October 24, 2026
आजकल

सिर्फ होंठ हिलाने के 35 लाख रुपये ! क्या उत्तराखण्ड को इतना महंगा मनोरंजन चाहिए?

daler mehandi, subodh uniyal
daler mehandi, subodh uniyal
18 अक्टूबर 2026 को नरेंद्र नगर के कुंजापुरी मेले में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने सिंगर दलेर मेहंदी को मंच पर ही डपट दिया
35 लाख रुपये की रकम कम नहीं होती। लेकिन उत्तराखंड सरकार ने टिहरी गढ़वाल ज़िले के नरेंद्र नगर के कुंजापुरी मेले में इतनी बड़ी रकम सिर्फ़ एक गायक पर लुटा दी। वह गायक हैं पंजाबी पॉप सिंगर दलेर मेहंदी। और किस बात के लिए? सिर्फ रिकॉर्डेड गाने पर होंठ हिलाने के लिए, जिसे अंग्रेजी में कहते हेैं लिप-सिंक करना।
नरेंद्र नगर के कुंजापुरी मेले में दलेर मेंहदी के साथ मंच पर जो कुछ हुआ, उसकी असल सच्चाई क्या है, उस पर मैं नहीं जा रहा हूं। कैबिनेट मंत्री और लोकल विधायक सुबोध उनियाल ने जिस तरह उन्हें मंच से ज़लील किया,वह तो खैर किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। इतने बड़े कलाकार के साथ इस तरह का बर्ताव करना असभ्यता है। लेकिन इस विवाद ने मूल मुद्दा गायब कर दिया है।
सुबोध उनियाल के भरे मंच से दलेर मेंहदी को लताड़ने का वीडियो वायरल हुआ तो बॉलीवुड के लोग या एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लोग दलेर मेंहदी के पक्ष में खड़े हो गए। एक गोलबंदी चल रही है। बहुत से एक्टर, सिंगर वीडियो बना-बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। दलेर मेहंदी के छोटे भाई और गायक मीका सिंह के वीडियो से ही पता चला कि दलेर मेहंदी बीमार थे। लेकिन फिर तो सवाल और गंभीर हो जाता है। अगर दलेर बीमार थे और गा सकने की स्थिति में नहीं थे, तो कुंजापुरी मेले में कॉन्सर्ट देने क्यों चले आए? मना कर देते और जो एडवांस पैसा उन्होंने उत्तराखंड सरकार से लिया था, उसको ससम्मान वापस लौटा देते।
लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अगर उत्तराखण्ड के कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल सही कह रहे हैं, तो दलेर मेंहदी को उस शो के लिए 35 लाख रुपये दिया गया है और बाकी सुविधायें अलग से दी गई होंगी। मतलब आना-जाना, खाना-पीना, ठहरना, गाड़ी-घोड़ा…वो खर्चा अलग है। सुबोध उनियाल ने भरे मंच से कह भी दिया कि आने से पहले आपके बड़े नखरे थे कि मुझे यह भी चाहिए, वह भी चाहिए।
कोई इस विवाद को किसी भी दिशा में ले जाए, सुबोध उनियाल के बर्ताव से नाइत्तेफाकी रखते हुए भी यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि हां, दलेर मेहंदी ने कुंजापुरी मेले में उनको सुनने आए दर्शकों के साथ धोखा दिया। यह बात सुबोध उनियाल ने भी भरे मंच से कही, लेकिन सारे लोग इस विवाद का दूसरा सिरा पकड़ रहे हैं कि मंत्री ने बदतमीजी की। बदतमीजी वाली शिकायत अपनी जगह है। उसकी निंदा कीजिए, लेकिन यह भी तो देखिए कि क्या उस दलेर मेहंदी ने जो किया, वह पेशेवर तरीका था?
जैसा दावा किया जा रहा है, अगर वह बीमार थे तो उन्हें यह शो करना ही नहीं चाहिए था और अगर उन्हें अपनी बीमारी से ज़्यादा 35 लाख रुपये हाथ से निकल जाने की फिक्र थी, तो इसके वह खुद जिम्मेदार हैं। परफॉर्मेंस पर तो इसका असर नहीं पड़ना चाहिए था। लेकिन उन्हें पहाड़ के मेले और पहाड़ के दर्शकों को टेकन-फॉर-गारेन्टेड ले लिया और रिकॉर्डेड गाना बजाकर लिप-सिंक करने लगे। ऐसे में अगर उनसे सवाल किया गया है तो शायद वाजिब है। हां, मैं फिर कह रहा हूं कि दलेर मेहंदी के साथ उस तरह से पेश आना निहायत ही बदतमीजी है, जैसा सुबोध उनियाल पेश आए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि असल सवाल ही गायब कर दिया जाए।
हमारा तो सवाल ये है कि आखिर इतना महंगा आर्टिस्ट बुलाने की क्या जरूरत थी? आखिर बाहर के इन कलाकारों पर इतना ज्यादा पैसा लुटाने का मतलब क्या है? इससे फायदा किसे हो रहा है? और इससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड राज्य इतना महंगा मनोरंजन वहन कर सकता है? क्या यह हमारे लिए अफोर्डेबल है?
अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं हुई है, जब श्रीनगर गढ़वाल में बैकुंठ चतुर्दशी मेले में कुमार विश्वास को बुलाया गया गया था। बंदा लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी जी को पद्मश्री देने की भरे मंच से वकालत करते दर्शकों को खुश कर गया और जनता के टैक्स का पच्चीस लाख रुपये ले उड़ा। खुद नरेंद्र सिंह नेगी अपनी पूरी टीम के साथ भी अगर सालभर में 5 स्टेज शो भी करें तो भी उन्हें इतना पैसा कमाने में पांच-छह साल लग जाएं।
तो मूल सवाल पर लौटते हैं। क्या कर्ज में डूबा हुआ राज्य उत्तराखण्ड इतना महंगा मनोरंजन अफोर्ड कर सकता है? क्या ये हमेंं सूट करेगा? ये समझने के लिए आपको एक आंकडा बताता हूं। C-A-G की Accounts at a Glance 2024–25 रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2025 को उत्तराखंड सरकार की कुल देनदारियां ₹90,657 करोड़ थीं, जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 23.96% थीं।….मतलब उत्तराखंड सरकार पर जितना कुल बकाया कर्ज और अन्य देनदारियां हैं, उनकी रकम राज्य की एक साल की स्टेट जीडीपी के लगभग 24% के बराबर है। मतलब अगर उत्तराखंड की सालाना अर्थव्यवस्था 100 रुपये है, तो सरकार पर लगभग 24 रुपये का कर्ज और देनदारियां हैं।

