
यही नहीं, जो मौजूदा वित्त वर्ष चल रहा है, यानी वर्ष 2026-27, उसमें उत्तराखंड सरकार का राजकोषीय घाटा 12,580 करोड़ के आसपास है। राजकोषीय घाटा का मतलब होता है कि सरकार की कुल कमाई और कुल खर्च के बीच का वो अंतर, जिसे पूरा करने के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है। तो उत्तराखण्ड के सरकारी खजाने की हकीकत ये है और हमारी सरकार बहादुर राजा-महाराजाओं की तरह पब्लिक का पैसा दलेर मेहंदियों और कुमार विश्वासों पर लुटाए जा रही है। और ऐसी मेहरबानी सरकार बाहर के आर्टिस्टों पर ही कर रही है।
आपको याद होगा कि पिछले दिनों पांडवाज बैंड वाले मिन्नतें करके थक गए कि भई हमने सरकार के कहने पर जो शोज किए थे, उसका पैसा उन्हें लंबे समय से मिला नहीं।आखिर में उनको सोशल मीडिया के जरिये अपनी पीड़ा सबको बतानी पड़ी तब जाकर सरकार के कान में जूं रेंगी। उनसे पहले बसंती बिष्ट को भी अपने पेमेंट के लिए सरकारी सिस्टम ने लगभग रुला ही दिया था। उत्तराखंड के दूसरे कलाकारों के साथ भी ऐसा ही होता है। तो इससे पता चलता है कि उत्तराखंड सरकार की प्राइऑरिटी क्या है? चुनावी साल में तो खैर वो बेहिसाब पैसा लुटा रही है। पता नहीं, चुनावों में जनता इस सबका हिसाब करेगी या नहीं, लेकिन यह भी सच है कि हमारी पॉलिटिकल लीडरशिप और हमारी ब्यूरोक्रेसी ने इस राज्य को ही एंटरटेनमेंट का मंच बना दिया है।



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