलियां, पुराने मकान, छोटे देवालय और पारंपरिक बाजार भी उस धार्मिक स्थल के इतिहास का हिस्सा होते हैं। बड़े निर्माण के लिए इन्हें हटाने से स्थल का ऐतिहासिक संदर्भ और उसकी मूल पहचान कमजोर हो सकती है।

उत्तरकाशी का यह काशी विश्वनाथ मंदिर भी बहुत प्राचीन मंदिर है। इसकी प्राचीनता का एक अनुमान लगता है मशहूर घुमक्कड़ राहुल सांस्कृत्यायन की किताब ‘हिमालय परिचय’ से, जिसमें उन्होंने लिखा है- ‘विश्वनाथ मंदिर के सामने का विशाल त्रि्शूल सारे गढ़वाल-कुमाऊं में सबसे पुरानी पुरातात्विक कृति तथा उसका अभिलेख प्राय: सबसे पुराना अभिलेख है। इसकी लिपि ईसा की छठी-सातवीं सदी की है, इसी लिपि में गोपेश्वर के त्रिशूल के डंडे का लेख भी है।’
इतने प्राचीन मंदिर और आसपास के हिस्से को उसके उसी मूल स्वरूप में बनाए रखना ज्यादा समझदारी की बात है, लेकिन सरकार बहादुर जब कॉरिडोर बनाने की घोषणा करने लगी तो सवाल तो बनता ही है कि आखिर यह सब किसके लिए किया जा रहा है? उत्तरकाशी के इस प्राचीन मंदिर को कॉरिडोर में बदलने की ऐसी भी क्या ज़रूरत है? पहाड़ के इन प्राचीन धार्मिक स्थलों को पर्यटन और राजस्व के बड़े केंद्र में बदलने की यह सनक आखिर क्यों है? क्या कॉरिडोर बनाने से हमारे प्राचीन धार्मिक स्थलों की मूल पहचान बनी रह पाएगी?



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