यही नहीं, जो मौजूदा वित्त वर्ष चल रहा है, यानी वर्ष 2026-27, उसमें उत्तराखंड सरकार का राजकोषीय घाटा 12,580 करोड़ के आसपास है। राजकोषीय घाटा का मतलब होता है कि सरकार की कुल कमाई और कुल खर्च के बीच का वो अंतर, जिसे पूरा करने के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है। तो उत्तराखण्ड के सरकारी खजाने की हकीकत ये है और हमारी सरकार बहादुर राजा-महाराजाओं की तरह पब्लिक का पैसा दलेर मेहंदियों और कुमार विश्वासों पर लुटाए जा रही है। और ऐसी मेहरबानी सरकार बाहर के आर्टिस्टों पर ही कर रही है।

आपको याद होगा कि पिछले दिनों पांडवाज बैंड वाले मिन्नतें करके थक गए कि भई हमने सरकार के कहने पर जो शोज किए थे, उसका पैसा उन्हें लंबे समय से मिला नहीं।आखिर में उनको सोशल मीडिया के जरिये अपनी पीड़ा सबको बतानी पड़ी तब जाकर सरकार के कान में जूं रेंगी। उनसे पहले बसंती बिष्ट को भी अपने पेमेंट के लिए सरकारी सिस्टम ने लगभग रुला ही दिया था। उत्तराखंड के दूसरे कलाकारों के साथ भी ऐसा ही होता है। तो इससे पता चलता है कि उत्तराखंड सरकार की प्राइऑरिटी क्या है? चुनावी साल में तो खैर वो बेहिसाब पैसा लुटा रही है। पता नहीं, चुनावों में जनता इस सबका हिसाब करेगी या नहीं, लेकिन यह भी सच है कि हमारी पॉलिटिकल लीडरशिप और हमारी ब्यूरोक्रेसी ने इस राज्य को ही एंटरटेनमेंट का मंच बना दिया है।

Manu Panwar is the Founder of Himalayan Talks and a distinguished Broadcaster, Author, and Columnist with a career spanning nearly 30 years. A veteran of the Indian media landscape, he has held pivotal leadership roles at premier Television networks including ABP News, STAR News, India TV, and Sahara India Television.Began his journey in 1996 as a Reporter for the prominent Hindi daily Amar Ujala.

Leave feedback about this

  • Quality
  • Price
  • Service

PROS

+
Add Field

CONS

+
Add Field
error: Content is protected !!